Qurabni ke ahkam o masail : Arfa ka roza

Arfa-ka-roza

क़ुर्बानी के अहकाम व मसाइल

2. अर्फ़ा का रोज़ा

नौ ज़ुल-हिज्जा का रोज़ा मशरू और मुस्तहब है। इसकी बड़ी फ़ज़ीलत है।

सैय्यदना अबू क़तादा अंसारी (रज़ियल्लाहु अन्हु) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ से यौम-ए-अर्फ़ा के रोज़े के मुताल्लिक पूछा गया, तो फ़रमाया:

يُكَفِّرُ السَّنَةَ الْمَاضِيَةَ وَالْبَاقِيَةَ 

यह रोज़ा पिछले और आने वाले साल के (सग़ीरा) गुनाहों का कफ़्फ़ारा है। सहीह मुस्लिम: 1162, तिर्मिज़ी: 749, इमाम अबू अवाना: 2924‌ इमाम इब्ने खुज़ैमा: 2087 इमाम इब्ने हिब्बान: 3631  इमाम हाकिम: 4179 ने सही कहा है।

सैय्यदना सहल बिन साद रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

صَوْمُ عَرَفَةَ كَفَّارَةُ سَنَتَيْنِ 

अर्फ़ा का रोज़ा दो साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है। [मुसन्निफ़ इब्न अबी शैबा: 3/97, मुसनद अब्द बिन हुमैद: 464, मुसनद अबू यअला अल-मौसिली: 7548] और इसकी सनद हसन है।

सैय्यदा आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के बारे में है:

كَانَتْ تَصُومُ يَوْمَ عَرَفَةَ 

आप यौम-ए-अर्फ़ा का रोज़ा रखती थीं। [मुवत्ता इमाम मालिक: 1/375,] और इसकी सनद सही है)

इमाम तिर्मिज़ी (रहमतुल्लाहि अलैहि) फ़रमाते हैं:

قَدِ اسْتَحَبَّ أَهْلُ العِلْمِ صِيَامَ يَوْمِ عَرَفَةَ ، إِلَّا بِعَرَفَةَ

अहले-इल्म ने अफ़रात में मौजूद हज्जाज के अलावा बाकी सब के लिए अर्फ़ा के रोज़े को मुस्तहब करार दिया है।" इमाम अहमद बिन हंबल और इमाम इसहाक़ बिन राहविया, सैय्यदना अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अन्हु)की हदीस के मुताबिक यौम-ए-अर्फ़ा के रोज़े के क़ायल थे। सुनन तिरमिज़ी: 752 के तहत

सैय्यदा उम्मे फ़ज़ल बिन्ते हारिस रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं:

إِنَّ نَاسًا تَمَارَوْا عِنْدَهَا يَوْمَ عَرَفَةَ فِي صَوْمِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ بَعْضُهُمْ : هُوَ صَائِمٌ، وَقَالَ بَعْضُهُمْ : لَيْسَ بِصَائِمٍ، فَأَرْسَلَتْ إِلَيْهِ بِقَدَحٍ لَبَنٍ وَهُوَ وَاقِفٌ عَلَى بَعِيرِهِ ، فَشَرِبَهُ 

मेरे पास कुछ लोगों ने नबी करीम ﷺ के अर्फ़ा के दिन रोज़े के बारे में इख़्तिलाफ़ किया, कुछ ने कहा: आप ﷺ का रोज़ा है और कुछ ने कहा कि आप का रोज़ा नहीं है। तो मैंने नबी करीम ﷺ की तरफ दूध का प्याला भेजा, आप ﷺ उस वक्त ऊँटनी पर सवार थे, तो आप ने वह दूध नोश फ़रमा लिया (पी लिया)। [सहीह बुखारी : 1988, सहीह मुस्लिम : 1123]

हाफ़िज़ बग़वी रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:

هُذَا حَدِيثُ مُتَّفَقٌ عَلَى صِحَّتِهِ 

इस हदीस के सही होने पर इत्तिफ़ाक़ है। [शर्ह अस-सुन्नाह : 6/345]

इस हदीस पर इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलैहि ने यह बाब कायम किया है:

بَابُ صَوْمِ يَوْمِ عَرَفَةَ

यौम-ए-अर्फ़ा के रोज़े का बयान।

हाफ़िज़ इब्न हजर रहमतुल्लाहि अलैहि (852 हिजरी) फ़रमाते हैं:

قَوْلُهُ : فِي صَوْمِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، هُذَا يُشْعِرُ بِأَنَّ صَوْمَ يَوْمِ عَرَفَةَ كَانَ مَعْرُوفًا عِنْدَهُمْ مُعْتَادًا لَّهُمْ فِي الْحَضَرِ وَكَأَنَّ مَنْ جَزَمَ بِأَنَّهُ صَائِمٌ اسْتَنَدَ إِلَى مَا أَلِفَهُ مِنَ الْعِبَادَةِ وَمَنْ جَزَمَ بِأَنَّهُ غَيْرُ صَائِمٍ قَامَتْ عِنْدَهُ قَرِينَةُ كَوْنِهِ مُسَافِرًا وَقَدْ عُرِفَ نَهْيُهُ عَنْ صَوْمِ الْفَرْضِ فِي السَّفَرِ فَضْلًا عَنِ النَّفْلِ

रावी के कौल: नबी करीम ﷺ के रोज़े के मुताल्लिक में इशारा है कि सहाबा के यहाँ यौम-ए-अर्फ़ा का रोज़ा मारूफ था और हज़र (निवास के दौरान) में रखा जाता था। जिन सहाबा ने कहा कि आप ﷺ रोज़े में हैं, उनके मद-ए-नज़र यह था कि नबी करीम ﷺ इबादत से जुड़े रहते थे। (लिहाज़ा आज भी रोज़े से होंगे)। जिन सहाबा ने कहा कि आप ﷺ का रोज़ा नहीं है, उनके पेश-ए-नज़र यह करीना (संकेत) था कि आप मुसाफ़िर हैं और जब सफ़र में फ़र्ज़ रोज़े की मुमानअत (मनाही) है, तो नफ़्ल की बिल-औला (और ज़्यादा) है। [फ़तह अल-बारी: 4/237]

दर असल रोज़ा नौ ज़ुल-हिज्जा का है, चूँकि उस वक्त नबी करीम ﷺ अफ़रात में थे, इस मुनासबत से इसका नाम "सोम-ए-अर्फ़ा" करार पाया। वही दिन चलकर हम तक पहुँचता है। अफ़रात वाले दिन रोज़ा रखना हर एक के लिए मुमकिन नहीं, क्योंकि सऊदी अरब में जब अर्फ़ा का दिन तुलू होता है, तो दुनिया के कई मुल्कों में उस वक्त रात होती है, तो क्या वो रात का रोज़ा रखेंगे? इन्डिया का वक्त सऊदी से दो घंटे आगे है, वहाँ यौम-ए-अर्फ़ा अभी तुलू नहीं हुआ होता कि इन्डिया में सहरी का वक्त खत्म हो जाता है और वहाँ यौम-ए-अर्फ़ा खत्म नहीं हुआ होता कि इन्डिया में इफ़्तार हो जाता है। जब सऊदी से नमाज़ के औक़ात (समय) में फर्क है, तो रोज़ा उनके मुवाफ़िक़ कैसे मुमकिन है?

हज्जाज-ए-किराम अगर मशक्कत महसूस न करें, तो अर्फ़ा का रोज़ा रख सकते हैं, इस बारे में मुमानअत (मनाही) वाली रिवायत साबित नहीं है।

सैय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है:

إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَهَى عَنْ صَوْمٍ يَوْمِ عَرَفَةَ بِعَرَفَةَ

बिला शुबा रसूल अल्लाह ﷺ ने अर्फात में (हाजियों के लिए) यौम-ए-अर्फ़ा का रोज़ा रखने से मना फ़रमाया। [सुनन अबू दाऊद : 2440, सुनन इब्न माजह : 1732] सनद ज़ईफ़ है। मेहदी बिन हर्ब अब्दी "मजहूलुल हाल"है।

इमाम यह्या बिन मईन रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:

لَا أَعْرِفُهُ 

मैं इसे नहीं पहचानता। [अल-जरह वत-तादील लिल-इब्न अबी हातिम: 8/337]

