Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 35)

 Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu

सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 35]


29. मुआ़विया बिन अबी सुफ़्यान

क़दीम व जदीद दोनों अदवार में लोगों के दरम्यान ये बात मशहूर है कि मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के दरम्यान इख़्तिलाफ़ का सबब ये था कि मुआ़विया ख़िलाफ़त के ख़्वाहाँ थे और आपने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त पर बैअ़त न करके उनकी मुखालिफ़त इसलिए किया कि उन्हों ने आपको शाम की गवर्नरी से माज़ूल कर दिया था

लेकिन हक़ीक़त इस क़ौल के बिलकुल मुख़ालिफ़ है। सही बात ये है कि दोनों के इख़्तिलाफ़ का सबब ये था कि मुआ़विया और उनके साथियों का ख़िलाफ़ते अ़ली पर बैअ़त करना कब वाजिब होता है, क़ातिलीने उ़स्मान से क़िसास लेने से पहले या क़िसास लेने के बाद? मुआ़विया और उनके शामी साथियों की राय थी कि सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु पहले क़ातिलीने उ़स्मान से क़िस़ास़ लें, फिर वो सब आप पर बैअ़ते ख़िलाफ़त कर लेते हैं, जबकि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की राय थी कि मुआ़विया और उनके साथी पहले बैअ़त करें, फिर क़िस़ास़ का मसला बाद में देखा जाएगा। तो साफ़ तौर पर ज़ाहिर है कि इख़्तिलाफ़ का ताल्लुक़ ख़िलाफ़त से नहीं बल्कि क़िस़ास़ से था। [अल् बिदाया वन् निहाया: 8/129, फ़त्हुल बारी: 13/92]

क़ाज़ी इब्नुल अ़रबी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: अहले शाम और अहले इराक़ के दरम्यान क़िताल का सबब दोनों के मौक़िफ़ का फ़र्क़ था। अहले इराक़ अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की बैअ़ते ख़िलाफ़त की हिमायत में थे और चाहते थे कि आपकी इमामत पर तमाम मुसलमान पहले मुत्तह़िद हो जाएँ। जबकि अहले शाम का मौक़िफ़ ये था कि पहले क़ातिलीने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु पर क़ाबू पाया जाए और उनसे क़िस़ास़ लिया जाए। ये लोग कहते थे कि हम क़ातिलीने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु को पनाह देने वाले के हाथ पर बैअ़त नहीं करेंगे। [अल्अ़वास़िमु मिनल् क़वास़िम: पेज 162]

और इमामुल ह़रमैन अल्जुवैनी लिखते हैं: मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु ने अगरचे अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से क़िताल किया लेकिन उनकी इमामत के कभी मुंकिर न हुए और न अपने लिये उसका दावा किया। आप अपनी सवाबदीद के ब मौजिब क़ातिलीने उ़स्मान से क़िस़ास़ के तालिब थे। [लम्इल अदल्तु फ़ी अ़क़ाइदि अहलिस्सुन्नतु वल जमाअ़त: पेज 115]

इमाम हैसमी फर्माते हैं: अ़ली और मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के दरम्यान रूनुमा होने वाली लड़ाईयों के बारे में अहले सुन्नत वल जमाअ़त का अक़ीदा है कि उस लड़ाई की वज़ह ये नहीं थी कि मुआ़विया अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से ख़िलाफ़त छीनना चाहते थे, इसलिए कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से इस्तिह़क़ाक़ ख़िलाफ़त पर तमाम मुसलमानों का इज्माअ़ हो चुका था। पस फ़ित्ना ख़िलाफ़त की वजह से नहीं हुआ बल्कि उसका सबब ये था कि उ़स्मान मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के चचाज़ाद भाई थे, इसलिए दमे उ़स्मान का बदला चाहते थे और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु उस वक्त उसे नहीं मान रहे थे। [अस़्स़ुवाइक़ुल मुह़र्रक़ा: 2/622] दरअस़ल ये मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु का इज्तिहाद था, वरना सही बात ये थी कि पहले बैअ़त करते फिर क़िस़ास़ का मुतालबा करते। 

