निकाह-ए-हलाला की शरई हैसियत
इस्लाम दीन-ए-फ़ितरत और मुकम्मल निज़ाम-ए-ज़िन्दगी है। इसने जहाँ इंसान की तमाम शोबा-ए-ज़िन्दगी में मुकम्मल रहनुमाई की, वहाँ शोबा-ए-मुआशरत में तहफ़्फ़ुज़-ए-इफ़्फ़त-ओ-इस्म़त के लिए क़ानून-ए-निकाह की पज़ीराई की। इस शिआर-ए-इस्लाम ने इंसानियत को दरिंदगी की दलदल से निकालकर बंदगी की शाहराह पर गामज़न कर दिया, लेकिन अफ़सोस कि बाज़ लोगों ने हलाला जैसी लानत के ज़रिए मुहाफ़िज़ान-ए-इज़्ज़त को फिर राहज़न कर दिया। हलाला एक बदतरीन बे-हयाई है, इस पर दलील यह हदीस-ए-रसूल है:
सैय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:
"لَعَنَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ الْمُحِلَّ وَالْمُحِلَّلَ لَهُ
रसूल-ए-करीम ﷺ ने हलाला करने वाले और जिसके लिए हलाला किया गया, दोनों मर्दों पर लानत फ़रमाई है। [मुसनद इमाम अहमद: 1765 मुसनद अल-बज़्ज़ार कश्फ़ुल अस्तार: 1442, मुसनद इसहाक़ व मुसनद अबू यअला नस्बुर राया: 3/240, अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 7/208, अल-मुत्तफ़िक़ लिल-ख़तीब: 1705] और इसकी सनद हसन है।
इमाम इब्नुल जारूद;684 ने इसे सही क़रार दिया है।
अल्लामा ज़ैलई हनफ़ी कहते हैं:
"الْحَدِيثُ صَحِيحٌ"
"यह हदीस सही है।" नस्बुर राया: 3/240
हाफ़िज़ इब्न हजर रहमतुल्लाहि अलैहि (852 हिजरी) इस हदीस के तहत फ़रमाते हैं:
جَاءَ رَجُلٌ إِلَى ابْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا فَسَأَلَهُ عَنْ رَجُلٍطَلَّقَ امْرَأَتَهُ ثَلَاثًا، فَتَزَوَّجَهَا أَخٌ لَّهُ مِنْ غَيْرِ مُؤَامَرَةٍ مِّنْهُ، لِيُحِلَّهَا لِأَخِيهِ، هُوَ تَحِلُّ لِلْأَوَّلِ؟ قَالَ : لَا ، إِلَّا نِكَاحُ رَغْبَةٍ، كُنَّا نَعُدُّ هُذَا سِفَاحًا عَلَى عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ
एक आदमी ने सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा की ख़िदमत में हाज़िर होकर सवाल किया कि अगर एक शख़्स अपनी बीवी को तीन तलाक़ें दे देता है, फिर उससे मशवरा किए बग़ैर उसका भाई हलाले की नियत से उस औरत से निकाह करता है, क्या इस सूरत में वह औरत पहले खाविंद के लिए हलाल हो जाएगी? आपने फ़रमाया: नहीं, (दूसरे के लिए) सिर्फ़ दवाम (हमेशा साथ रहने) की नियत से निकाह करना (सही है), हम इस (हलाला) को अहद-ए-नबवी (नबी के दौर) में ज़िना शुमार करते थे।"
अल-मुस्तदरक लिल-हाकिम: 2806, अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 7/208, और इसकी सनद सही और मुत्तसिल है इमाम हाकिम रहमतुल्लाहि अलैहि ने इसे बुखारी व मुस्लिम की शर्त पर सही कहा है और हाफ़िज़ ज़हबी रहमतुल्लाहि अलैहि ने उनकी मुवाफ़िक़त की है।
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से हलाला के बारे में पूछा गया, फ़रमाया:
هُمَا زَانِيَانِ وَإِنْ مَكَثَا عَشْرَ سِنِينَ أَوْ عِشْرِينَ سَنَةً، إِذَا أَنَّهُ تَزَوَّجَهَا لذلك
"दोनों ज़ानी हैं, चाहे वे दस साल साथ रह चुके हों या बीस साल।" [अल-मुतालिबुल आलिया लिल-इब्न हजर: 1693] और इसकी सनद सही है
अल्लाह और उसके रसूल तो हलाला करने वाले और जिसके लिए हलाला किया गया, दोनों को मलऊन करार दें, लेकिन बाज़ हज़रात ने ताईद-ए-मज़हब में इसकी इंतिहाई अजीब तावील की कि:
لَعَلَّ أَرَادَ اللَّعْنَةَ بِالرَّحْمَةِ
"हो सकता है कि यहाँ लानत से मुराद रहमत हो।" [मुस्तख़लिसुल हक़ाएक़ शरह कंज़ुल दक़ाएक़: 126]
हलाला मुहद्दिसीन-ए-एज़ामकी नज़र में:
इमाम अमरो बिन दीनार रहमतुल्लाहि अलैहि के बारे में है:
إِنَّهُ سُئِلَ عَنْ رَجُلٍ طَلَّقَ امْرَأَتَهُ، فَجَاءَ رَجُلٌ مِّنْ أَهْلِ الْقَرْيَةِ بِغَيْرِ عِلْمِهِ، وَلَا عِلْمِهَا فَأَخْرَجَ شَيْئًا مِّنْ مَالِهِ فَتَزَوَّجَهَا لِيُحِلَّهَا لَهُ ، فَقَالَ : لَا
"आपसे सवाल हुआ कि एक शख़्स अपनी बीवी को तलाक़ देता है, तो कोई देहाती आता है, जिसका इल्म न शौहर को है और न बीवी को, वह देहाती कुछ माल पेश करता है और निकाह-ए-हलाला करता है, क्या ऐसा करना दुरुस्त है? फ़रमाया: नहीं।" [मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा: 17090] और इसकी सनद सही है
इमाम सुफ़ियान सौरी रहमतुल्लाहि अलैहि हलाला को ग़ैर-शरई क़रार देते हुए फ़रमाते हैं:
إِذَا تَزَوَّجَ الرَّجُلُ الْمَرْأَةَ لِيُحَلَّلَهَا، ثُمَّ بَدَا لَهُ أَنْ يُمْسِكَهَا ، فَلَا يَحِلُّ لَهُ أَنْ يُمْسِكَهَا، حَتَّى يَتَزَوَّجَهَا بِنِكَاحٍ جَدِيدٍ
"अगर कोई मर्द किसी औरत से हलाला की नियत से निकाह करे, फिर उसे मुस्तक़िल तौर पर अपने पास रखने का इरादा कर ले, तो उसके लिए नया निकाह किए बिना उस औरत को अपने पास रखना हराम है।" [सुनन तिरमिज़ी: 112 के तहत
इमाम हम्माद बिन अबी सुलेमान रहमतुल्लाहि अलैहि से पूछा गया कि एक शख़्स हलाला के लिए औरत से शादी करता है? आपने फ़रमाया: "मेरे मुताबिक़ वह उसे छोड़ दे।" [मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा: 17085] और इसकी सनद सही है।
इमाम जारूद बिन मुआज़ रहमतुल्लाहि अलैहि बयान करते हैं कि इमाम वकीअ़ बिन जर्राह रहमतुल्लाहि अलैहि ने हलाला को मलऊन फ़ेल क़रार देते हुए फ़रमाया:
يَنْبَغِي أَنْ يُرْمَى بِهَذَا الْبَابِ مِنْ قَوْلِ أَصْحَابِ الرَّأْيِ
"इस बारे में अहल-ए-राय अहनाफ की बात निकाह-ए-हलाला के जवाज़ को फेंक देना चाहिए।" [सुनन तिरमिज़ी: 1120] के तहत, और इसकी सनद सही है।
इमाम तिरमिज़ी (रहमतुल्लाहि अलैहि) फ़रमाते हैं:
بِهِ يَقُولُ سُفْيَانُ الثَّوْرِيُّ وَابْنُ الْمُبَارَكِ وَالشَّافِعِيُّ وَأَحْمَدُ وَإِسْحَاقُ
"इमाम सुफ़ियान सौरी, इमाम अब्दुल्लाह बिन मुबारक, इमाम शाफ़ई, इमाम अहमद बिन हंबल और इमाम इसहाक़ बिन राहविया रहमतुल्लाहि अलैहिम का भी यही फ़तवा है कि हलाला मलऊन फ़ेल है।"[सुनन तिरमिज़ी: 1120] के तहत)
इस्माईल बिन सईद शालंजी रहमतुल्लाहि अलैहि बयान करते हैं:
سَأَلْتُ أَحْمَدَ عَنِ الرَّجُلِ يَتَزَوَّجُ الْمَرْأَةَ وَفِي نَفْسِهِ أَنْ يُحَلَّلَهَا لِزَوْجِهَا الْأَوَّلِ وَلَمْ تَعْلَمِ الْمَرْأَةُ بِذَلِكَ؟ قَالَ : هُوَ مُحَلِّلٌ ، إِذَا أَرَادَ بِذَلِكَ الْإِحْلَالَ فَهُوَ مَلْعُونٌ
"मैंने इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाहि अलैहि से पूछा कि एक शख़्स औरत से निकाह करता है, उसकी नियत है कि वह उसे पहले खाविंद के लिए हलाल कर दे, मगर औरत यह सब नहीं जानती? फ़रमाया: यह शख़्स 'मुहल्लिल' (हलाला करने वाला) है। अगर इस निकाह से उसका मक़सद हलाला करना है, तो वह मलऊन है।" [बयानुल दलील लिल-इब्न तैमिया: 41]
हाफ़िज़ इब्न अब्दुल बर्र रहमतुल्लाहि अलैहि (463 हिजरी) फ़रमाते हैं:
يَكُونُ كَنِكَاحِ الْمُتْعَةِ وَيُبْطَلُ هُذَا هُوَ الصَّحِيحُ وَاللَّهُ أَعْلَمُ
"निकाह-ए-हलाला, निकाह-ए-मुतआ की तरह है, इसे बातिल करार दिया जाएगा, यही दुरुस्त बात है, वल्लाहु आलम !" [अत-तमहीद लिमा फ़िल-मुवत्ता मिनल-मआनी वल-असानिद: 13/234]
हलाला, मुताअख़िरीन अहल-ए-इल्म की नज़र में:
काज़ी बैज़ावी (रहमतुल्लाहि अलैहि (685 हिजरी) फ़रमाते हैं: "हलाला करने वाला वह है, जो ऐसी औरत से शादी करता है जिसे तीन तलाक़ें दे दी गई हैं, शादी से उसका इरादा यह होता है कि वह वती के बाद उसे तलाक़ दे देगा, ताकि जिस शौहर ने पहले तलाक़ दी थी, उसके लिए हलाल हो जाए, गोया वह निकाह और वती के साथ उस औरत को पहले खाविंद पर हलाल कर रहा है। जिसके लिए हलाला किया जा रहा है, उससे मुराद पहला शौहर है। इन दोनों पर लानत इसलिए की गई है, क्योंकि यह अमल उनकी हतक-ए-इज़्ज़त और कि़ल्लत ग़ैरत का बाइस है, नीज़ यह अमल उनके कमीने और घटियापन पर दलालत करता है। जिसके लिए हलाला किया जा रहा है, उसकी ब-निस्बत तो यह बिल्कुल वाज़ेह है, जबकि हलाला करने वाले की ब-निस्बत इस तरह कि उसने किसी की ग़रज़ के लिए औरत से वती करके खुद को गिरा दिया है, क्योंकि उसने वती इसलिए की है, ताकि वह उसे उस शख़्स को वती के लिए दे, जिसके लिए हलाला किया गया है। इसीलिए नबी करीम ﷺ ने इसे 'किराए के सांड' से तस्बीह दी है।" [तुहफ़तुल अबरार: 2/392, मिरक़ातुल मफ़ातीह लिल-मुल्ला अली क़ारी: 5/2149]
शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रहमतुल्लाहि अलैहि (728 हिजरी) फ़रमाते हैं:
نِكَاحُ الْمُحَلِّلِ شَرٌّ مِنْ نِكَاحِ الْمُتْعَةِ، فَإِنَّ نِكَاحَ الْمُحَلِلِ لَمْ يَبْحْ قَطُّ، فَهُوَ يُثْبِتُ الْعَقْدَ لِيُزِيلَهُ، وَهُذَا لَا يَكُونُ مَشْرُوعًا بِحَالٍ
"निकाह-ए-हलाला निकाह-ए-मुतआ से भी ज़्यादा बुरा है, क्योंकि निकाह-ए-हलाला कभी भी हलाल नहीं रहा। वह हलाला करने वाला निकाह का इक़्रार सिर्फ उसे ख़त्म करने के लिए करता है, और यह किसी भी हाल में शरीयत के मुताबिक़ नहीं हो सकता।" [मज्मूअल फ़तावा: 32/108]
नीज़ (साथ ही) फ़रमाते हैं:
دَلَّتِ السُّنَّةُ وَإِجْمَاعُ الصَّحَابَةِ مَعَ دِلَالَةِ الْقُرْآنِ وَشَوَاهِدِ الْأُصُولِ عَلَى تَحْرِيمِهِ وَفَسَادٍ
"क़ुरआन और दीनी शवाहिद की दलालात के साथ-साथ हदीस और इजमा-ए-सहाबा भी दलालत-कुनां हैं कि निकाह-ए-हलाला हराम और फ़ासिद है।" [मज्मूअल फ़तावा: 35/295]
नीज़ (साथ ही) फ़रमाते हैं:
نِكَاحُ التَّحْلِيلِ الَّذِي اتَّفَقَتِ الْأُمَّةُ عَلَى بُطْلَانِهِ
"निकाह-ए-हलाला के बातिल होने पर उम्मत का इत्तेफ़ाक़ है।" [मज्मूअल फ़तावा: 32/152, अल-फ़तावा अल-कुब्रा: 3/96]
मज़ीद आगे फ़रमाते हैं:
اتَّفَقَ عَلَى تَحْرِيمِ ذَلِكَ أَصْحَابُ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، وَالتَّابِعُونَ لَهُمْ بِإِحْسَانٍ
"निकाह-ए-हलाला की हुरमत (हराम होने) पर असहाब-ए-रसूल ﷺ और ताबेईन-ए-एज़ाम का इत्तेफ़ाक़ है।" [अल-फ़तावा अल-कुब्रा: 3/95]
नीज़ साथ ही फ़रमाते हैं:
تَبَيَّنَ بِالنُّصُوصِ وَإِجْمَاعِ الصَّحَابَةِ فَسَادُ هَذِهِ الْأَنْكِحَةِ
"नसूस-ए-शरईया और इजमा-ए-सहाबा से साबित हुआ कि ये मज़कूरा तमाम निकाह (जिनमें निकाह-ए-हलाला भी शामिल है) फ़ासिद हैं।" [मज्मूअल फ़तावा: 32/159]
अल्लामा इब्नुल क़य्यिम रहमतुल्लाहि अलैहि (751 हिजरी) हलाला को जायज़ कहने वालों का रद करते हैं:
أَمَّا فِي هَذِهِ الْأَزْمَانِ الَّتِي قَدْ شَكَتِ الْفُرُوجُ فِيهَا إِلَى رَبِّهَا مِنْ مَفْسَدَةِ التَّحْلِيلِ، وَقُبْحِ مَا يَرْتَكِبُهُ الْمُحَلِّلُونَ مِمَّا هُوَ رَمْدٌ بَلْ عَمْيٌ فِي عَيْنِ الدِّينِ وَشُجِّى فِي حُلُوقِ الْمُؤْمِنِينَ، مِنْ قَبَائِحَ تُشَمِّتُ أَعْدَاءَ الدِّينِ بِهِ، وَتَمْنَعُ كَثِيرًا مِّمَّنْ يُرِيدُ الدُّخُولَ بِسَبَبِهِ، بِحَيْثُ لَا يُحِيطُ بِتَفَاصِيلِهَا خِطَابٌ، وَلَا يَحْصُرُهَا كِتَابٌ، يَرَاهَا الْمُؤْمِنُونَ كُلُّهُمْ مِنْ أَقْبَحِ الْقَبَائِحِ، وَيَعُدُّونَهَا مِنْ أَعْظَمِ الْفَضَائِحِ، قَدْ قَلَّبَتْ مِنَ الدِّينِ رَحْمَهُ، وَغَيَّرَتْ مِنْهُ اسْمَهُ، وَضَمَّخَ التَّيْسُ الْمُسْتَعَارُ فِيهَا الْمُطَلَّقَةَ بِنَجَاسَةِ التَّحْلِيلِ ، وَقَدْ زَعَمَ أَنَّهُ قَدْ طَيِّبَهَا لِلْحَلِيلِ، فَيَا لِلَّهِ الْعَجَبُ! أَيُّ طِيبٍ أَعَارَهَا هُذَا التَّيْسُ الْمَلْعُونُ؟ وَأَيُّ مَصْلَحَةٍ حَصَلَتْ لَهَا وَلِمُطَلِّقِهَا بِهَذَا الْفِعْلِ الدُّونِ
