Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 39)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu


सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 39]


33. जंग भड़काने में सबाईयों का ज़िक्र

आपको मालूम है कि सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़ौज में वो ख़वारिज और सरकश मौजूद थे जिन्होंने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु को क़त्ल किया था, लेकिन उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई मुम्किन न थी क्योंकि फ़ौज में उन्हें नामज़द करना मुश्किल था, या उनके क़बीले के मददगार मौजूद थे, या उनके ख़िलाफ़ कोई वाज़ेह़ दलील न थी, या वो मुनाफ़िक़ थे और निफ़ाक़ को पोशीदा रखे हुए थे। [तारीख़ुत्तबरी: 5/527] ये लोग इब्ने सबा की पैरूकार थे, उन लोगों ने जब अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का ये ऐलान सुना तो इश्तिआ़ल अंगेज़ी और फ़ित्ने की आग भड़काने की कोशिश में लग गए, ताकि क़िसास की तलवार से महफूज़ हो जाएँ। [तारीख़ुत्तबरी: 5/527]

चुनाँचे जब दोनों फ़ौजों ने क़रीब क़रीब पड़ाव डाल दिया और सब अपनी जगहों पर मुत़्मइन हो गए, तो एक तरफ़ से अ़ली और दूसरी तरफ़ से त़लहा और ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु निकलकर बाहर आए, एक दूसरे से मिले और अपने नज़ाई मसले के बारे में बातचीत किया, बिल्आख़िर हालात को सुधरते देखकर इस नतीजे पर पहुँचे कि सुलह़ और जंगबंदी से बेहतर कोई चीज़ नहीं है, फिर उसी पर वो सब अलग अलग हो गए, अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु अपनी फ़ौज में लौट आए और त़लहा व ज़ुबैर अपनी फ़ौज में लौट गए, त़लहा व ज़ुबैर ने अपने सरदारों को बुला लिया और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने क़ातिलीने उ़स्मान को छोड़कर अपने सरदारों को बुला लिया, शाम हो गई और सुलह़ व आफ़ियत की निय्यत से सबने रात गुज़ारी, दोनों फ़ौजों के अफ़राद एक दूसरे के क़रीब क़रीब थे, एक दूसरे से मिलते थे और सिर्फ़ सुलह़ की निय्यत से रात गुज़ार रहे थे।

लेकिन फ़ित्ने की आग लगाने वालों ने आज जिस तरह रात गुज़ारी थी शायद ऐसी मन्हूस और बुरी रात उन्होंने कभी न गुज़ारी हो, उन्हें अपनी बर्बादी का ग़म सता रहा था, पूरी रात मश्वरा करते रहे, उनमें से किसी ने कहा : त़लहा और ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु के इरादों से तो हम खूब वाक़िफ़ हैं, लेकिन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के इरादों से आज तक वाक़िफ़ न हो सके। यहाँ तक कि वो दिन आ गया जब आपने तमाम लोगों को कल के दिन कूच करने को कहा और ये शर्त लगा दी कि जिसने किसी भी तरह उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के क़त्ल में शिर्कत की है, वो हमारे साथ न चले, अल्लाह की क़सम ! मुझे लग रहा है कि उन सब लोगों की हमारे बारे में एक ही राय है, अगर उन्होंने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से किसी चीज़ पर सुलह़ कर ली तो वो सुलह़ हमारे खूनों पर होगी। [तारीख़ुत्तबरी: 5/526]

उनके मुशीरे ख़ास इब्नुस्सौदा यानी अब्दुल्लाह बिन सबा ने कहा : ऐ लोगो ! तुम्हारी बेहतरी इसमें है कि तुम उन लोगों के साथ मिले जुले रहो और उनके साथ मिलकर काम करो और जब कल दोनों फ़रीक़ आपस में मिलें तो जंग छेड़ दो, और उन्हें सोचने तक का मौक़ा न दो और जब तुम अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ होगे तो उन्हें कोई शख़्स ऐसा नज़र न आएगा जिसके ज़रिये से जंग को बन्द करा सकें, इस तरह अल्लाह तआ़ला अ़ली, तलहा, ज़ुबैर और उन लोगों को जो सुलह़ के ख़्वाहाँ हैं और तुम्हारी मंशा के ख़िलाफ़ काम करना चाहते हैं, उन्हें एक मुसीबत में मुब्तला कर देगा, इस राय पर सब मुत्तफ़िक़ हो जाओ और उसी की रोशनी में मुंतशिर होकर इस तरह कार्रवाई करो कि किसी को इल्म न हो। [तारीख़ुत्तबरी: 5/527]

