क़ुर्बानी के अहकाम व मसाइल
1. ज़ुल-हिज्जा के ज़ी शान अय्याम
ज़ुल-हिज्जा के पहले दस दिन इंतिहाई बा-बरकत और हुरमत वाले हैं, इन अय्याम के नेक आमाल दूसरे दिनों के आमाल-ए-सालिहा पर एक गुना फ़ज़ीलत रखते हैं।अल्लाह तआला का फ़रमान है:
وَلَيَالٍ عَشْرٍ [الفجر : ٢]
दस रातों की कसम!
इमाम तबरी रहमतुल्लाह अलैहि (310 हिजरी) फरमाते हैं:
الصَّوَابُ مِنَ الْقَوْلِ فِي ذَلِكَ عِنْدَنَا أَنَّهَا عَشْرُ الْأَضْحَى لِإِجْمَاعِ الْحُجَّةِ مِنْ أَهْلِ التَّأْوِيلِ عَلَيْهِ
हमारे नज़दीक इस आयत की सहीह तफ़सीर यह है कि यहाँ अशरा-ए-ज़ुल-हिज्जा मुराद है, क्योंकि (अक्सर) मुफ़स्सिरीन के अक़वाल इसी पर जमा होते हैं। [तफ़सीर अत-तबरी: 24/348]
सैय्यदना अब्दुल्ला बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
مَا الْعَمَلُ فِي أَيَّامٍ أَفْضَلَ مِنْهَا فِي هَذِهِ؟ قَالُوا : وَلَا الْجِهَادُ؟
قَالَ : وَلَا الْجِهَادُ ، إِلَّا رَجُلٌ خَرَجَ يُخَاطِرُ بِنَفْسِهِ وَمَالِهِ ، فَلَمْ يَرْجِعْ بِشَيْءٍ
"इन अय्याम के आमाल-ए-सालिहा दूसरे दिनों की ब-निस्बत अल्लाह तआ़ला को ज़्यादा महबूब हैं। अर्ज़ किया गया: दूसरे दिनों में किया जाने वाला जिहाद भी इनसे अफ़ज़ल नहीं? फ़रमाया: नहीं, हाँ! अगर कोई आदमी अपनी जान और माल के साथ अल्लाह के रास्ते में निकले और कुछ वापस न आए।" [सहीह बुखारी: 969, सुनन अबू दाऊद: 2438, सुनन तिरमिज़ी: 757]
इन मुबारक दिनों में नफ़्ली नमाज़, नफ़्ली रोज़ों, सदक़ा-ओ-ख़ैरात, ज़िक्र-ओ-अज़कार, तकबीर-ओ-तहलील और दीगर नेक आमाल का एहतिमाम मौला-ए-रहमान-ओ-रहीम की बे-पायां रहमत और ला-मतनाही मग़फ़िरत का बाइस है। इन दिनों में किए जाने वाले मुबारक आमाल में से एक आली मर्तबत और ज़ी-शान अमल क़ुरबानी भी है, जो इस्लाम का बा-कमाल और मुमताज़ शआर है।
Team Islamic Theology

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