"मौजूदा दौर में इज़्ज़तें हलाला की क़बाहतों और हलाला करने वालों की फ़ज़ाहतों पर अपने रब के दरबार में शिकायत-कुनां हैं। यह फ़ेल-ए-शनीय दीन-ए-इस्लाम की आँख का तिनका और मोमिनों के गले का काँटा बन चुका है। ऐसी कार्रवाइयाँ दुश्मनान-ए-इस्लाम को हँसाती हैं और इसके क़रीब आने वालों को दूर ले जाती हैं। न कोई तक़रीर इन मफ़ासिद को अल्फ़ाज़ में समेट सकती है और न कोई तहरीर इन ख़राबियों को औराक़ में लपेट सकती है। तमाम मोमिन इस हलाला को चोटी की क़बाहत और इंतिहा की फ़ज़ाहत समझते हैं। इसने दीन का नाम तब्दील और उसका ढाँचा तहलील कर दिया है। किराए का यह सांड पाक औरत को इस हलाला की नजासत में लतपत करके समझता है कि मैंने इसे खाविंद के लिए हलाल कर दिया है। वाए-ताज्जुब की बात है इस घटिया करतूत से मुतल्लाक़ा औरत और उसके ख़ाविंद के लिए इस कमीने ने कौन सा कमाल कर दिया है? [इलामुल मुवक्किईन: 3/52-53]
नीज़ फ़रमाते हैं:
ثُمَّ سَلْ مَنْ لَهُ أَدْنَى اطَّلَاعُ عَلَى أَحْوَالِ النَّاسِ : كَمْ مِنْ حُرَّةٍ مَصُونَةٍ أَنْشَبَ فِيهَا الْمُحَلِّلُ مَخَالِبَ إِرَادَتِهِ فَصَارَتْ لَهُ بَعْدَ الطَّلَاقِ مِنَ الْأَخْدَانِ وَكَانَ بَعْلُهَا مُنْفَرِدًا بِوَطْئِهَا فَإِذَا هُوَ وَالْمُحَلِّلُ فِيهَا بِبَرَكَةِ التَّحْلِيلِ شَرِيكَانِ؟ فَلَعَمْرُ اللَّهِ كَمْ أَخَرَجَ التَّحْلِيلُ مُخَدَّرَةً مِنْ سِتْرِهَا إِلَى الْبِغَاءِ، وَأَلْقَاهَا بَيْنَ بَرَائِنِ الْعُشَرَاءِ وَالْحُرَفَاءِ
"उन लोगों से पूछकर तो देखो, जिन्होंने हालात-ए-हाज़िरा की तरफ थोड़ा सा भी ध्यान दिया है कि कितनी पाक-दामन युवतियों को इन सांडों ने अपने नापाक इरादों के पंजों से लहूलुहान किया। चुनाँचे, तलाक़-ए-हलाला के बाद भी दोनों ने आपसी जान-पहचान रखी और इस 'हलाला' की बरकत से असल शौहर के साथ-साथ इस सांड ने भी औरत तक अपनी पहुँच रखी। खुदा की कसम, इस घिनौने काम की वजह से कितनी ही पर्दानशीं औरतें बग़ावत पर आमादा हैं और उन लोगों के चंगुल में फँस चुकी हैं जो फहशा और बेहयाई के शौकीन हैं।[इलामुल मुवक्किईन: 3/54-55]
अल्लामा शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि अलैहि (1176 हिजरी) फ़रमाते हैं:
فِيهِ وَقَاحَةٌ وَإِهْمَالُ غَيْرَةٍ وَتَسْوِيعُ ازْدِحَامٍ عَلَى الْمَوْطُونَةِ مِنْ غَيْرِ أَنْ يَدْخُلَ فِي تَضَاعِيفِ الْمُعَاوَنَةِ، نُهِيَ عَنْهُ
"इसमें हलाला में बे-ग़ैरती और बे-हयाई मौजूद है, इस तरह कि इससे 'एक औरत कई शौहरों के विचार' का होता है, हालांकि यह नेकी के काम में आपसी सहयोग के दायरे में भी नहीं आता, लिहाज़ा इससे मना कर दिया गया है। [हुज्जतुल्लाहिल बालिग़ा: 2/139]
अल्लामा सनआनी रहमतुल्लाहि अलैहि (1182 हिजरी) फ़रमाते हैं:
الْحَدِيثُ دَلِيلٌ عَلَى تَحْرِيمِ التَّحْلِيلِ لِأَنَّهُ لَا يَكُونُ اللَّعْنُ إِلَّا عَلَى فَاعِلِ الْمُحَرَّمِ، وَكُلُّ مُحَرَّمٍ مَنْهِي عَنْهُ، وَالنَّهْيُ يَقْتَضِي فَسَادَ الْعَقْدِ وَاللَّعْنَ