फिर वो सब इस बात पर मुत्तफ़िक़ हो गए कि इन्तिहाई राज़दारी से जंग की आग लगा दी जाए, चुनाँचे ग़लस के वक्त जबकि तारीकी कुछ ही थी ये लोग इस तरह निकले कि उनके पड़ौस वाले तक को ख़बर न हुई।

जिसका ताल्लुक़ मुज़र वालों से था वो मुज़र वालों में और जिसका रबीआ़ से था वो रबीआ़ में और जिसका यमन से वो यमन वालों में चला गया और सबने अपनी अपनी जगहों पर तलवारें चला दीं, अहले बसरा ग़ज़बनाक हो गए, बल्कि तमाम लोग अपने सामने किसी को भी हमलावर को देखकर उससे भिड़ जाते, त़लहा और ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु सामने आए, मैमना को तैयार किया, उसमें क़बीला रबीआ़ के लोग थे। अब्दुर्रहमान बिन हारिस बिन हिशाम उनकी क़ियादत कर रहे थे और मैसरा वालों को तैयार किया, अब्दुर्रहमान बिन उताब बिन उ़सैद उसकी क़ियादत कर रहे थे और फिर खुद वो दोनों क़ल्ब में जम गए और कहने लगे : ये क्या हो गया? लोगों ने कहा कि अहले कूफ़ा ने रात में हम पर हमला कर दिया, वो दोनों कहने लगे हमने जान लिया कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु क़त्लो खूँ रेज़ी, और मुहर्रमाते इलाहिया का तक़द्दुस पामाल करने से बाज़ नहीं आएँगे, वो हमारी बात हर्गिज़ नहीं सुनेंगे, फिर वो दोनों अहले बसरा को लेकर पीछे हट गए और फिर बसरा वालों को मुक़ाबिल फ़ौज ने धकेलकर उनके मअस्कर तक पहुँचा दिया। [तारीख़ुत्तबरी: 5/541]

अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और अहले कूफ़ा ने जब शोरो हँगामा सुना तो कहा: ये क्या हुआ? मालूम रहे कि सबाईयों ने पहले ही से अपना एक आदमी अली रज़ियल्लाहु अन्हु के पास लगा दिया था जो उनकी साज़िश के मुताबिक़ आपको हालत बताता, चुनाँचे जब आपने कहा कि क्या हुआ? तो उस आदमी ने कहा : अचानक उन (ज़ुबैर व त़लहा) के आदमियों ने रात में हम पर हमला कर दिया, तो हमने उन्हें पीछे किया, तब अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने मैमना वाले क़ाइद से कहा, मैमना में आए और मैसरा वाले से कहा, मैसरा में जाओ और सबाईयों की हालत ये थी कि वो जंग की आग भड़काने में कोई दक़ीक़ा फ़रूगुज़ाश्त नहीं करना चाहते थे। [तारीख़ुत्तबरी: 5/541]

बावजूद ये कि मज़्कूरा अन्दाज़ में लड़ाई का आग़ाज़ हो चुका था, ताहम त़रफ़ैन ह़क़ीक़ते ह़ाल जानने के लिये फ़िक्रमंद थे, अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके साथियो की राय ये थी कि उस वक्त तक जंग न की जाए जब तक फ़रीक़े सानी पर ह़ुज्जत क़ायम न कर दी जाए, ये लोग न तो भागने वाले को क़त्ल कर रहे थे और न किसी ज़ख़्मी पर हाथ उठा रहे थे, लेकिन सबाइयत तो कोई मौका हाथ से जाने न देना चाहती थी। [तारीखे ख़लीफ़ा बिन ख़य्यात: पेज 182]

