क़ुर्बानी के अहकाम व मसाइल
8. ज़ुल-हिज्जा की तकबीरें:
अल्लाह तआला का फ़रमान है:
لِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَى مَا هَدَاكُمْ ﴾ (الحج : ٣٧)
"ताकि तुम अल्लाह तआला की बड़ाई बयान करो, कि उसने तुम्हें हिदायत दी है।" [अल-हज्ज: 37]
अल्लाह तआला का फ़रमान है:
وَاذْكُرُوا اللَّهَ فِي أَيَّامٍ مَّعْدُودَاتٍ ﴾ (البقرة : ٢٠٣)
"और गिनती के (चंद) दिनों में अल्लाह को याद करो।" [अल-बक़रह: 203]
इस आयत की तफ़्सीर में सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा फ़रमाते हैं:
هِيَ أَيَّامُ التَّشْرِيقِ
"यहाँ अय्याम-ए-तशरीक़ मुराद हैं।" [मआरिफ़त-उस-सुनन वल-आसार लिल-बैहक़ी: 4/255] और इसकी सनद सही है
इसकी सनद को हाफ़िज़ इब्नुल मुलाक्किन [अल-बद्रुल मुनीर: 6/430] और हाफ़िज़ इब्न हजर [अत-तलख़ीसुल हबीर: 2/608] ने सही कहा है।
तकबीरात का आग़ाज़ यौम-ए-अरफ़ा 9 ज़ुल-हिज्जा की नमाज़-ए-फ़ज्र से होता है और इख़्तिताम 13 ज़ुल-हिज्जा की असर के बाद होता है। इस पर इमाम अहमद बिन हंबल ने इजमा नक़ल किया है। [अल-उद्दह फ़ी उसूलिल फ़िक़्ह लिल-इब्निल फ़र्रा: 4/1061]
अबू वाएल शक़ीक़ बिन सलमा रहमतुल्लाहि अलैहि बयान करते हैं कि सैय्यदना अली रज़ियल्लाहु अन्हु 9 ज़ुल-हिज्जा को नमाज़-ए-फ़ज्र से लेकर आख़िरी यौम-ए-तशरीक़ 13 ज़ुल-हिज्जा को नमाज़-ए-असर के बाद तक तकबीरात पढ़ते थे। मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा: 2/165, और इसकी सनद सही है।
"ये तकबीरात बुलंद आवाज़ के साथ फर्ज़ नमाज़ों के बाद भी कहनी चाहिए और आम औकात में भी।"
हाफ़िज़ इब्न रजब रहमतुल्लाहि अलैहि (795 हिजरी) फ़रमाते हैं:
اتَّفَقَ الْعُلَمَاءُ عَلَى أَنَّهُ يُشْرَعُ التَّكْبِيرُ عَقِيبَ الصَّلَوَاتِ فِي هَذِهِ الْأَيَّامِ فِي الْجُمْلَةِ ، وَلَيْسَ فِيهِ حَدِيثٌ مَرْفُوعٌ صَحِيحٌ، بَلْ إِنَّمَا فِيهِ آثَارُ عَنِ الصَّحَابَةِ وَمَنْ بَعْدَهُمْ، وَعَمَلُ الْمُسْلِمِينَ عَلَيْهِ
"अहल-ए-इल्म इतनी बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि इन दिनों 9 ज़ुल-हिज्जा से लेकर 13 ज़ुल-हिज्जा की असर तक में फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद तकबीरात कहना मशरू है। इस बाब में कोई मरफ़ू सही हदीस नहीं, अलबत्ता आसार-ए-सहाबा व ताबेईन और मुसलमानों का अमल मन्क़ूल (प्रचलित) है।" [फ़तह-उल-बारी लिल-इब्न रजब: 9/22]
सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में है:
كَانَ يُكَبِّرُ فِي قُبَّتِهِ بِمَنِّى ، فَيَسْمَعُهُ أَهْلُ الْمَسْجِدِ فَيُكَبِّرُونَ، فَيَسْمَعُهُ أَهْلُ السُّوقِ فَيُكَبِّرُونَ حَتَّى تَرْتَجَّ مِنّى تَكْبِيرًا وَاحِدًا
"आप मिना में अपने ख़ैमे में तकबीरात कहते थे कि मस्जिद में मौजूद लोग आपकी तकबीर सुन लेते और वे भी तकबीरात कहने लगते, फिर बाज़ार वाले सुन लेते और वे भी तकबीरात कहने लगते, इस तरह मिना एक साथ तकबीरों से गूँज उठता।" [अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 6267] और इसकी सनद सही है।
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) के बारे में है:
كَانَ يُكَبِّرُ بِمِنِّي تِلْكَ الْأَيَّامَ خَلْفَ الصَّلَوَاتِ، وَعَلَى فِرَاشِهِ،وَفِي فُسْطَاطِهِ، وَفِي مَمْشَائِهِ تِلْكَ الْأَيَّامَ جَمِيعًا