"यह हदीस इस बात की दलील है कि हलाला करना हराम है, क्योंकि लानत हमेशा हराम काम करने वाले पर ही होती है। हर हराम काम मना है, और वर्जित काम निकाह के फ़ासिद होने और लानत का कारण बनता है।" [सुबुलुस-सलाम: 2/187]
अल्लामा-ए-हिंद नवाब सिद्दीक़ हसन ख़ान रहमतुल्लाहि अलैहि (1307 हिजरी) फ़रमाते हैं:
أَقُولُ : حَدِيثُ لَعْنِ الْمُحَلِّلِ مَرْوِيٌّ مِنْ طَرِيقِ جَمَاعَةٍ مِّنَ الصَّحَابَةِ بِأَسَانِيدَ، بَعْضُهَا صَحِيحٌ وَبَعْضُهَا حَسَنٌ، وَاللَّعْنُ لَا يَكُونُ إِلَّا عَلَى أَمْرٍ غَيْرِ جَائِرٍ فِي الشَّرِيعَةِ الْمُطَهَّرَةِ بَلْ عَلَى ذَنْبٍ هُوَ مِنْ أَشَدِّ الذُّنُوبِ فَالتَّحْلِيلُ غَيْرُ جَائِزِ فِي الشَّرْعِ وَلَوْ كَانَ جَائِزًا لَّمْ يُلْعَنْ فَاعِلُهُ وَالرَّاضِي بِهِ وَإِذَا كَانَ الْفَاعِلُ يَدُلُّ عَلَى تَحْرِيمِ فِعْلِهِ لَمْ تَبْقَ صِيغَةٌ تَدُلُّ عَلَى التَّحْرِيمِ قَطُّ وَإِذَا كَانَ هُذَا الْفِعْلُ حَرَامًا غَيْرَ جَائِرٍ فِي الشَّرِيعَةِ، فَلَيْسَ هُوَ النِّكَاحُ الَّذِي ذَكَرَهُ اللَّهُ فِي قَوْلِهِ : حَتَّى تَنْكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُ كَمَا أَنَّهُ لَوْ قَالَ : لَعَنَ اللهُ بَائِعَ الْخَمْرِ لَمْ يَلْزَمْ مِنْ لَفْظِ بَائِعٍ أَنَّهُ قَدْ جَازَ بَيْعُهُ وَصَارَ مِنَ الْبَيْعِ الَّذِي أُذِنَ فِيهِ بِقَوْلِهِ : ﴿وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ وَالْأَمْرُ ظَاهِرُ
"मैं कहता हूँ कि हलाला करने वाले पर लानत की अहादीस सहाबा की एक जमात से मरवी हैं, जिनमें से बाज़ की सनद सही और बाज़ की हसन है। लानत हमेशा उसी काम पर की जाती है जो शरीयत की नज़र में नाज़ायज़ हो, बल्कि जो बहुत बड़ा गुनाह हो। लिहाज़ा हलाला करना नाज़ायज़ फ़ेल (कार्य) है, क्योंकि अगर हलाला जायज़ होता, तो हलाला करने वाले और उस पर राज़ी होने वाले पर लानत न की जाती। जब फ़ाएल (हलाला करने वाला) ही अपने फ़ेल की हुरमत (निषेध) पर दलालत-कुनां (संकेत देने वाला) है, तो इस फ़ेल की हुरमत पर किसी और लफ़्ज़ की ज़रूरत न रही। और जब यह फ़ेल ही हराम और नाज़ायज़ हुआ, तो यह वह निकाह न हुआ जिसका ज़िक्र अल्लाह तआला ने किया है: ﴿حَتَّى تَنْكِحَ زَوْجًا غَيْرَه﴾ (हत्ता कि वह किसी और से अज़दवाज कर ले/निकाह कर ले)। मसलन जैसे कोई कहे कि अल्लाह तआला ने शराब की बैअ (बेचने) करने वाले पर लानत की है, लेकिन 'बाए' के लफ़्ज़ से यह लाज़िम नहीं आता कि शराब की बैअ जायज़ है और अल्लाह तआला की इजाज़त दी हुई बैअ में दाख़िल है: وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ अल्लाह तआला ने बैअ को हलाल किया है। बात बिल्कुल वाज़ेह है रद की ज़रूरत नहीं।" [अर-रौज़तुल नदिय्या: 2/17-18]
इजमा-ए-उम्मत और हलाला:
अल्लामा इब्न क़ुदामा रहमतुल्लाहि अलैहि (620 हिजरी) फ़रमाते हैं:
جُمْلَتُهُ أَنَّ نِكَاحَ الْمُحَلِّلِ حَرَامٌ بَاطِلٌ، فِي قَوْلِ عَامَّةِ أَهْلِ الْعِلْمِ ..... وَقَوْلُ مَنْ سَمَّيْنَا مِنَ الصَّحَابَةِ، وَلَا مُخَالِفَ لَهُمْ، فَيَكُونُ إِجْمَاعًا
"ख़ुलासा-ए-कलाम यह है कि हलाला का निकाह हराम और बातिल है, सब अहल-ए-इल्म का यही मज़हब है जिन सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम के हमने नाम ज़िक्र किए हैं, उनका भी यही मज़हब है, सहाबा में कोई इसका विरोधी नहीं, लिहाज़ा इस पर सहाबा का इजमा हुआ।" [अल-मुग़नी: 7/180-182]
शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रहमतुल्लाहि अलैहि (728 हिजरी) फ़रमाते हैं:
قَدِ اتَّفَقَ أَئِمَّةُ الْفَتْوَى كُلُّهُمْ أَنَّهُ إِذَا شُرِطَ التَّحْلِيلُ فِي الْعَقْدِ كَانَ بَاطِلًا
"तमाम अइम्मा-ए-फ़तवा (फ़तवा देने वाले सभी इमामों) का इत्तेफ़ाक़ है कि जब निकाह में हलाला की शर्त लगाई जाए, तो वह बातिल हो जाता है।" [मज्मूअल फ़तावा: 32/155]
अल्लामा इब्नुल क़य्यिम रहमतुल्लाहि अलैहि (751 हिजरी) फ़रमाते हैं:
نِكَاحُ الْمُحَلِّلِ لَمْ يُبَحْ فِي مِلَّةٍ مِّنَ الْمِلَلِ قَطُّ وَلَمْ يَفْعَلْهُ أَحَدٌ مِّنَ الصَّحَابَةِ ، وَلَا أَفْتَى بِهِ وَاحِدٌ مِّنْهُمْ
"हलाला किसी भी दीन में कभी भी हलाल नहीं हुआ। न किसी सहाबी ने निकाह-ए-हलाला किया, और न इसके जवाज़ का फ़तवा दिया।" [इलामुल मुवक्किईन: 3/44]
अल्लामा किरमानी हनफ़ी रहमतुल्लाहि अलैहि (854 हिजरी) फ़रमाते हैं:
بُطْلَانُ النِّكَاحِ حِينَئِذٍ اتِّفَاقًا
हलाला की नियत से किया जाने वाला यह निकाह बिल-इत्तिफ़ाक़ बातिल है। [शरह अल-मसाबीह: 4/33]
फ़ायदा:
शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रहमतुल्लाहि अलैहि (728 हिजरी) फ़रमाते हैं:
لَا تُجْبَرُ الْمَرْأَةُ عَلَى نِكَاحِ التَّحْلِيلِ بِاتِّفَاقِ الْعُلَمَاءِ
"उलेमा का इत्तेफ़ाक़ है कि औरत को निकाह-ए-हलाला पर मजबूर नहीं किया जा सकता।" [मज्मूअल फ़तावा: 32/61]
किसी औरत को उसका शौहर या उसका वली निकाह-ए-हलाला पर मजबूर नहीं कर सकता।
हलाला के जवाज़ (जायज़ होने) पर दलाइल का जाइज़ा:
इमाम मुहम्मद बिन सीरीन रहमतुल्लाहि अलैहि से मरवी है:
أَرْسَلَتِ امْرَأَةٌ إِلَى رَجُلٍ فَزَوَّجَتْهُ نَفْسَهَا لِيُحِلُّهَا لِزَوْجِهَا، فَأَمَرَهُ عُمَرُ أَنْ يُقِيمَ عَلَيْهَا وَلَا يُطَلِّقَهَا، وَأَوْعَدَهُ بِعَاقِبَةٍ إِنْ طَلَّقَهَا
"एक औरत ने एक शख़्स को निकाह का पैग़ाम भेजा और उससे शादी कर ली, इस नियत से कि वह उसका हलाला कर दे। तो सैय्यदना उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने उस हलाला करने वाले शख़्स को निकाह को क़ायम रखने का हुक्म दिया और तलाक़ देने से मना किया, नीज़ तलाक़ की सूरत में सज़ा की वईद भी सुना दी।" [मुसन्निफ़ अब्दुल रज्ज़ाक़: 6/267, सुनन सईद बिन मन्सूर: 1999] सनद ज़ईफ़ है।
मुहम्मद बिन सीरीन का सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु से समाअ {सुनना और मिलना} नहीं है।
इब्न जुरैज रहमतुल्लाहि अलैहि से मरवी है:
قُلْتُ لِعَطَاءٍ: إِنْسَانٌ نَكَحَ امْرَأَةً مُحَلِّلًا عَامِدًا، ثُمَّ رَغِبَ فِيهَا فَأَمْسَكَهَا؟ قَالَ: لَا بَأْسَ بِذٰلِكَ۔
"मैंने अता बिन अबी रबाह रहमतुल्लाहि अलैहि से पूछा: एक शख़्स ने किसी औरत से हलाला की नियत से निकाह किया, फिर उसमें रग़बत पैदा हुई, तो उसने उसे अक़्द निकाह में ही रखा तलाक़ नहीं दी फ़रमाया: इसमें कोई हरज बुराई नहीं।" [मुसन्निफ़ अब्दुल रज्ज़ाक़: 10696] सनद ज़ईफ़ है, अब्दुल रज्ज़ाक़ का 'अनअना' है।
इमाम शअ़बी रहमतुल्लाहि अलैहि से मरवी है:
"لَا بَأْسَ إِذَا لَمْ يَأْمُرْ بِهِ الزَّوْجُ"
"अगर पहला शौहर तलाक़ देने का हुक्म न दे, तो हलाला करने वाले के लिए औरत को अपने पास रखने में कोई हरज नहीं।" [मुसन्निफ़ अब्दुल रज्ज़ाक़: 10789] सनद ज़ईफ़ है, अब्दुल रज्ज़ाक़ का 'अनअना' है।
उरवा बिन ज़ुबैर रहमतुल्लाहि अलैहि के बारे में है:
إِنَّهُ كَانَ لَا يَرَى بِالتَّحْلِيلِ بَأْسًا، إِذَا لَمْ يَعْلَمْ أَحَدُ الزَّوْجَيْنِ
आप रहमतुल्लाहि अलैहि निकाह-ए-हलाला में कोई हरज ख़्याल नहीं करते थे, जब मियाँ-बीवी में से किसी एक को इस बात का इल्म न हो।" [मुसन्निफ़ अब्दुल रज्ज़ाक़: 10782] सनद ज़ईफ़ है, अब्दुल रज्ज़ाक़ का 'अनअना' है।