इसी तरह दूसरी जानिब त़लंहा रज़ियल्लाहु अन्हु अपनी सवारी पर सवार और लोगों की भीड़ में ये ऐलान कर रहे थे, ऐ लोगो ! क्या तुम लोग समझाए नहीं जा रहे हो? लेकिन हालत ये थी कि सब आप पर चढ़े जा रहे थे और आपकी बात नहीं सुन रहे थे, उस वक्त आपने उससे ज़्यादा कुछ न कहा कि "सतियानाश हो, बुरा हो आग पर मरने वालों और हिर्स पर भिनभिनाने वाली मक्खियों का.... आपका क्या ख़्याल है, आग पर जान देने वाले ये परवाने और हिर्स में भिनभिनाने वाली ये मक्खियाँ सबाईयों के अलावा कोई और हो सकता है? नहीं हक़ीक़त तो ये है कि मअ़रका के आख़िर तक इस बात की कोशिश होती रही कि अब भी सुलह का कोई रास्ता निकल आए। [अब्दुल्लाह बिन सबा व असरुहू फ़ी इह़दासि फ़ित्नतु सद्रिल इस्लाम, पेज 192, 193]

मज़्कूरा तफ़्सील से ये बात खुलकर हमारे सामने आ जाती है कि जंग की आग भड़काने में अब्दुल्लाह बिन सबा और उसके सबाई हम नवाओं का कितना बड़ा असर था, साथ ही साथ ये हक़ीक़त भी रोशन की तरह अयाँ हो जाती है कि सहाबा किराम हमेशा सुलह़ और बाहमी इत्तिहाद व मुहब्बत के हरीस होते थे, बेशुमार शरई नुस़ूस़ इसी की गवाही देते हैं, और इसी पर दिल भी मुत्मइन होता है। 

लड़ाई की तफ्सीलन में जाने से पहले में इस बात की तरफ इशारा करना मुनासिब समझता हूँ कि मअरकए जमल में 'सबाइयत' के घिनौना किरदार पर तक़रीबन तमाम उलमा मुत्तफ़िक़ हैं ख़्वाह उसे उन्होंने 'मुफ़्सिदीन' का नाम दिया हो "दोनों फ़र्क के ओबाश", "क़ातिलीने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु" या "अहमकों" का बदबख़्ताना लक़ब दिया हो, या "ग़ौग़ा" यानी शोरोगुल करने वाले कहा हो, या सराह़तन सबाई लिखा हो। में बिल्इख़्तिसार यहाँ पर बतौर चंद अक्वाल नक़्ल कर रहा हूँ।

उ़मर बिन शुब्हा "अख़बारुल बस़रा" में लिखते हैं: जो लोग क़त्ले उ़स्मान से मुत्तहम थे, वो डरे कि कहीं दोनों फ़रीक़ हमारे क़त्ल पर मुसालह़त न कर लें, इसलिए उन्होंने जंग को आग भड़का दी, फिर जो हुआ सो हुआ। [फ़त्हुल बारी: 13/56]

इमाम तहावी रहमतुल्लाह अलैह‌ लिखते हैं: अ़ली और त़लहा रज़ियल्लाहु अन्हु की मर्जी के ख़िलाफ़ जंगे जमल पेश आ गई, उसे 'मुफ़्सिदीन' ने रहरवान इस्लाम की मर्जी के ख़िलाफ़ भड़काया था। [शरह़ल अक़ीदतुत् त़हाविया: पेज 546]