"आप अय्याम-ए-तशरीक़ में मिना के अंदर फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद, बिस्तर पर, ख़ैमे में और चलते-फिरते तकबीरात कहते थे।" [अल-औसत लिल-इब्नुल मुन्ज़िर: 4/299] और इसकी सनद हसन है
इब्राहिम नख़ई रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं कि मुसलमान 9 ज़ुल-हिज्जा को फ़र्ज़ नमाज़ के बाद क़िब्ला की तरफ़ मुँह करके ये तकबीरात पढ़ते थे:
اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ، وَلِلَّهِ الْحَمْدُ
"अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, उसके सिवा कोई माबूद (बरहक़) नहीं, अल्लाह सबसे बड़ा है, तारीफ व सना भी उसी ही की है।" [मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा: 2/167] और इसकी सनद सही है
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा नौ ज़ुल-हिज्जा की नमाज़-ए-फ़ज्र से लेकर तेरहवीं ज़ुल-हिज्जा की शाम तक ये तकबीरात पढ़ते थे:
اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيرًا، اللهُ أَكْبَرُ كَبِيرًا، اللَّهُ أَكْبَرُ وَأَجَلُّ اللَّهُ أَكْبَرُ وَلِلَّهِ الْحَمْدُ .
"अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, वह इंतिहाई अज़मत वाला है, वह सबसे बड़ा है, तारीफ़ भी उसी ही की है।" [मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा: 2/167] और इसकी सनद सही है
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से ये अल्फ़ाज़ भी साबित हैं:
اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ ، وَلِلَّهِ الْحَمْدُ ، اللَّهُ أَكْبَرُ وأَجَلُّ، اللَّهُ أَكْبَرُ عَلَى مَا هَدَانَا
"अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, उसी की तारीफ़ है, अल्लाह सबसे बड़ा है, वह इंतिहाई अज़मत वाला है, अल्लाह सबसे बड़ा है, इस वजह से कि उसने हमें हिदायत दी।" [अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 3/315] और इसकी सनद सही है
सैय्यदना सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु हमें तकबीरात के कलमात सिखाते थे, कहते थे कि इन कलमात के साथ अल्लाह तआला की बड़ाई बयान करें:
اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ كَبِيرًا، اَللَّهُمَّ أَنْتَ أَعْلَى وَأَجَلُّ مِنْ أَنْ تَكُوْنَ لَكَ صَاحِبَةٌ أَوْ يَكُوْنَ لَكَ وَلَدٌ أَوْ يَكُوْنَ لَكَ شَرِيْكٌ فِي الْمُلْكِ أَوْ يَكُوْنَ لَكَ وَلِيٌّ مِّنَ الذُّلِّ وَكَبِّرْهُ تَكْبِيرًا، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَنَا، اَللَّهُمَّ ارْحَمْنَا
"अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, ऐ अल्लाह! तू इससे आला व अजल्ल है कि तेरी कोई बीवी हो या तेरी औलाद हो या बादशाही में तेरा कोई शरीक हो या आज़िज़ी व कमज़ोरी की वजह से तेरा कोई मददगार हो, इस अल्लाह को जानकर इसकी बड़ाई बयान करते रहो, ऐ अल्लाह! हमें माफ़ फ़रमा, ऐ अल्लाह! हम पर रहम फ़रमा!" [अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 3/316] और इसकी सनद सही है
इमाम हसन बसरी रहमतुल्लाहि अलैहिये तकबीरात पढ़ते थे:
اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ
अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है। [अल-सुनन अल-कुब्रा लिल-बैहक़ी: 3/316] और इसकी सनद सही है।
इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाहि अलैहि (204 हिजरी) फ़रमाते हैं:
يُكَبِّرُ النَّاسُ فِي الْآفَاقِ وَالْحَضَرِ وَالسَّفَرِ كَذَلِكَ، وَمَنْ يَحْضُرُ مِنْهُمْ الْجَمَاعَةَ، وَلَمْ يَحْضُرْهَا وَالْحَائِضُ وَالْجُنُبُ وَغَيْرُ الْمُتَوَفِّيءِ فِي السَّاعَاتِ مِنْ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ
"तमाम इलाकों के लोगों को सफ़र-ओ-हज़र में तकबीरात पढ़नी चाहिए, कोई जमात के साथ नमाज़ पढ़े या बग़ैर जमात के। इसी तरह हाइज़ा जुनबी और बे-वज़ू दिन-रात की हर घड़ी में तकबीरात कहें।" [किताबुल-उम्म: 1/275]
- "नबी करीम ﷺ से किसी कलाम के साथ तकबीरात के अल्फ़ाज़ साबित नहीं हैं।
- सुनन दारकुतनी 2/50 वाली मरफ़ू रिवायत सख़्त ज़ईफ़ है।
- इसमें 'अमरो बिन शूमर' मतरूक और कज़्ज़ाब है।
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से ये अल्फ़ाज़ मरवी हैं:"
اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، وَلِلَّهُ الْحَمْدُ
[मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा: 2/167]
सनद ज़ईफ़ है। अबू इसहाक़ सबीई का 'अनअना' है।
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया,
أَكْثِرُوا فِيهَا مِنَ التَّهْلِيلِ وَالتَّحْمِيدِ
"ज़ुल-हिज्जा के अशरे में कसरत से तस्बीह और तहमीद बयान करें।" [मुस्तख़रज अबी अवाना: 3024] सनद ज़ईफ़ है।
इस सनद में मूसा बिन अबी आइशा का ज़िक्र है, यह रावी की ख़ता है।
दरअसल यहाँ यज़ीद बिन अबी ज़ियाद है, जैसा कि दीगर तमाम सनदों में मज़कूर है।
इमाम दारकु़तनी रहमतुल्लाहि अलैहि ने इस सनद को महफ़ूज़ क़रार दिया है, जिसमें यज़ीद बिन अबी ज़ियाद है। [इल्लल अल-दारकु़तनी: 12/376]
यज़ीद बिन अबी ज़ियाद 'सय्यिउल हिफ़्ज़' होने की वजह से ज़ईफ़ है, नीज़ मुदल्लिस भी है। लिहाज़ा यह रिवायत ज़ईफ़ है।
फ़ायदा:
सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के बारे में है:
كَانَ إِذَا صَلَّى وَحْدَهُ فِي أَيَّامِ التَّشْرِيقِ لَمْ يُكَبِّرْ دُبُرَ الصَّلَاةِ
"आप रज़ियल्लाहु अन्हु अय्याम-ए-तशरीक़ में जब अकेले नमाज़ पढ़ते, तो नमाज़ के बाद तकबीरात नहीं कहते थे।" [अल-मुअजम अल-कबीर लित-तबरानी: 12/268] और इसकी सनद सही है
अशरा-ए-ज़ुल-हिज्जा ज़ुल में तकबीरात:
मुजाहिद बिन जब्र रहमतुल्लाहि अलैहि बयान करते हैं:
كَانَ أَبُو هُرَيْرَةَ وَابْنُ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا يَخْرُجَانِ أَيَّامَ الْعَشْرِ إِلَى السُّوقِ، فَيُكَبِّرَانِ، فَيُكَبِّرُ النَّاسُ مَعَهُمَا، لَا يَأْتِيَانِ السُّوقَ إِلَّا لِذلِكَ
"सैय्यदना अबू हुरैरा और सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुम) ज़ुल-हिज्जा के अशरे दस दिनों में बाज़ार की तरफ निकलते और तकबीरात पढ़ते, लोग भी आप दोनों के साथ तकबीरात कहते। आप बाज़ार सिर्फ इसी मक़सद के लिए जाते थे।" [किताबुश-शाफ़ी लिल-अबी बक्र अब्दुल अज़ीज़ बिन जफ़र, और किताबुल ईदैन लिल-अबी बक्र अल-मरुज़ी अल-क़ाज़ी जैसा कि फ़तह-उल-बारी लिल-इब्न रजब: 9/8 में है, अख़बार-ए-मक्का लिल-फ़ाकेही: 1704] और इसकी सनद सही है
साबित हुआ कि ज़ुल-हिज्जा के अशरे शुरुआती दस दिनों में भी तकबीरात कही जा सकती हैं।
Team Islamic Theology

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