क़ुर्बानी के अहकाम व मसाइल
7. हलाल जानवर में हराम अज़ा:
ज़िबह के वक़्त बहने वाला खून बिल-इत्तिफ़ाक़ हराम है। इसके अलावा हलाल जानवर के तमाम अज़ा-ओ-अज्ज़ा हलाल हैं, जबकि अहनाफ़ के नज़दीक हलाल जानवर में सात अज्ज़ा हराम हैं।
अल्लामा इब्न आबिदीन हनफ़ी रहमतुल्लाहि अलैहि (1252 हिजरी) कहते हैं:
الْمَكْرُوهُ تَحْرِيمًا مِّنَ الشَّاةِ سَبْعُ الْفَرْجُ وَالْخُصْيَةُ وَالْغُدَّةُ وَالدَّمُ الْمَسْفُوحُ وَالْمَرَارَةُ وَالْمَثَانَةُ وَالذَّكَرُ
बकरी के सात अंगों को खाना मकरूह-ए-तहरीमी (हराम) है:
2. कपूरे,
3. ग़ुदूद,
4. दम-ए-मसफ़ूह,
5. मरारा,
6. मसाना,
7. अगली शर्मगाह।
[अल-उक़ूद अद-दुर्रिया: 5/1]
अल्लामा रशीद अहमद गंगोही देवबंदी साहब फ़रमाते हैं: "हलाल जानवर की सात चीज़ें खानी मना हैं: ज़कर, फ़रज-ए-मादा, ग़ुदूद, ख़सिया , पिस्ता, है।" [तज़किरातुर रशीद: 1/174]
मुफ्ती अहमद यार खान नईमी बरेलवी साहब लिखते हैं: "हलाल जानवर के बाज़ अज्ज़ा हराम हैं, जैसे खून, पिस्ता, फ़रज, ख़सिया वगैरह।" [तफ़्सीर नूरुल इरफ़ान: 547]
यही बात इमाम-ए-बरेलवियत अहमद रज़ा खान साहब ने भी कही है। [फ़तावा रज़विया: 20/234]
अब अहनाफ़ के दलाईल मुलाहिज़ा हों:
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है:
كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَكْرَهُ مِنَ الشَّاةِ سَبْعًا؛ الْمَرَارَةَ، وَالْمَثَانَةَ، وَالْمَحْيَاةَ، وَالذَّكَرَ، وَالْأُنْثَيَيْنِ، وَالْغُدَّةَ، وَالدَّمَ .
रसूल अल्लाह ﷺ बकरी की सात चीजें नापसंद करते थे:
2. मसाना,
3. (मादा),
4. (नर),
5. कपूरे,
6. गिल्टी,
7. खून (ज़िबह के वक्त बहता हुआ)।
[अल-मुअजम अल-औसत लित-तबरानी: 9480] सनद झूठी (मनगढ़ंत) है:
- यअ़क़ूब बिन इसहाक़ बिन इब्राहिम बिन अब्बाद वास्ती कज़्ज़ाब और वज़्ज़ाअ़ (हदीस गढ़ने वाला) है।
- यह्या बिन अब्दुल हमीद हमानी जमहूर के यहाँ 'ज़ईफ़' है।
हाफ़िज़ इब्नुल मुलाक्किन रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं: "जमहूर ने इसे ज़ईफ़ करार दिया है।" [अल-बद्रुल मुनीर: 3/224]
अब्दुल रहमान बिन ज़ैद बिन असलम भी जमहूर के यहाँ ज़ईफ़ व मतरूक है।
हाफ़िज़ हैसमी रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
الْأَكْثَرُ عَلَى تَضْعِيفه
"अकसर मुहद्दिसीन इसे 'ज़ईफ़' क़रार देते हैं।" [मज्मउज़-ज़वाइद : 2/20]
मुजाहिद बिन जब्र रहमतुल्लाहि अलैहि से मरवी है:
كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَكْرَهُ مِنَ الشَّاةِ سَبْعًا؛ الدَّمَ، وَالْحَيَا، وَالْأُنْثَيَيْنِ ، وَالْغُدَّةَ، وَالذَّكَرَ، وَالْمَثَانَةَ، وَالْمَرَارَةَ
रसूल अल्लाह ﷺ बकरी के सात अंगों को नापसंद करते थे:
2. मादा,
4. ग़ुदूद,
5. नर,
6. मसाना,
7. पित्ता।
[मुसन्निफ़ अब्दुल रज्ज़ाक़: 8771, अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 10/7] यह रिवायत ज़ईफ़ और बातिल है:
मुजाहिद (ताबी) सीधे अल्लाह के रसूल ﷺ से बयान कर रहे हैं।