इमाम बाक़िलानी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: जब सुलह़ पर बाहम रज़ामंदी हो गई और इसी पर मज्लिस ख़त्म हो गई, तो 'क़ातिलीने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु डरे कि अब हमारी ख़ैर नहीं, अब हम गिरफ्तार कर लिये जाएँगे, इसलिए वो सब इकट्ठा हुए, मश्वरा किया फिर इख़्तिलाफ़ हुआ और बिल्आख़िर इस बात पर मुत्तफ़िक़ हुएकि वो दो टोलियों में बट जाएँ और दोनों लश्करों में मिलाकर सुबह होते होते लड़ाई शुरू कर दें, जो टोली अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के लश्कर में जाए वो लड़ाई के वक्त ये शोर करे कि त़लहा और ज़ुबैर ने बदअ़हदी की और जो टोली त़लहा और ज़ुबैर के लश्कर में जाए वो ये शोर करे कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने बद‌अ़हदी की, फिर उन्होंने अपनी साज़िश के मुताबिक़ आगे की कार्रवाई अंजाम दी, और लड़ाई छिड़ गई, दोनों फ़रीक़ों में से हर एक लड़ाई को हटाना चाहता था और अपने खून को बेकार ज़ाया नहीं करना चाहता था और लड़ाई के वक्त दोनों का ये मौक़िफ़ बिलकुल सही और कारे सवाब था। यही सही बात है, उसी की तरफ़ हमारा रुझान है और उसी के हम क़ाइल हैं। [अत्तम्हीद: पेज 233]

क़ाज़ी अब्दुल ज़ब्बार ने मुतअ़द्दद उलमा के अक्वाल नक़्ल किये हैं कि अ़ली, तलहा, ज़ुबैर और आ़इशा रज़ियल्लाहु अन्हा मुसालहत, जंगबन्दी और हल की तलाश पर मुत्तफ़िक़ हो गए थे, लेकिन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के लश्कर में जो दुश्मनाने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु थे, उन्हें ये बात सख़्त नागवार गुज़री और डरे कि कहीं आख़िरी अंजाम हमारे सर ही न आए, इसलिए उन्होंने जंग की आग भड़काने की जो साज़िश की वो मअ़रूफ़ बात है और बिल्आख़िर जंग हो ही गई। [तस्बियतु दलाइलुन् नबुव्वत/अल् हिम्दानी: 299]

क़ाज़ी अबूबक्र अल्अ़रबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु बसरा पहुँचे, दोनों फ़रीक़ एक दूसरे के क़रीब हुए ताकि एक दूसरे को देख सकें, लेकिन नफ़्सपरस्तों ने उन पर निगाहें गाड़े रखीं, खूँ रेज़ी में जल्दी की, जंग की आग भड़क उठी और कम अक़्लों को शोरोगुल ले डूबा, ये सब इसलिए हुआ ताकि किसी को एक दूसरे पर हुज्जत क़ायम करने का मौक़ा न मिले, हक़ीक़त हासिल सामने न आए और क़ातिलीने उ़स्मान छुप जाएँ, अगर एक फ़र्द किसी एक लश्कर के मंसूबे को बिगाड़ सकता है तो जहाँ हज़ारों बिगाड़ने वाले हों, उसका क्या कहना? [अल्अ़वास़िमु मिनल् क़वासिम: पेज 156]

हाफ़िज़ इब्ने ह़ज़म रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : इसकी दलील ये है कि लोग (मुसलमान) मुत्तफ़िक़ हो गए, क़िताल नहीं किया, मह़ाज़ आराई नहीं की, जब रात हुई तो "क़ातिलीने उ़स्मान' ने जान लिया कि ज़द्द में हम ही आएँगे और इत्तिहाद हमारी मुखालिफ़त पर हुआ है, तो उन्होंने त़लहा और ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु के लश्कर में मिल जुलकर रात गुज़ारी और उनमें तलवारें चला दीं, अहले लश्कर ने अपनी तरफ़ से दिफ़ाअ किया यहाँ तक कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के लश्कर से मुठभेड़ हो गई, उन्होंने भी अपनी तरफ़ से दिफ़ाअ किया, इस तरह दोनों गिरोह उसी गुमान बल्कि यक़ीन पर थे कि लड़ाई दूसरे ने ही शुरू की है, इस तरह मामला काफ़ी त़ूल पकड़ गया और फ़रीक़ैन में से हर एक ने अपनी तरफ़ से मुदाफ़िअ़त के अलावा कुछ न कर सकता था। जबकि बदबख़्त व फ़ासिक़ "क़ातिलीने उ़स्मान" उम्मत पर जंग मुसल्लत करने और उसमें आग लगाने का कोई मौक़ा गँवाना नहीं चाहते थे और दोनों लश्कर एक नागहानी आज़माइश में मुब्तला हो चुके थे। उनका मक़सद दाव पर लग चुका था, वो मुदाफ़िअ़त ही करते रहे, ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु जंग को अपनी हालत पर छोड़कर पीछे हट गए, त़लहा रज़ियल्लाहु अन्हु खड़े थे, उन्हें एक नामालूम तीर आ लगा, आप उस महाज़ आराई की हक़ीक़त से नावाक़िफ़ थे, तीर आपके पिण्डली के उस ज़ख़्म पर आ लगा था जो ग़ज़्वए उहुद के मौके पर रसूलुल्लाह ﷺ के सामने ज़ख़्मी हुआ था आप वहाँ से लौटे और उसी वक्त वहीं वफ़ात पा गए, ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु मअ़रका से पीछे हटने के बाद दिन ख़त्म होने से पहले "वादिये सबाअ़" में शहीद कर दिये गए, इसी तरह ये वाक़िया पेश आया। [अल्फ़स़्लु फ़िल्मिलल वन् नह़ल : 4/157, 158]

इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : मअ़रकए जमल दोनों गिरोहों के ''नादानों" की फ़ित्ना अंगेज़ी का नतीजा था। [अल्इब्र: 1/37]

मज़ीद लिखते हैं : फ़रीक़ैन ने सुलह़ कर ली थीं, न अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का इरादा जंग करना था और न त़लहा रज़ियल्लाहु अन्हु का, बल्कि मक़सद ये था कि वो इत्तिहाद की कोई शक्ल पैदा करेंगे लेकिन दोनों गिरोहों के ओबाशों ने तीरअंदाज़ी शुरू कर दी और जंग की आग भड़क उठी। [तारीख़ुल् इस्लाम: 1/15]

और दौलुल इस्लाम में लिखते हैं : “ग़ौग़ा” शोरोगुल करने वालों की वजह से लड़ाई ने घमसान का रुख़ अपना लिया और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु त़लहा व ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु के हाथों से मामला निकल गया। [दौलुल इस्लाम: 1/15]

डॉक्टर सुलेमान बिन ह़म्दुल औदा लिखते हैं : इस बात से क्या चीज़ मानेअ़ है कि तब्री की जो रिवायत सराह़त से जंगे जमल में "सबाइयत” का किरदार साबित करती है, वही उस मुअ़म्मा का हल भी हो और मज़्कूरा उलमा की तहरीरों में फ़ित्ना परदाज़ों को जिन नामों से ज़िक्र किया गया है, उन नामों की तह़दीद भी करे? और हर चंद कि हँगामा आराई करने वाली ये जमाअ़तें "सबाइयत" से बराहे रास्त न मरबूत रही हों और उसकी तरह़ उनके अहदाफ़ न रहे हों, लेकिन ये बात कहने में क़त़्अ़न दरेग़ नहीं है कि उन जमाअ़तों ने 'सबाइयत' के लिये वो ज़मीन ज़रूर हमवार की जिस पर इब्ने सबा और उसके मुआविनीन 'सबाईयों' ने क़ब्ज़ा कर लिया, जैसे कि हँगामा ख़ैज़ तहरीकों में उ़मूमन होता है। [अब्दुल्लाह बिन सबा/अल्औंदा, पेज 195]

