Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 37)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu

सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 37]


31. जंग से किनाराकश रहने वाले सहाबा के अक्वाल और ख़यालात के चंद नमूने


i. सय्यदना सअ़द बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु 

जंगे सिफ़्फ़ीन के दिन तमाम सहाबा किराम में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के बाद सअ़द बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु सबसे अफ़ज़ल सहाबी थे। उस दिन कुछ लोगों ने आपसे पूछा: आप जंग क्यों नहीं करते? आप तो अहले शूरा में से हैं, आपको दूसरों के मुक़ाबले में ज़्यादा ही उसमें हिस्सा लेना चाहिए। आप कहने लगे : मैं उस वक्त तक जंग में शरीक नहीं होऊँगा जब तक कि वो मुझे ऐसी तलवार न दे दें जिसकी दो आँखें, जुबान और दो होंठ हों, वो मोमिन और काफ़िर में फ़र्क़ कर ले, मैं जिहाद कर चुका हूँ और जिहाद को अच्छी तरह पहचानता हूँ। [मज्मउ़ज़्ज़वाइद: 7/299]  इसे तब्रानी ने रिवायत किया और इसके तमाम रावी सहीह के रावी हैं। 

सहीह मुस्लिम में आमिर से रिवायत है कि सअ़द बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु अपने ऊँटों के पास थे। इतने में उनके बेटे उ़मर आ गए, आपने उ़मर को देखकर फ़र्माया : इस सवार के शर से मैं अल्लाह की पनाह चाहता हूँ। वो अपनी सवारी से उतरे और अपने बाप सअ़द से कहा : आप अपने ऊँटों और बकरियों में पड़े हैं और लोगों को छोड़ दिया है कि वो हुक़ूमत की ख़ातिर आपस में लड़ें मरें सअ़द बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनके सीने पर एक हाथ मारा और कहा: ख़ामोश रहो, मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को फ़र्माते हुए सुना है: अल्लाह तआ़ला परहैज़गार, बेनियाज़ और गुमनाम बन्दे को पसन्द करता है। [सहीह मुस्लिम: 2965]


ii. मुह़म्मद बिन मस्लमा रज़ियल्लाहु अन्हु

हसन से रिवायत है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने मुहम्मद बिन मस्लमा को बुलवाया, वो आ गए तो आपने कहा: आप उस जंग में क्यों शरीक नहीं हुए, मुहम्मद बिन मस्लमा ने अर्ज़ किया कि तुम्हारे बिरादर चचाज़ाद यानी नबी ﷺ ने तलवार दी और फ़र्माया: जब तक दुश्मन से मुक़ाबला हो इसके ज़रिये से जंग करो और जब देखो कि मुसलमान लोग आपस में एक दूसरे को क़त्ल कर रहे हैं तो इसे किसी पत्थर के पास ले जाओ और उस पर इसकी धार तोड़ दो, फिर अपने घर में बैठे रहो, यहाँ तक कि फ़ैसलाकुन मौत, या ग़लती करने वाला हाथ तुम्हें आ दबोचे।

सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने ये सुनकर फ़र्माया: उन्हें जाने दो। [मुस्नद अहमद: 9586] इसकी सनद हसन है, और तब्रानी की [अल् मुअ़जम अल कबीर: 12/177/178] में ये रिवायत दूसरी सनद से भी साबित है। इसके बारे में इमाम हैसमी ने [मज्मउ़ज़्ज़वाइद: 7/301] में कहा है कि इसके रिजाल सिक़ा हैं।


iii. अबू मूसा अशअ़री रज़ियल्लाहु अन्हु 

ज़ैद बिन वहब का बयान है कि जब हमें शहादते उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़बर मिली तो लोग घबरा गए, मैं अपने एक दोस्त के यहाँ गया जहाँ मैं अक्सर बैठा करता था, मैंने कहा: लोग जो कुछ कर चुके हैं देख रहे हो और अभी हम में सहाबा किराम की एक जमाअ़त मौजूद है, आओ हम सब उनके पास चलें। चुनाँचे हम अबू मूसा अशअ़री रज़ियल्लाहु अन्हु के पास गए, वो उस वक्त कूफ़ा के अमीर थे, उन्होंने हमें उस फ़ित्ने से अलग रहने और घर पर ठहर जाने की तल्क़ीन की। [तारीख़े इब्ने अ़साकिर, पेज: 487, 488]