मुतअ़द्दद रिवायात इस बात की ताईद करती हैं कि मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु, उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के खून का बदला लेने के लिये मुतालबा पर अड़े रहे और बस़राह़त कह दिया कि जब क़ातिलीने उ़स्मान पर ह़द्दे क़िस़ास़ नाफ़िज़ हो जाएगा मैं अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की इताअ़त क़ुबूल कर लूँगा। अगर ये फ़र्ज़ कर लिया जाए कि मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु ने इक्तिदार की ख़्वाहिश में मुतालबाए क़िस़ास़ और उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के ख़िलाफ़ बग़ावत की लहर पैदा करने को सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से मह़ाज़आराई के लिये एक बहाना बनाया था, तो ये सवाल पैदा होता है कि अगर क़ातिलीने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु पर क़िस़ास़ नाफ़िज़ करने में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु कामयाब हो जाते तो फिर मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु क्या करते? यक़ीनी बात है कि अपनी सराह़त के बमौजिब अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त पर बैअ़त कर लेते और आपकी इता़अत बरज़ा व रग़्बत क़ुबूल कर लेते। इसी तरह जो लोग भी क़ातिलीने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु से क़िस़ास़ के मुतालबे को बुनियाद बनाकर मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ लड़ रहे थे वो सब अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु पर बैअ़त कर लेते। क्योंकि मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के दिल में कोई और भेदभाव न था कि जिसे आपने ज़ाहिर नहीं किया अगर ऐसी कोई बात होती तो ये मौक़िफ़ जान की बाज़ी लगाने का मौक़िफ़ होता और फिर तमओ़ ह़िर्स़ वाले लोगों के लिये ऐसा करना मुम्किन नहीं। [तहक़ीक़-ए-मुवाफ़िक़ुस्सहाबा: 2/150]

वो मुआ़विया रज़ियल्लाहु जो कि कातिबीने वह़्य में से एक थे और जिनका शुमार अफ़ाज़िल सहाबा में होता था, जो गुफ़्तार में सबसे सच्चे और किरदार में सबसे ज़्यादा बुर्दबार थे, उनके बारे में भला क्योंकर ये अक़ीदा रखना दुरुस्त हो सकता है कि वो एक ज़वाल पज़ीर हुक़ूमत के हुस़ूल की ख़ातिर शरई ख़लीफ़ा के ख़िलाफ़ जंग छेड़ेंगे और मुसलमानों का खून बहाएँगे। जबकि आप खुद फ़र्मा रहे हैं: अल्लाह की क़सम ! अल्लाह और उसके बन्दों के बीच जब मुझे इख़्तियार दियाजाता है तो मैं अल्लाह को दूसरों पर तर्जीह देता हूँ। [सियरु आ़लामुन् नुबाला: 3/151]

और सही हदीस से साबित है कि नबी करीम ﷺ ने मुआ़विया रज़ियल्लाहु ऊके बारे में फ़र्माया: ऐ अल्लाह! इन्हें रास्ता दिखाने वाला और हिदायत याफ़्ता बना, और इनके ज़रिये से दूसरों को हिदायत दे। [सहीह सुनन तिर्मिज़ी: 3018,/अल्बानी: 3/236]

और एक हदीस में है कि नबी करीम ﷺ ने फ़र्माया: ऐ अल्लह! इन्हें क़ुरआन सिखा दे और इन्हें अज़ाब से बचा। [फ़ज़ाइले सहाबा: 2/913] इसकी सनद सहीह है।

शहादते उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के मुताल्लिक़ मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के मौक़िफ़ की ग़लती की अ़सल वजह ये रही कि आपने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त पर बैअ़त करने से उस वक्त तक के लिये इंकार कर दिया जब तक कि वो क़ातिलीने उ़स्मान से क़िस़ास़ नहीं ले लेते।

मज़ीद बराँ माज़ी में शोरिश पसन्दों के ख़िलाफ़ आप अपने सख़्त मौक़िफ़ और फिर दुश्मनों की तरफ़ से आपके क़त्ल की कोशिश की वजह से आपको अपनी जान का शदीद ख़तरा लाहिक़ था, हत्ताकि आपका अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से इल्तिमास करना पड़ा कि उन मुफ़्सिदीन को मेरे हवाले कर दें।

हालाँकि किसी भी तालिबे क़िस़ास़ के लिये ये जाइज़ नहीं है कि वो ख़ुद मामला का फैसला कर ले, बल्कि ऐसे शख़्स को पहले इमामे वक्त की इताअ़त क़ुबूल करनी चाहिए, फिर उसके पास अपना दावा पेश करे और उससे अपने ह़क़ का मुतालबा करे। [तहक़ीक़े मुवाफ़िक़ुस्सहाबा: 2/151]

तमाम मुफ़्तियाने इस्लाम इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि किसी भी फ़र्दे वाहिद के लिये ये जाइज़ नहीं कि हाकिमे वक्त या जिसको उसने ज़िम्मेदार बनाया है उसे छोड़कर ख़ुद ही फ़रीक़े मुक़ाबिल से क़िस़ास़ ले। इसलिए कि उससे बदअ़म्नी फैलेगी और फ़ित्ना व फ़साद आम होगा। [तफ़्सीरे क़ुर्तुबी: 2/256]

मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के ग़लत मौक़िफ़ की ये तौजीह की जा सकती है कि ये आपकी इज्तिहादी ग़लती थी, आपको यक़ीन था कि मैं ही ह़क़ पर हूँ। चुनाँचे जब आपने बाशिन्दगाने शाम को इकट्ठा किया और तक़रीर करते हुए उन्हें याद दिलाया कि मैं उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु का चचाज़ाद भाई हूँ और उनके खून का वली हूँ, वो मज़्लूम शहीद किये गए हैं और अल्लाह फ़र्माता है:

وَمَنْ قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيهِ سُلْطنًا فَلَا يُسْرِفُ فِي الْقَتْلِ إِنَّهُ كَانَ مَنْصُورًا 

इस ह़ाल में कि मज़्लूम हो तो यक़ीनन हमने उसके वली के लिये पूरा ग़ल्बा रखा है। पस वो क़त्ल में ह़द से न बढ़े, यक़ीनन वो मदद दिया हुआ होगा। [इस्रा: 33]

लिहाज़ा मैं चाहता हूँ कि आप लोग इस सिलसिले में अपने मौक़िफ़ से मुझे आगाह करो। अहले शाम बैक ज़ुबान दमे उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के बदले के मुतालबा पर आपका साथ देने को तैयार हो गए और इसी बात पर आपसे बैअ़त की, और आपसे पुख़्ता वादा किया कि हम उस वक्त तक आपके साथ जानो माल की क़ुर्बानी देते रहेंगे जब तक कि अपनी तह़रीक में कामयाब न हो जाएँ या उस रास्ते में हम सब मार न डाले जाएँ। [सिफ़्फ़ीन/इब्ने मज़ाहिम, पेज 32, तहक़ीक़े मुवाफ़िक़ुस्सहाबा: 2/152]

खुलासा बह़स ये है कि जब हम तलह़ा व ज़ुबैर और मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के मौक़िफ़ का बाहम मुवाज़ना करते हैं तो ये नतीजा सामने आता है कि मुआ़विया के बिल्मुक़ाबिल तलह़ा व ज़ुबैर चार ऐतिबार से ह़क़ के क़रीबतर थे और उन्हीं का मौक़िफ़ ज़्यादा सही था:

i. समअ़ व ताअ़त का मुज़ाहिरा और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की अफ़ज़लियत का ऐतिराफ़ करते हुए उन दोनों ने आपके हाथ पर बैअ़त कर ली, जबकि मुआ़विया अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के फ़ज़्लो मर्तबा के मुअ़तरिफ़ होने के बावुजूद बैअ़त करने से बाज़ रहे। [अल् बिदाया वन् निहाया: 8/129; फ़त्हुल बारी: 13/92]

ii. इस्लाम और मुसलमानों की निगाह में उन दोनों का जो मर्तबा है और सब्क़ते इलल्इस्लाम की उन्हें जो फ़ज़ीलत हासिल रही, बिलाशुब्हा उन चीज़ों के मुक़ाबले में मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु उनके हमपल्ला नहीं थे। इस्लाम में उनकी अज़्मत इस बात से नुमायाँ होती है कि ये दोनों जन्नत के बशारत याफ़्ता थे।

iii. उन दोनों ने सिर्फ़ उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु के बागियों को क़त्ल करने का इरादा किया था और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से छेड़छाड़ नहीं की और न ही मअ़रकए जमल में अली और उनके साथियों से क़सदन लड़ाई लड़ी। [तहक़ीक़े मुवाफ़िक़ुस्सहाबा: 2/113; तारीख़े तब्री: 3/475] जबकि मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु मअ़रकए सिफ़्फ़ीन में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके साथियों के साथ महाज़ आराई पर मुसिर रहे। [तारीखे तब्री: 5/612 से 615] यहाँ ये वज़ाह़त ज़रूरी है कि जंग करने में मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु की तरफ़ से पहल नहीं की गई थी पहल अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की तरफ़ से हुई थी, उन्होंने अहले शाम को इताअ़त के दायरे में लाने के लिये ये जंग शुरू की थी और उस जंग के बरपा करने में भी क़ातिलीने उ़स्मान का ज़बरदस्त हाथ था। 

iv. क़ातिलीने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हु से क़िस़ास़ लेने के मामले में उन दोनों ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को नर्मी करने या क़ातिलीन को मोहलत देने से कभी मुत्तहम नहीं किया जबकि मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके साथियों ने आपको इस बात से मुत्तहम किया। [तहक़ीक़े मुवाफ़िक़ुस्सहाबा: 2/139; अल् बिदाया वन् निहाया: 7/259] ये ग़लत फ़हमी और अफ़वाहों की वजह से था क्योंकि मदीना की सही ख़बरें शाम नहीं पहुँच रही थीं और फिर क़ातिलीने उ़स्मान लश्करे अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु में शामिल हो चुके थे जिससे ग़लत़ फ़हमियाँ पैदा हो गईं थीं।


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 35 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Subscribe

Follow Us

WhatsApp
Chat With Us
WhatsApp
WhatsApp Chat ×

Assalamu Alaikum 👋
How can we help you?

Start Chat