शहादत के लिये हमें दूर जाने की ज़रूरत नहीं, ये अहनफ़ बिन कैस हैं जिन्होंने जंगे जमल केवा क़ियात को आँखों से देखा है, जब आप अ़ली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की मदद के लिये निकल रहे थे। तो रास्ते में अबूबक्रा (आपका नाम नुफ़ैअ बिन हारिस बिन किल्दह अस़्स़क़फ़ी है, जैसे कि इमाम अहमद ने बयान किया है और यही क़ौल अक्सरियत की तरफ़ भी मंसूब किया है। जबकि इब्ने सअ़द यक़ीन से कहते हैं कि उनका नाम नुफैअ़ बिन मसरूह था, और इब्ने इस्हाक़ यक़ीन के साथ उनका नाम मसरूह बताते हैं, बहरहाल जो भी नाम रहा हो आप अपनी कुन्नियत अबूबक्रा से मशहूर हैं, फुज़्ला-ए-सहाबा में से थे, ताइफ़ के रहने वाले थे, जंगे जमल और सिफ़्फ़ीन में जंग से अलग थे, अबूबक्रा आपकी कुन्नियत इसलिए पड़ी कि आप ताइफ़ के क़िले से चर्बी के सहारे नीचे उतरे थे। 52 हिज्री में बसरा में आपकी वफ़ात हुई। से मुलाक़ात हो गई, उन्होंने पूछा : ऐ अह़नफ़ कहाँ का इरादा है? अहनफ़ ने कहा : रसूल ﷺ के अम्मेज़ाद भाई की मदद में जा रहा हूँ, 

उन्होंने कहा, ऐ अहुनाफ़! वापस जाओ, मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ को यह कहते हुए सुना: जब दो मुसलमानों की तलवारें एक दूसरे के ख़िलाफ़ निकल पड़ें तो क़ातिल और मक्त़ूल दोनों जहन्नम में जाएँगे।

फिर मैंने पूछा, या किसी और ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! क़ातिल तो ठीक है, लेकिन मक्त़ूल की क्या ग़लती है?

आप ﷺ ने फ़र्माया उसने अपने साथी को क़त्ल करने का इरादा किया था। [सहीह मुस्लिम: 2213]

ये सच है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ लड़ना बरह़क़ और दुरुस्त था और जो लोग उनके साथ लड़ते हुए क़त्ल किये गए वो शहीद होंगे, उन्हें दोहरा अज्र मिलेगा, लेकिन अबूबक्रा रज़ियल्लाहु अन्हु ने इस हदीस को बाग़ियो से क़िताल की हालत पर महमूल किया, हालाँकि ये हदीस ग़ैर हालत जंग के लिये वारिद थी, पस अबूबक्रा रज़ियल्लाहु अन्हु ने हदीस का मफ़्हूम ठीक ठीक समझा, लेकिन उसके मौक़े व महल का तअ़य्युन न कर सके।

इस रिवायत से हमें एक बात और मालूम होती है वो ये कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को दूसरों से मअ़रका आराई करने में दूसरी कई रुकावटें भी हाइल हुईं, उन्हीं में से एक इस तरह के बे मह़ल फ़त्वों का वजूद कि जो शिद्दते वरअ़ के नतीजे में सामने आए। [अल्इसासु फ़िस्सुन्नति व फ़िक़्हुहा, अस्सीरतुन् नब्वियतु: 4/1711]

बहरहाल अह़नफ़ ने जब ये हदीस सुनी तो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का साथ देने से पीछे हट गए और जंगे जमल में फ़रीकैन में से किसी के साथ न रहे। [सहीह मुस्लिम मअ़न् नववी: 10/18]

हम और ज़्यादा क़रीब चलते हैं और ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु को देखते हैं, वो जंग के एक फ़रीक़ थे आप हकीक़ते हाल इस तरह बयान करते हैं : ये वही फ़ित्ना है जिसके बारे में हम आपस में बातें किया करते थे। आपके गुलाम ने जब ये बात सुनी तो कहा: आप उसे फ़ित्ना कहते हैं, फिर भी उसमें क़िताल कर रहे हैं? आपने कहा : हम देखना चाहते हैं लेकिन देख नहीं पाते इस मामले के अलावा हर मामले में मैं जानता था कि अपना क़दम कहाँ रख रहा हूँ, इसमें नहीं समझ पा रहा हूँ कि आगे बढूँ या पीछे हटूॅं। [तारीखुत्तबरी: 5/506]

त़लहा रज़ियल्लाहु अन्हु इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं : हम एक थे और अपने मुखालिफ़ीन पर मुत्तहिद थे, अचानक हम दो फ़रीक़ लोहे के पहाड़ की तरह आमने सामने हो गए और एक दूसरे से दो दो हाथ करने को तैयार हो गए। [तारीख़ुत्तबरी: 5/506]


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 39 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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