इमाम अहमद बिन हंबल रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:

لَا أَعْرِفُهُ 

"मैं इसे नहीं पहचानता।"

[सवालात अबू दाऊद : 473]

हाफ़िज़ इब्न हज़म रहमतुल्लाहि अलैहि ने इसे "मजहूल" कहा है।

[अल-मुहल्ला बिल-आसार: 4/439]

इस हदीस के बारे में हाफ़िज़ अक़ीली रहमतुल्लाहि अलैहि)फ़रमाते हैं:

لَا يُتَابَعُ عَلَيْهِ وَقَدْ رُوِيَ عَنِ النَّبِيِّ عَلَيْهِ السَّلَامُ بِأَسَانِيدَ جِيَادٍ أَنَّهُ لَمْ يَصُمْ يَوْمَ عَرَفَةَ وَلَا يَصِحُ عَنْهُ أَنَّهُ نَهَى عَنْ صَوْمِهِ 

इस रिवायत पर मुताअबत नहीं की गई। नबी करीम ﷺ से जिय्यद सनदों से यह ज़रूर साबित है कि आप ﷺ ने (अर्फ़ा में) यौम-ए-अर्फ़ा का रोज़ा नहीं रखा, मगर यह साबित नहीं कि आप ﷺ ने (अर्फ़ा में) यौम-ए-अर्फ़ा के रोज़े से मना किया हो। [अल ज़ुअफ़ा अल-कबीर: 1/298]

हाफ़िज़ इब्न हज़म रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:

هذَا لَا يُحْتَجُ بِهِ 

इस हदीस से हुज्जत नहीं ली जाएगी। [अल-मुहल्ला बिल-आसार: 4/439]

सैय्यदना अब्दुल्ला बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है:

مَنْ صَحِبَنِي مِنْ ذَكَرٍ وَأُنْثَى فَلَا يَصُومَنَّ يَوْمَ عَرَفَةَ فَإِنَّهُ يَوْمُ أَكْلٍ وَشُرْبٍ وَذِكْرِ اللَّهِ تَعَالَى 

जो मर्द और औरत मेरे साथ (हज कर रहे) हैं, वो अर्फा (9 ज़ुल-हिज्जा) का रोज़ा हरगिज़ न रखें, क्योंकि ये खाने-पीने और ज़िक्र-ए-इलाही के दिन हैं। [मुसन्निफ़ अब्दुल रज्ज़ाक़: 4/283, नंबर: 7820; अल-मतालिव अल-आलिया लिल-इब्न हजर: 6/173; अख़बार मक्का लिल-फ़ाकिही: 2780] सनद ज़ईफ़ है। 

नुदबा मौलाह मैमूना "मजहूला" है, इसे सिर्फ इमाम इब्न हिब्बान रहमतुल्लाहि अलैहि ने सिक़ात' में ज़िक्र किया है।

अल्लामा इब्न हज़म रहमतुल्लाहि अलैहि फ़रमाते हैं:

هِيَ مَجْهُولَةٌ لَا تُعْرَفُ

यह मजहूला और गैर-मारूफ है। [अल-मुहल्ला: 1/397, 9/234]

इसी कौल पर हाफ़िज़ अब्दुल हक़ इशबीली रहमतुल्लाहि अलैहि ने एतमाद (भरोसा) किया है। [अल-अहकामुल वस्ता: 1/209]

हाफ़िज़ ज़हबी रहमतुल्लाहि अलैहि ने नुदबा को 'मजहूलात' रावी में ज़िक्र किया है। [मीज़ानुल एतदाल: 4/610]

अगर इस कौल को साबित भी मान लें, तो इसका ताल्लुक उस हाजी से है, जिसके लिए अर्फा का रोज़ा रखना मुश्किल हो। 


तम्बीह: 

यह रोज़ा नौ ज़ुल-हिज्जा का है, नबी अकरम ﷺ चूंकि नौ ज़ुल-हिज्जा को अफ़रात में थे, इस मुनासबत से इसे यौम-ए-अर्फ़ा का रोज़ा कह दिया गया, वल्लाहु आलम (अल्लाह बेहतर जानता है)!


Team Islamic Theology

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