वासिल बिन अबी जमील ज़ईफ़ है।इमाम यह्या बिन मईन रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:"यह कुछ भी नहीं है।"[अल-जरह वत-तादील लिल-इब्न अबी हातिम: 6/66] इमाम इब्न शाहीन अज़-ज़ुअफ़ा: 666 और हाफ़िज़ इब्नुल जौज़ी रहमतुल्लाहि अलैहि ने इसे 'अज़-ज़ुअफ़ा' (कमज़ोर रावी) में ज़िक्र किया है। इमाम इब्न हिब्बान अत-तिका़त: 7/559 के अलावा किसी ने इसे सिक़ा नहीं कहा।हाफ़िज़ इब्नुल क़त्तान रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:
وَاصِلٌ لَّمْ تَثْبُتْ عَدَالَتُهُ
"वासिल की अदालत साबित नहीं है।" [फ़ैज़ुल क़दीर लिल-मुनावी: 2/100]
मुजाहिद इस रिवायत को सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा के वास्ते से मौसू़लन भी बयान करते हैं। [अल-कामिल लि-इब्न अदी: 5/12, अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 10/7] लेकिन यह रिवायत भी मौज़ू और मनगढ़ंत है। उमर बिन मूसा वजीही बिल-इत्तिफ़ाक़ (सभी अइम्मा के नज़दीक) ज़ईफ़, मुनकरुल हदीस और मतरूक है। इमाम बैहक़ी रहमतुल्लाहि अलैहि इस हदीस को ज़ईफ़ करार देने के बाद इस पर तब्सिरा करते हुए लिखते हैं:
لَا يَصِحُ وَصْلُهُ
"इसका मौसूल होना दुरुस्त नहीं है।" [अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 10/8]
साबित हुआ कि हलाल जानवर में सिवाए 'दम-ए-मसफ़ूह' (ज़िबह के वक्त बहने वाला खून) के कोई चीज़ हराम नहीं है। सात अंगों को हराम कहने वालों का नज़रिया खता पर मबनी क्योंकि उनकी हुरमत पर कोई सिक़ा दलील मौजूद नहीं हो सकी।
फ़ायदा:
ओझड़ी खाना जायज़ है, अहनाफ़ मगर इसको मकरूह करार देते हैं:
1. अल्लामा अब्दुल हई लखनवी हनफ़ी साहब फ़रमाते हैं: "ओझड़ी का खाना मकरूह है।" [मज्मूअल फ़तावा: 3/297]
2. अहमद रज़ा खान बरेलवी साहब लिखते हैं: "ओझड़ी खाना मकरूह है।" [मलफ़ूज़ात: 4/358]
बाज़ हज़रात ने हलाल जानवर में 22 चीज़ें मकरूह या हराम करार दी हैं। गुर्दे के मुताल्लिक़ अल्लामा रशीद अहमद गंगोही देवबंदी साहब कहते हैं:
"बाज़ रिवायतों में गुर्दे की कराहत लिखते हैं और कराहत-ए-तन्ज़ीही पर हमल करते हैं (यानी इसे हल्का नापसंद समझते हैं)।" [तज़किरातुर रशीद: 1/174]
हम कहते हैं कि ओझड़ी और गुर्दे के मकरूह होने पर कोई दलील मौजूद नहीं है।
"अल्लामा अहमद रज़ा खान बरेलवी साहब लिखते हैं:"इमाम अबू हनीफ़ा नुमान बिन साबित रहमतुल्लाहि अलैहि (150 हिजरी) ने फ़रमाया: खून तो हुक्म-ए-क़ुरआन से हराम है और बाक़ी चीज़ों को मैं मकरूह समझता हूँ।"[फ़तावा रज़विया: 20/234] यह इमाम साहब से सनद के साथ साबित नहीं हो सकी।
फ़ायदा:
अल्लामा समरकंदी हनफ़ी (540 हिजरी) लिखते हैं:
نَقُولُ : الْحَيَوَانُ إِذَا ذُبِحَ إِنْ كَانَ مَأْكُولُ اللَّحْمِ يَطْهُرُ بِجَمِيعِ أَجْزَائِهِ إِلَّا الدَّمَ
कहते हैं: "माकूलुल-लहम (हलाल मांस वाले) जानवर को ज़िबह किया जाए, तो उसके तमाम अज़ा पाक हैं, सिवाए दम-ए-मसफ़ूह (ज़िबह के वक्त बहने वाले खून) के।" [तुहफ़तुल फ़ुक़हा: 1/70]
अल-हासिल :
हलाल जानवर में ज़िबह के वक्त बहने वाले खून के अलावा उसका कोई भी अंग हराम या मकरूह नहीं।
Team Islamic Theology

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