इमाम तब्री फ़र्माते हैं कि जब इब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु और अश्तर नख़ई लोगों को जंग में शिर्कत पर उभारने के लिये कूफ़ा आए, तो अबू मूसा अशअ़री रज़ियल्लाहु अन्हु ने जो कि कूफ़ा के अमीर थे, लोगों को अपने घरों में बाक़ी रहने और तलवारों को नियाम में कर लेने की नसीहत की और फ़ित्ना के मुताल्लिक़ इन अल्फ़ाज़ में इज़्हार ख़्याल किया: ये एक अँधा फ़ित्ना है, इसमें सोने वाला जागने वाले से और जागने वाला बैठने वाले से और बैठने वाला खड़ा होने वाले से और खड़ा होने वाला चलने वाले से बेहतर है। ख़ालिस अरबों जैसे रहो, तलवारों को नियाम में कर लो, नेज़ों के पैकान को नेज़ों से अलग कर दो, कमानों के ताँत को तोड़ डालो और मज़्लूम व बेबस पर रह़म खाओ, यहा तक कि ये फ़ित्ना ख़त्म हो जाए और मामला रफा दफ़ा हो जाए। [तारीखे तब्री: 5/513]

नीज़ आपने फ़र्माया: जब फ़ित्ना पेश आता है तो ग़ैर वाज़ेह होता है और जब फ़र्द हो जाता है तो उसकी हक़ीक़त वाज़ेह़ हो जाती है। आज जो फ़ित्ना दरपेश है वो पेट फाड़ देने वाली बीमारी की तरह हमें फाड़ देने वाला है। शुमालो जुनूब और मशिक़ो मरिब हर तरह उसी की हवाएँ चल रही हैं, कभी कभी ये ठहर जाती हैं, उस वक्त समझ में नहीं आता कि कहाँ पनाह ढूँढ़ी जाए, वो मुतहम्मिल मिज़ाज लोगों को फर्स्दा समझकर छोड़ देती है। अपनी तलवारों को नियाम में करलो, नेज़ों को तोड़ दो, तीरों को फेंक दो, ताँतों को काट डालो और अपने घरों में ठहरने को लाज़िम पकड़ो। [तारीखे तब्री: 5/515]

अबू मूसा अशअ़री रज़ियल्लाहु अन्हु अपने मौक़िफ़ की ताईद में नबी अकरम ﷺ के इस फ़र्मान से इस्तिदलाल करते थे जिसमें आपने फ़ित्ने में शिर्कत करने से मना किया है: और नेज़ों को तोड़ डालने, ताँतों को काट डालने, तलवारों को पत्थर पर मारने और आदम अलैहिस्सलाम की पहली मक्तूल औलाद हाबील के अंजाम पर सब्र करने का हुक्म दिया है। [इह़दासु व अह़ादीसे फ़ित्नतुल हर्ज: पेज 181]

चुनाँचे अबू मूसा अशअ़री रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़ित्ने के बारे में फ़र्माया: उस मौके पर तुम अपनी क़ौसों को तोड़ दो, ताँतों को काट डालो, घरों के अन्दर बैठे रहो, और इब्ने आदम (हाबील) की तरह रहो। [सुनन तिर्मिज़ी: 3625] इमाम तिर्मिज़ी ने कहा कि ये हदीस 'हसन ग़रीब' है। यहाँ मुसन्नफ़ ने जो इबारत नक़्ल की है वो सुनन तिर्मिज़ी की रिवायत के अल्फ़ाज़ नहीं, इसलिए बराहे रास्त सुनन तिर्मिज़ी में मौजूद इबारत की तर्जुमानी की गई है। 


