Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 34)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu


सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 34]


28. क़ातिलीने उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हुमा से क़िस़ास़ लेने के लिये त़रीक़ेकार में सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हु का इख़्तिलाफ़

अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और त़लहा, ज़ुबैर व आ़इशा रज़ियल्लाहु अन्हा के दरम्यान दो फ़रीक़ की हैसियत से जो इख़्तिलाफ़ उभरा और फिर अ़ली व मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के दरम्यान जो मह़ाज़ आराई हुई उसका सबब ये न था कि उन लोगों को अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त व इमामत या इस्तिह़क़ाक़ ख़िलाफ़त और मुसलमानों का हाकिम होने पर ऐतिराज़ था। बल्कि आपकी ख़िलाफ़त पर वो सब मुत्तफ़िक़ थे, जैसाकि हाफ़िज़ इब्ने ह़ज़म उन्दलूसी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं:

मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की अफ़ज़लियत और इस्तिह़क़ाक़े ख़िलाफ़त का कभी इंकार न किया, बस‌ आपके इज्तिहाद ने आपको इस नतीजे पर पहुँचाया कि क़ातिलीने उ़स्मान से क़िस़ास़ बैअ़ते ख़िलाफ़त से पहले ली जाए और ये कि उ़स्मान के खून का बदला लेने के वो ज़्यादा हक़दार हैं। [अल्फ़स़्लु फ़िल मिलल वल् अहवाउ वन् नह़ल: 4/160]

और इमाम इब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु ने ख़िलाफ़त का दावा न किया और जिस वक्त वो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से बरसरे पैकार थे ख़िलाफ़त के लिये उनके हाथ पर बैअ़त न की गई और न ख़ुद को ख़लीफ़ा या ख़लीफ़ा का हक़दार समझकर क़िताल किया, बल्कि ये सब लोग अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के लिये ख़िलाफ़त को तस्लीम करते थे। अगर कोई इस सिलसिले में मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु से बातचीत करता तो मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के लिये ख़िलाफ़त का इक़रार करते। मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके साथियों का ये कभी ख़्याल न था कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके साथियों से जंग का आग़ाज़ उनकी तरफ़ से हो और न ही ऐसा किया। [मज्मूउ़ल् फ़तावा: 35/72]

मज़ीद फ़र्माते हैं: फ़रीकै़ने उ़स्मानी व उ़लुव्वी सब ही इस बात के इक़रारी थे कि मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के हमपल्ला नहीं हैं और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का इस्तिख़लाफ़ मुम्किन होते हुए मुआ़विया ख़लीफ़ा नहीं हो सकते, इसलिए कि जिस तरह आपके पेशरू खुलफ़ा अबूबक्र, उ़मर और उ़स्मान रज़ियल्लाहु अन्हुमा की फ़ज़ीलत उनके दरम्यान मालूम व मशहूर थी इसी तरह़ मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु के बिल्मुक़ाबिल अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की अफ़ज़लियत, इल्म, दीन, शुजाअ़त, दीन की तरफ़ पेशक़दमी और दीगर फ़ज़ाइल इन सबके नज़दीक मारूफ़ व मशहूर थे। [मज्मूउ़ल् फ़तावा: 35/73]

बिला शुब्हा इख़्तिलाफ़ की बुनियाद ये कभी न थी कि अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त पर किसी को ऐतिराज़ था, बल्कि क़ातिलीने उ़स्मान से क़िस़ास़ लेने का मामला अ़सल मह़ल्ले इख़्तिलाफ़ था और उसमें भी क़िस़ास़ लेने पर कोई इख़्तिलाफ़ न था बल्कि उसकी नोइयत व कैफ़ियत में इख़्तिलाफ़ था कि किस तरह़ इस मामले को हल किया जाए। अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु क़ातिलीने उ़स्मान से क़िस़ास़ लेने के वुजूब के क़ाइल थे लेकिन आपकी राय थी कि इस मसले को उस वक्त तक के लिये मुअख़्ख़र कर दिया जाए जब तक मुल्की हालात अपने मामूल पर न आ जाएँ, माह़ौल पुरसुकून न हो जाए और मुसलमान मुत्तह़िद न हो जाएँ। [इह़दासु व अहादीसे फ़िल्नतुल हर्ज, पेज 158]

इमाम नववी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: स़ह़ाबा के दरम्यान क़ायम होने वाली जंगों का सबब ये था कि मामलात बहुत पैचीदा और नाक़ाबिले फ़हम थे और यही पैचीदगी उनके इज्तिहादी इख़्तिलाफ़ का सबब बन गई, वो तीन ह़ास़्सों में बंट गए:

1. पहला फ़रीक़ वो था जिसके ख़्याल में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु अपने इज्तिहाद में ह़क़ बजानिब और उनका मुखालिफ़ बाग़ी था, लिहाज़ा उन लोगों ने सोचा कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ताईदो ह़िमायत करना और उनके बाग़ियों से क़िताल करना ज़रूरी है, और हर फ़र्द जो इस ख़्याल से मुत्तफ़िक़ हो उसके लिये ऐसी हालत में बाग़ियों के ख़िलाफ़ इमामे आ़दिल की फ़ौरी मदद ज़रूरी है और उससे पीछे हटना जाइज़ नहीं, चुनाँचे उन्होंने ऐसा ही किया।

2. दूसरा फ़रीक़ वो था जिसने मुआ़विया रज़ियल्लाहु अन्हु को उनके इज्तिहाद में ह़क़ बजानिब समझा फिर आपकी मदद की और मुख़ालिफ़ीन से क़िताल किया।

3. जबकि तीसरे फ़रीक़ के सामने मामला ग़ैर वाज़ेह़ था, वो हैरान थे कि क्या करें, फ़रीकै़न में से किसी की हिमायत को तर्जीह़ नहीं दे पा रहे थे। इसलिए दोनों से अलग रहे। और हक़ीक़त ये है कि ऐसी सूरत में उनके लिये अलग रहना ही ज़रूरी था, इसलिए कि जब तक किसी मुसलमान के ख़िलाफ़ क़िताल के शरई अस्बाब ज़ाहिर न हो जाएँ उसके ख़िलाफ़ इक़्दाम करना जाइज़ नहीं है। अगर इन लोगों के सामने फ़रीकै़न में से किसी एक के ह़क़ बजानिब होने का रुझान वाज़ेह होता और मानते कि हक़ उसी के साथ है तो उनके लिये ऐसे फ़रीक़ की हिमायत व मदद से पीछे रहना और उसके मुख़ालिफ़ीन से जंग न करना जाइज़ न होता। [शरह़न्नववी अला सहीह मुस्लिम: 15/149]


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 34 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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