एक सहाबी से मरवी है:
إِنَّ رَجُلًا طَلَّقَ امْرَأَتَهُ عَلَى عَهْدِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثَلَاثًا، ثُمَّ تَزَوَّجَتْ زَوْجًا غَيْرَهُ لِيُحِلَّهَا، فَدَخَلَ بِهَا الزَّوْجُ الثَّانِي، وَطَلَّقَهَا ، وَانْقَضَتْ عَدَّتُهَا ، فَأَرَادَ الْأَوَّلُ أَنْ يَتَزَوَّجَهَا، فَذَكَرُوا ذَلِكَ لِلنَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ : أَلَيْسَ سَمَّى لَهَا صَدَاقًا؟ قَالُوا : بَلَى؛ قَالَ : أَلَيْسَ تَزَوَّجَهَا بِوَلِيٍّ؟ قَالُوا : بَلَى؛ قَالَ : أَلَيْسَ تَزَوَّجَهَا بِشُهُودٍ؟ قَالُوا : بَلَى، قَالَ : أَلَيْسَ قَدْ دَخَلَ بِهَا حَتَّى ذَاقَ عُسَيْلَتَهَا وَذَاقَتْ عُسَيْلَتَهُ؟ قَالُوا : بَلَى؛ فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : ذَهَبَ الْخِدَاعُ، ذَهَبَ الْخِدَاعُ .
"अहद-ए-नबवी में एक शख़्स ने अपनी बीवी को तीन तलाक़ें दे दीं। फिर औरत ने दूसरे शख़्स से शादी की, ताकि वह उसे पहले शौहर के लिए हलाल कर दे। दूसरे खाविंद ने उससे अज़दवाजी ताल्लुक़ क़ायम किया और उसे तलाक़ दे दी। इद्दत गुज़र गई, तो पहले खाविंद ने उससे दोबारा शादी करने का इरादा किया। सहाबा ने यह तमाम माजरा नबी करीम ﷺ के गोशगुज़ार किया सामने रखा, तो आप ﷺ ने पूछा: क्या उसने दूसरे खाविंद ने औरत का हक़-मेहर अदा किया था? सहाबा ने अर्ज़ किया: जी हाँ। फ़रमाया: क्या यह शादी वली की इजाज़त से हुई? अर्ज़ किया: जी हाँ। फ़रमाया: क्या यह निकाह गवाहों की मौजूदगी में हुआ? अर्ज़ किया: जी हाँ। फ़रमाया: क्या उसने उससे अज़दवाजी ताल्लुक़ क़ायम किया? अर्ज़ किया: जी हाँ। तो नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया: फिर धोखा न रहा, धोखा न रहा।" यह रिवायत झूठी मनगढ़ंत है। [इल्लल अल-हदीस लिल-इब्न अबी हातिम: 1285]
- मूसा बिन मुतैर कूफ़ी मतरूक और कज़्ज़ाब (झूठा) है।
- मुतैर बिन अबी ख़ालिद कूफ़ी ज़ईफ़ और मुनकरुल हदीस है।
इमाम अबू ज़ुरआ राज़ी रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
هذَا وَاهِ، ضَعِيفٌ، بَاطِلٌ ، غَيْرُ ثَابِتٍ وَلَا صَحِيحٍ، وَلَا أَعْلَمُ بَيْنَ أَهْلِ الْعِلْمِ بِالْحَدِيثِ خِلَافًا أَنَّهُ حَدِيثٌ وَاءٍ ضَعِيفٌ لَا تَقُومُ بِمِثْلِهِ حُجَّةٌ
"कमज़ोर, ज़ईफ़, बातिल और ग़ैर-साबित नहीं। इस हदीस के ज़ईफ़ व ग़ैर-साबित होने के बारे में मुझे मुहद्दिसीन के माबैन किसी इख़्तिलाफ़ का इल्म नहीं, इस जैसी रिवायत से हुज्जत क़ायम नहीं होती।" [इल्लल अल-हदीस लिल-इब्न अबी हातिम:1285 के तहत]
फ़ायदा:
निकाह-ए-हलाला और निकाह-ए-मुतआ का तक़ाबल किया जाए, तो बाज़ अहल-ए-इल्म ने निकाह-ए-हलाला को कई वजहों से निकाह-ए-मुतआ से संगीन और बदतर क़रार दिया है। जैसा कि शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रहमतुल्लाहि अलैहि (728 हिजरी) ने ब-तफ़्सील बयान फ़रमाया है, हम इख़्तिसार के साथ वे तमाम सूरतें ज़िक्र किए देते हैं, मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:
1. निकाह-ए-मुतआ इब्तिदा-ए-इस्लाम इस्लाम के शुरुआती दौर में मशरू (जायज़) था, जबकि निकाह-ए-हलाला इस्लाम के किसी दौर में भी मशरू नहीं रहा।
2. मुतआ की मन्सूख़ियत और हुरमत से पहले सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने अहद-ए-नबवी में मुतआ किया, लेकिन किसी सहाबी ने निकाह-ए-हलाला नहीं किया।