iv. अब्दुल्लाह बिन उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु 

सय्यदा आ़इशा रज़ियल्लाहु अन्हा फ़र्माती हैं : मैं अब्दुल्लाह बिन उ़मर के अलावा किसी ऐसे ख़ुशक़िस्मत को नहीं जानती जिसे अल्लाह ने लोगों के फ़ित्नों से महफूज़ रखा हो और वो अपने अ़स्लाफ़ के तरीके पर उनकी तरह क़ायम हो। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 8/259]

सईद बिन ज़ुबैर रहमतुल्लाह अलैह‌ से रिवायत है कि एक मर्तबा हमारे पास अब्दुल्लाह बिन उ़मर तशरीफ़ लाए। हम उम्मीद करने लगे कि शायद आप हमें कोई अच्छी हदीस सुनाएँगे, हममें से एक आदमी बढ़कर उनके पास गया और कहा : ऐ अबू अब्दुर्रहमान ! हमें फ़ित्ने के अय्याम में क़िताल करने के बारे में कोई हदीस सुनाएँ, अल्लाह तआ़ला फ़र्माता है :

وَقُتِلُوهُمْ حَتَّى لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ

और उनसे लड़ो, यहाँ तक कि कोई फ़ित्ना न रहे। [सूरह बक़रह: 193]

आपने फ़र्माया: तेरी माँ तुझे गुम पाए, क्या तुम जानते भी हो यहाँ फ़ित्ना से क्या मुराद है इससे मुराद ये है कि मुहम्मद ﷺ मुश्रिकीन से जंग करते थे और मुश्रिकीन के दीन में दाखिल होना फ़ित्ना होता था। हुक़ूमत व इक्तिदार की तुम्हारी ये लड़ाई वो फ़ित्ना नहीं है। [सहीह बुख़ारी/किताबुल फ़ित्न: 8/95]

और नाफ़ेअ का बयान है कि एक आदमी ने इब्ने उ़मर से कहा : ऐ अबू अब्दुर्रहमान ! क्या आप अल्लाह का ये फ़र्मान नहीं सुनते:

وَإِنْ طَائِفَتْنِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا

और अगर ईमान वालों के दो गिरोह आपस में लड़ पड़ें तो दोनों के दरम्यान स़ुलह़ करा दो। [सूरह ह़ुजुरात: 9]

आपने जवाब दिया: अगर मैं इस आयत का ऐतिबार करूँ तो क़िताल नहीं करूँगा, मेरे नज़दीक इस आयते करीमा पर अमल करना ज़्यादा पसन्दीदा है :

وَمَنْ يَقْتُلْ مُؤْمِنًا مُتَعَمِّدًا فَجَزَاؤُهُ جَهَنَّمُ خَلِدًا فِيهَا

और जो किसी मोमिन को जान बूझकर क़त्ल करे तो उसकी जज़ा जहन्नम है, उसमें हमेशा रहने वाला है। [सूरह निसा: 93]

क्या तुम अल्लाह तआ़ला का ये फ़र्मान नहीं देखते:

وَقْتِلُوهُمْ حَتَّى لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ

और उनसे लड़ो, यहाँ तक कि कोई फ़ित्ना न रहे। [सूरह बक़रह: 193]

अहदे रसूलुल्लाह ﷺ में कि जब इस्लाम अपने इब्तिदाई दौर में था और आदमी अपने दीन के लिये आज़माइश में डाला जाता था, मुखालिफ़ीन उसे क़त्ल कर देते या गुलाम बना लेते थे, उस वक्त हमने इस आयत पर अमल किया, यहाँ तक कि इस्लाम का बोलबाला हुआ और फ़ित्ना बाक़ी न रहा। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 3/228, 229]

अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने इब्ने उ़मर और सअ़द बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु के इस मौक़िफ़ पर दोनों की सताइश की और फ़र्माया: सअ़द बिन मालिक और अब्दुल्लाह बिन उ़मर का मौक़िफ़ देखकर अल्लाह की हिक्मत व दानाई पर अक़्ल हैरान है, अगर उन दोनों का मौक़िफ़ दुरुस्त होगा तो यक़ीनन उसका अ़ज्र बहुत बड़ा है, और अगर इस मौक़िफ़ में ग़लती है तो वो क़ाबिले माफ़ी है। [मज्मूउ़ल् फ़तावा: 4/440]

एक रिवायत में इस तरह है कि सअ़द बिन मालिक और अब्दुल्लाह बिन उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु का मौक़िफ़ देखकर अल्लाह पर ताज्जुब होता है। यक़ीनन अगर ये ग़लत होगा तो ग़लती मामूली और क़ाबिले अ़फ़्व है और अगर दुरुस्त व नेक है तो बहुत बड़ा कारे अज्र और क़ाबिले तारीफ़ है। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 1/119, 120, मज्मउ़ज़्ज़वाइद: 7/246]

ख़त्ताबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माती हैं : इब्ने उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु फ़ित्नों से किनाराकश रहने में तमाम सहाबा से आगे रहते थे और लोगों को उनमें पड़ने से सबसे ज़्यादा डराने वाले भी थे। आप अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर रज़ियल्लाहु अन्हु के दौरे फ़ित्ने तक बाह़यात रहे, लेकिन उनकी तरफ़ से मुदाफ़िअत नहीं की। ताहम उनके साथ नमाज़ में हाज़िर होते, अगर कोई नमाज़ उनके साथ छूट जाती तो ह़ज्जाज के साथ पढ़ लेते थे और कहते थे: जब उन लोगों ने हमें अल्लाह की तरफ़ बुलाया तो हमने उनकी बात क़ुबूल किया और जब हमको शैतान की तरफ़ बुलाया तो हमने उनको छोड़ दिया। [अल्उ़ज़्लत/अल्ख़ताबी: पेज 20/21]

इमाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : जब सय्यदना उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की वफ़ात हो गई तो लोगों में खलफ़शार पैदा हो गया, अब्दुल्लाह बिन उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु जैसे मर्दे सालेह मक्का चले गए और फ़ित्ना से बराबर किनाराकश रहे, यहाँ तक कि लोग मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु पर मुक्तफ़िक़ हो गए, बावजूद उसके कि आप अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से मुहब्बत करते थे और अपने ख़्याल में उन्हीं को ख़िलाफ़त का हक़दार समझते थे, उनका एह़तिराम करते और उनसे अपनी क़ुर्बत व ताल्लुक़ का इज़्हार करते और अगर कोई शख़्स उन पर तअ़नो तश्नीअ करता तो उसकी मज़म्मत करते। ये सब कुछ आपके नज़दीक मुसल्लम था, बस आप मुसलमानों की बाहमी लड़ाई में शरीक नहीं होना चाहते थे। यही वजह थी कि उस फ़ित्नए क़िताल के अलावा किसी भी मौके पर आप अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की हिमायत व ताईद से पीछे नहीं रहे। [मिन्हाजुस्सुन्ना: 6/285]


v. सलमा बिन अकवअ़ रज़ियल्लाहु अन्हु

जब सय्यदना उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु शहीद कर दिये गए तो सलमा बिन अकवअ़ रब्ज़ा चले गए और वहीं एक औरत से निकाह करके घर बसा लिया, वहाँ बकसरत उनकी औलद पैदा हुई, आप वहीं सकूनत पज़ीर रहे, अय्यामे वफ़ात से चंद दिनों पहले मदीना चले आए थे, फिर यहीं वफ़ात हो गई। [सहीह बुखारी: 4533]


vi. इमरान बिन ह़ुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु

इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह‌ आपके बारे में फ़र्माते हैं :

आप फ़ित्ने से अलग रहने वालों में से थे और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ क़िताल में शिर्कत न की थी। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 2/509]

हमीद बिन हिलाल का बयान है कि जब फ़ित्ने की आँधी चली तो इमरान बिन हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने हिज्र बिन रबीअ़ अल्अदवी से कहा: अपनी क़ौम में जाओ और उन्हें फ़ित्ने में शरीक होने से मना करो। उन्होंने कहा: मैं उनमें एक ग़ैर मारूफ़ आदमी हूँ, मेरी बात नहीं मानी जाएगी,, आप ख़ुद उन्हें समझा दीजिए और फ़ित्ने में शरीक होने से मना कर दें। हिज्र का बयान है कि फिर मैंने इमरान रज़ियल्लाहु अन्हु को अल्लाह की क़सम खाकर कहते हुए सुना: पहाड़ की चोटी पर स्याह फ़ाम हब्शी गुलाम की शक्ल में बकरियों का रेवड़ चराते हुए मर जाना, मुझे इस बात से ज़्यादा महबूब है कि मुसलमानों की दोनों सफ़ों में से किसी का साथ देकर मौह़म तीर चलाऊँ जिसके बारे में मैं नहीं जानता कि आया वो ग़लती पर है या हक़ पर। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 10/15, अल्मुअ़जमुल अल कबीर/तब्रानी: 18/105] इसके तमाम रावी सही के हैं।


vii. सईद बिन आ़स़ उमवी रज़ियल्लाहु अन्हु 

इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : आप फ़ित्ने से अलग रहे और अच्छा ही किया। आपने जंग में मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु का साथ नहीं दिया और जब मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के हाथों ने हुक़ूमत का बागडोर सम्भाल ली तो आप मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के पास गए, उन्होंने आपका एह़तिराम किया और बहुत सारे माल से नवाज़ा। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 3/446]

हाफ़िज़ इब्ने कसीर रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : जब सय्यदना उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत हो गई तो सई़द रज़ियल्लाहु अन्हु इस फ़ित्ने से अलग हो गए, न जंगे जमल में शरीक हुए और न सिफ़्फ़ीन में। फिर जब मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु की हुक़ूमत क़ायम हो गई तो आप उनके पास गए। [अल् बिदाया वन् निहाया: 8/91]

तन्हा सईद रज़ियल्लाहु अन्हु ने इस फ़ित्ने से किनाराकशी न की थी, बल्कि उनके पीछे और भी लोग थे, आपकी किनाराकशी की वजह से ये लोग भी किनाराकश रहे, यहाँ तक कि जमल और सिफ़्फ़ीन की जंगें गुज़र गईं। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 3/446]


viii. ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु 

इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : ओसामा ने अपने हक़ में इस फ़र्माने नबवी पर अमल किया कैफ़ बि ला इलाह इल्लल्लाहु या ओसामा! ऐ ओसामा! ला इलाहा इल्लल्लाह का क्या करोगे? चुनाँचे आपने उस फ़ित्ने से अपना हाथ खींच लिया, घर में बैठ रहे और अच्छा किया। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 2/500, 501]

इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह‌ उस वाक़िया की तरफ इशारा करना चाहते हैं जिसकी तफ्सील ख़ुद ओसामा रज़ियल्लाहु अन्हु ने यूँ बयान की है कि मुझे अल्लाह के रसूल ﷺ ने एक सुरय्या में भेजा, मैं और मेरे एक अंसारी साथी, हम दोनों ने दुश्मन की तरफ़ पेशक़दमी की, मैंने एक आदमी पर हमला किया, जब मैं उसके क़रीब पहुँचातो उसने अल्लाहु अकबर की सदा लगाइ, फिर भी मैंने उसे नेज़ा मारकर क़त्ल कर दिया, और ये सोचा कि उसने अपनी जान बचाने के लिये अल्लाहु अकबर कहा। ओसामा ने पूरा वाक़िया नबी ﷺ को बताया, रिवायत के आख़िर में है कि अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़र्माया, यानी ऐ ओसामा ! तुम्हारी तरफ़ से *ला इलाहा इल्लल्लाह* का कौन जवाबदेह होगा? मैं ने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल ! उसने क़त्ल से बचने के लिये ये कलिमा पढ़ा था। आप ﷺ ने फिर फ़र्माया, तुम्हारी तरफ़ से कौन ला इलाहा इल्लल्लाह का जवाबदेह होगा। आप ﷺ बराबर यही बात दोहराते रहे। [सहीह मुस्लिम: 96, अल्मुस्तदरक हाकिम: 4256] 

ओसामा रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि अल्लाह के रसूल ﷺ का बार बार ये फ़र्मान सुनकर मैं सोचता था कि अगर अब तक मैं इस्लाम न लाता तो बेहतर होता, काश मैं अब इस्लाम लाता और उसे क़त्ल न करता, मैंने अल्लाह से अ़हद किया है कि अब किसी (ला इलाहा इल्लल्लाह) कहने वाले को हर्गिज़ क़त्ल नहीं करूँगा। नबी अकरम ﷺ ने फ़र्माया (बअ़दी या ओसामा?) ऐ ओसामा ! क्या मेरे बाद? ओसामा ने कहा: आपके बाद। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 2/505] इसकी सनद के तमाम रावी सिक़ा हैं।

ह़र्मला का बयान है कि ओसामा ने मुझे अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के पास भेजा और कहा कि जब तुम उनके पास जाओगे तो वो फ़ौरन पूछेंगे कि तुम्हारे साथी क्यों पीछे रह गए? तब तुम उनसे कहना कि वो कह रहे थे : अगर आप शेर के मुँह में हों तो मुझे आपका साथ देना पसन्द है, लेकिन यहाँ का मामला ऐसा है जिसे मैं दुरुस्त नहीं समझता। [सहीह बुखारी: 7001]

हाफ़िज़ इब्ने ह़जर रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : ओसामा रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने उज़र की वज़ाहूत कर दी कि मेरे दिल में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के ख़िलाफ़ कोई कदूरत व कराहत नहीं, अगर वो मुश्किल से मुश्किल तरीन जगह में हों तो भी मैं उनका साथ देने और उनका ग़म बाँटने के लिये तैयार हूँ, आज उस मौके पर मेरे पीछे रह जाने की सिर्फ एक ही वजह है, वो है मुसलमानों की आपस में खूँ रेज़ी जो मुझे नापसन्द है। [फ़त्हुल बारी: 13/67]

इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह‌ ने इमाम ज़ोहरी रहमतुल्लाह अलैह‌ की सनद से एक दूसरी रिवायत नक़्ल की है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ओसामा से मुलाक़ात हुई तो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु कहने लगे: ऐ ओसामा ! हम तो तुमको अपनों में शुमार करते थे, फिर हमारे साथ जंग में शरीक क्यों नहीं हुए? ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु ने जवाब दिया : ऐ अबुल ह़सन ! अगर आप शेर के एक जबड़े को पकड़ेंगे तो मैं उसका दूसरा जबड़ा पकडूंगा, यहाँ तक कि हम दोनों मर जाएँगे, या दोनों ज़िन्दा रहेंगे। रहा ये मामला जिससे आप दो चार हैं, तो वल्लाह ! मैं इसमें हर्गिज़ शरीक न होऊँगा। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 2/504]


ix. स़ुहैब बिन सिनान रूमी रज़ियल्लाहु अन्हु 

इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : आप फ़ित्ना से किनाराकश रहे और अपनी हालत पर बाक़ी रहे। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 2/18]