3. मुतआ के बारे में सहाबा के दरमियान इख़्तिलाफ़ था, जैसे सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा इसके जवाज़ के क़ायल थे जिन्होंने बाद में रुजू कर लिया था मगर निकाह-ए-हलाला के मुताल्लिक़ सहाबा किराम के यहाँ कभी कोई इख़्तिलाफ़ न रहा।
4. गो कि दोनों निकाह ही बातिल और हराम हैं, मगर हलाला करने और कराने वाले पर रसूल अल्लाह ﷺ ने लानत फ़रमाई है, जबकि ऐसी लानत निकाह-ए-मुतआ करने और कराने वाले के मुताल्लिक़ नहीं है।
हलाला करने वाले का निकाह-ए-हलाला में कोई मक़सद नहीं होता, सिवाए इसके कि वह किसी दूसरे के लिए उसकी बीवी हलाल कर रहा होता है। इसीलिए उसे 'उधार का सांड' (अल-तैस अल-मुस्तआर) कहा जाता है, जैसे सांड को जुफ्ती कराने के लिए उधार लिया जाता है, जबकि निकाह-ए-मुतआ में कम से कम ऐसी सूरत नहीं होती।
हलाला करने वाला अल्लाह तआला की हराम की हुई चीज़ को हीले के साथ हलाल करने की जुर्रत करता है, जबकि निकाह-ए-मुतआ में ऐसा कोई हीला नहीं होता।
निकाह-ए-मुतआ करने वाला औरत से निकाह अपने फ़ायदे के लिए करता है ताकि वह औरत उसके लिए हलाल हो जाए, जबकि निकाह-ए-हलाला करने वाला उस औरत को किसी दूसरे के लिए हलाल कर रहा होता है। इस निकाह में उसका मक़सद उस औरत को अपने लिए हलाल करना नहीं होता।
निकाह-ए-हलाला शरीयत और फ़ितरत दोनों की रू से हराम है, इसीलिए इस्लाम के किसी दौर में जायज़ नहीं रहा, जबकि निकाह-ए-मुतआ शरीयत की रू से हराम है। अगर यह फ़ितरतन क़ाबिल-ए-नफ़रत होता, तो इस्लाम के किसी दौर में भी मुबाह (जायज़) न होता।
* निकाह-ए-मुतआ किसी सवारी को तयशुदा वक़्त के लिए किराए पर लेने की तरह है, लेकिन निकाह-ए-हलाला किसी चीज़ से मुशाबह नहीं है। इसीलिए इसे ज़िना क़रार दिया गया है और जानवरों की जुफ्ती के मुशाबह कहा गया है।
* अल्लाह तआला ने ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त और निकाह जैसे अस्बाब को मुक़र्रर किया है; बैअ को मन्फ़अ़त के मुल्क (यानी चीज़ के फ़ायदे का मालिक बनने) का सबब बनाया और निकाह को जिमाअ के फ़ायदे का मालिक बनने का सबब बनाया, जबकि हलाला करने वाला अल्लाह की शरीयत का मुख़ालिफ़ है।
क्योंकि उसने अपने निकाह को औरत के (पहले) शोहर के लिए हलाल होने का सबब बनाया है।
हलाला करने वाला मुनाफ़िक़ की मानिन्द है, ब-ज़ाहिर (दिखने में) शौहर बनता है, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं होता; जबकि निकाह-ए-मुतआ करने वाला कम से कम ऐसा नहीं होता।
निकाह-ए-हलाला न ज़माना-ए-जाहिलियत के निकाह के मुशाबह है, न इस्लाम के निकाह के; जबकि निकाह-ए-मुतआ ज़माना-ए-जाहिलियत के निकाह के मुशाबह है, जिसे इब्तिदा-ए-इस्लाम में मुबाह रखा गया, इसलिए इसकी नवइय्यत जाहिलियत और इस्लाम में मौजूद निकाहों से किसी न किसी दर्जे में मुमास़लत रखती है।[इग़ास़तुल लहफ़ान लिल-इब्निल क़य्यिम: 1/277-279]
हलाला के रद में शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिया रहमतुल्लाहि अलैह ने [बयान-उद्-दलील अला इब्ताल-इत-तहलील] के नाम से किताब लिखी, जिसमें बारह वजहों से साबित किया कि हलाला मुतआ से भी बदतर है, इसी तरह आपके तल्मीज़ अल्लामा इब्नुल क़य्यिम अल-जौज़िया रहमतुल्लाहि अलैहि [अद-दलील इला इस्तग्ना अल-मुसाबका अन अत-तहलील] नामी किताब तस्नीफ़ फ़रमाई, जिसमें पचास दलाइल से हलाला का रद किया, इसी तरह हाफ़िज़ इब्न कसीर रहमतुल्लाहि अलैहि ने हलाला के रद में एक जुज़ तालीफ़ की।
Team Islamic Theology

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