जअफ़र बिन बरक़ान से रिवायत है कि मैमून बिन महरान ने उ़स़्मान, तलहा, ज़ुबैर और मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में लोगों की मुख्तलिफ़ आराअ व ख़यालात और उनकी गिरोहबन्दियों का ज़िक्र करते हुए फ़र्माया : दसियों हज़ार अम्हाबे रसूल और ताबेईन में से जो लोग अपने घरों में बैठे रहे और फ़ित्ने में शरीक न हुए वो सअ़द बिन अबी वक़्क़ास, अबू अय्यूब अंसारी, अब्दुल्लाह बिन उ़मर, ओसामा बिन ज़ैद, हबीब बिन सलमा फ़ैहरी, सुहैब बिन सिनान और मुहम्मद बिन मस्लमा रज़ियल्लाहु अन्हु हैं, उन लोगों ने कहा कि हम सब उ़स्मान और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु दोनों को पसन्द करते हैं, उन दोनों में से किसी से तबर्रा (बरा'त) नहीं करते। उन दोनों और उनके हामियों के लिये हम ईमान की गवाही देते हैं। उनके लिये बख़्शिश की उम्मीद और जहन्नम से नजात की दुआ करते हैं। [दौलुल् इस्लाम: 1/29; तारीख़े दमिश्क़: पेज 503, 505]


x. अबू अय्यूब अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु

इब्ने अबी शैबा "मुसन्नफ़" में ख़लीफ़ा बिन ख़य्यात अपनी "तारीख" में और इब्ने सअ़द "तब्क़ात” में, शोअ़बा से रिवायत करते हैंकि उन्होंने कहा : मैंने ह़कम से दरयाफ़्त किया कि अबू अय्यूब रज़ियल्लाहु अन्हु मअ़रकए सिफ़्फ़ीन में शरीक हुए थे? आपने कहा : नहीं। अल्बत्ता नहरवान की जंग में लड़ाई के दिन वहाँ मौजूद थे। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 15/303, तारीख़ ख़लीफ़ा बिन ख़य्यात, पेज: 196, तब्क़ात इब्ने सअ़द 5 3/279]


xi. अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु

बसनद सहीह साबित है कि आप जंगे जमल और सिफ़्फ़ीन में शरीक न हुए। बल्कि आप उस फ़ित्ने से दूर रहने वाली रिवायतों के एक रावी हैं, कहते हैं कि नबी ﷺ ने फ़र्माया : अन्क़रीब फ़ित्ने बरपा होंगे, उनमें बैठा रहने वाला खड़े रहने वाले से बेहतर है और खड़ा रहने वाला चलने वाले से बेहतर है और चलने वाला दौड़ने वाले से बेहतर है, जो दूर से भी उनकी तरफ़ झाँककर देखेगा वो उसको भी समेट लेंगे। उस वक्त जिस किसी को कोई जाय पनाह मिल जाए, या बचाव का मक़ाम मिल सके तो वो उसमें चला जाए। [सहीह बुखारी: 3601, 7081, सहीह मुस्लिम: 2212, 2886]


xii. अब्दुल्लाह बिन सअ़द बिन अबी सरह़ रज़ियल्लाहु अन्हु

इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : आप उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के अहद में उनकी तरफ़ से मिस्र के गवर्नर रहे।

बयान किया जाता है कि आप जंगे सिफ़्फ़ीन में शरीक हुए। लेकिन राजेह़ ये है कि आप फ़ित्ने से किनाराकश रहे और रमला में रूपोश रहे। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 3/33]

बहरहाल फ़ित्ने से किनाराकश रहने वाले सहाबा किराम के बेशुमार अक्वाल में से बतौर नमूना यहाँ चंद अक़ाल का ज़िक्र हुआ है। इस फ़िक्र के हामिल सहाबा फ़ित्ने में शरीक न हुए और दूसरों को भी उसमें शरीक होने से डराते रहे। फ़ित्ने के मुताल्लिक़ जिन अहादीस के ये लोग रावी थे और जिनमें मुसलमानों को बाहम ख़ैरेज़ी में शिर्कत से मना किया गया था उन रिवायात के मद्देनज़र ये लोग अपने मौक़िफ़ पर मुत्मइन थे। ये लोग ख़्वारिज की जंग और जमल व सिफ़्फ़ीन की जंग में तफ़्रीक़ के क़ाइल थे

यही वजह थी कि उनमें से अबू हुरैरा और अबू अय्यूब अंसारी जैसे कई सहाबा ने ख़वारिज के ख़िलाफ़ जंग में शिर्कत की थी, जबकि मअरकए जमल व सिफ़्फ़ीन में मुसलमानों की बाहमी लड़ाई में उन दोनों ने शिर्कत नहीं की। नीज़ जब हसन बिन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के हक़ में ख़िलाफ़त से दस्तबरदार हो गए और उनकी ख़िलाफ़त पर उम्मते मस्लमा मुत्तहिद हो गई तो किनाराकशी करने वाले उन्हीं सहाबा ने दस्ते मुआ़विया पर बैअ़त करने में पेशक़दमी का मुज़ाहिरा किया।

हाफ़िज़ इब्ने ह़जर रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : क़िताल से किनाराकश रहने वाले इब्ने उ़मर, सअ़द बिन अबी वक़्क़ास और मुहम्मद बिन मस्लमा जैसे तमाम लोगों ने मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के हाथ पर बैअत की। [इह़दासु व अहादीसुल फ़ित्नति, अ़ब्दुल अज़ीज़ दह़्ह्नान: पेज 212]

मज़्कूरा सहाबा किराम के अक्वाल और हालात पर ग़ौर करने से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि जिन सहाबा ने उस फ़िल्ने में तरफ़ैन में से किसी का साथ न दिया, ग़ाबिलन उनकी किनाराकशी की वजह ये थी कि ये मामला उनके लिये निहायत पैचीदा और ग़ैर वाज़ेह था, जैसाकि इमाम नववी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं:  उनके सामने ये बात वाज़ेह न थी, कि कौन हक़ पर है और कौन बातिल पर" जैसे कि सअ़द बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु ने सरीह़न इस बात का इज़्हार भी किया।

या दूसरी वजह ये हो सकती है कि वो लोग इस मुसीबत से ख़लासी पाने के लिये क़िताल ही को वाहिद ह़ल नहीं मानते थे, बल्कि सुलह को तर्जीह देते थे, इसलिए कि सुलह में भलाई है और सुलह का तक़ाज़ा ये है कि मुसलमानों को मुत्तहिद करने के लिये अपने बाज़ हुकूक़ से भी दस्तबरदार हो जाया जाए। ओसामा बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अन्हु की बात से हमें कुछ इसी तरह की रहनुमाई मिलती है, वो अली रज़ियल्लाहु अन्हु की इमामत और फ़ज़्ल के मुअतरिफ़ थे, लेकिन उस मौके पर अली रज़ियल्लाहु अन्हु से माज़िरत के साथ अर्ज़ किया था कि उस रास्ते में आपका साथ देना मुनासिब नहीं समझता।

उलेमाए सलफ़ ने फ़ित्ने से किनाराकश रहने वाले सहाबा के हक़ में मअज़िरत के ये अल्फ़ाज़ तहरीर किये हैं : कुर्तुबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं : बयान किया जाता है कि जिन सहाबा ने उस क़िताल में शिर्कत करने से तवक़्कुफ़ किया उन्होंने फ़ित्नों से दूर रहने वाली अहादीस को उमूम पर महमूल किया और सहाबा के दरम्यान रूनुमा होने वाले तमाम इख़्तिलाफ़ात और क़िताल में उनसे दूर रहे। [अत्तज़्किरतु: 2/223]


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 37 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Subscribe

Follow Us

WhatsApp
Chat With Us
WhatsApp
WhatsApp Chat ×

Assalamu Alaikum 👋
How can we help you?

Start Chat