सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 27]
अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की फ़क़ाहत - 2
III. नमाज़ के अह़काम
i. रुकूअ़ या सज्दा की ह़ालत में तिलावते क़ुरआन की मुमानिअ़त: सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते हैं कि आप ﷺ ने मुझे रुकूअ़ या सज्दा की हालत में क़ुरआन की तिलावत करने से मना फ़र्माया। [सहीह मुस्लिम: 349]
ii. नमाज़ न पढ़ने वाला काफ़िर है: अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से पूछा गया कि ऐ अमीरुल मोमिनीन! नमाज़ न पढ़ने वाली औ़रत का क्या हुक्म है आपने फ़र्माया : जो नमाज़ न पढ़े वो काफ़िर है। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा: 11/47, कंज़ुल उ़म्माल : 8/13]
अब्दुल्लाह बिन शफ़ीक़ बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ के सहाबा नमाज़ के अलावा कोई और अ़मल छोड़ने को कुफ़्र नहीं जानते थे। इसलिए कि नमाज़ ऐसी इबादत है जिसके ज़रिये से इस्लाम में दाख़िल हुआ जाता है, पस इसके छोड़ने से मुसलमान इस्लाम से निकल जाएगा जैसे कि कलिमए शहादत का मसला है। [अल्मुग्नी : 2/44]
इस हुक्म की ताईद रसूलुल्लाह ﷺ के इस फ़र्मान से होती है : आदमी और शिर्को कुफ़्र के दरम्यान ह़द्दे फ़ास़िल नमाज़ का छोड़ देना है। [सहीह मुस्लिम: किताबुल ईमान 88]
इमाम नववी रहमतुल्लाह अलैह फ़र्माते हैं : नमाज़ छोड़ने वाला अगर नमाज़ का मुन्किर है तो तमाम मुसलमानों का इज्माअ़ है कि वो काफ़िर है और मिल्लते इस्लाम से ख़ारिज है, इल्ला ये कि वो नो मुस्लिम हो, मुसलमान की इतनी सोहबत उसे न मिली हो कि जिसमें नमाज़ की फ़र्ज़ियत को वो जान सकता हो और अगर नमाज़ के वुजूब का अ़क़ीदा रखते हुए सुस्ती की वजह से नमाज़ छोड़ रहा है जैसाकि आजके मुसलमानों का हाल है तो इस सिलसिले में उ़लमा का इख़्तिलाफ़ है। इमाम मालिक, शाफ़ेई और जम्हूरे सलफ़ व ख़लफ़ का मस्लक ये है कि वो काफ़िर नहीं क़रार दिया जाएगा, अल्बत्ता फ़ासिक़ गर्दाना जाएगा, उससे तौबा कराई जाएगी, अगर तौबा कर ली तो बेहतर, वरना शादीशुदा ज़ानी की त़रह बतौ़र ह़द उसे क़त्ल किया जाएगा, दोनों में फ़र्क़ ये होगा कि उसे पत्थरों से रजम करने के बजाय तलवार से मारा जाएगा और सलफ़ की एक जमाअ़त इस बात की क़ाइल है कि उसे काफ़िर कहा जाएगा। अली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से यही मरवी हे। नीज़ अहमद बिन हंबल की एक रिवायत और अब्दुल्लाह बिन मुबारक, इस्हाक़ बिन राहवै और बाज़ अस्हाबे शाफ़ेई का यही मस्लक है, जबकि इमाम अबू हनीफ़ा, फुक़्हाए कूफ़ा की एक जमाअ़त और इमाम शाफ़ेई के शागिर्दों का मस्लक ये है कि न उसे काफ़िर कहा जाएगा और न उसे क़त्ल किया जाए, बल्कि ताज़ीरी सज़ा दी जाएगी और जब तक नमाज़ न पढ़ने लगे क़ैद में रखा जाएगा। [शरह सहीह मुस्लिम: 2/70; अल्मुग्नी: 2/442-447] इस सिलसिले में फ़क़ीह अ़स़र शैख़ इब्ने उ़सैमीन रहमतुल्लाह अलैह का रिसाला "कफ़र तारिक़ुस़्स़लात" का मुतालआ़ मुफीद है।
iii. नमाज़ उसके वक्त में दोबारा लौटाना : सय्यदना अली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक अगर कोई शख़्स नमाज़ से फ़ारिग़ हो चुका हो और फिर जमाअ़त की फ़ज़ीलत हासिल करने के लिये उसी नमाज़ को उसी के वक्त में दोबारा पढ़े तो पहली नमाज़ फ़र्ज़ और दूसरी नफ़्ल होगी। [अल्मुग्नी : 2/133] हारिस से रिवायत है कि सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से ऐसे शख़्स के बारे में सवाल किया गया जिसने तंहा नमाज़ पढ़ ली थी, फिर जमाअ़त से वही नमाज़ दोबारा पढ़ी उसकी कौनसी नमाज़ फ़र्ज़ होगी? आपने फ़र्माया : उसकी पहली नमाज़। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा : 2/276, कंजुल उ़म्माल : 22833] इसकी दलील अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है, वो कहते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने मुझसे फ़र्माया: "उस वक्त तुम क्या करोगे जब तुम्हारे ह़ुक्मराँ नमाज़ को मुर्दा करके या वक्त से मुअख़्ख़र करके पढेंगे फिर मैंने अर्ज़ किया : आप हमें क्या हुक्म देते हैं?
फ़र्माया : नमाज़ को उसके वक्त पर पढ़ लेना फिर अगर तुम नमाज़ को उनके साथ पाओ तो पढ़ लो, वो तुम्हारे लिये नफ़्ल हो जाएगी। [सहीह मुस्लिम: 648]
इस हदीस से वज़ह इस्तिदलाल ये है कि आप ﷺ ने बाजमाअ़त पढ़ी हुई नमाज़ को नफ़्ल से तअ़बीर किया। और अगर मरिब की नमाज़ लौटा रहा है तो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक ऐसे शख़्स को चाहिए कि मज़ीद एक रकअ़त पढ़कर उसे जुफ़त बना दे, चुनाँचे ह़ारिस अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि आपने फ़र्माया : जब मरिब की नमाज़ का ऐआ़दा करे तो मज़ीद एक रकअ़त पढ़कर उसे जुफ़त बना दे। [मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा : 2/276]
iv. फ़ौतशुदा नमाज़ों की क़ज़ा : सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते हैं कि जिस शख़्स की नमाज़ फ़ौत हो जाए उस पर उसकी क़ज़ा वाजिब है और फ़िल्फ़ौर क़ज़ा कर लेना मुस्तह़ब है और आपने फ़र्माया : जब आदमी नमाज़ से सो जाए या भूल जाए तो जब बेदार हो या भूली हुई नमाज़ याद आए फ़ौरन उसे पढ़ ले। [मुसत्रफ़ इब्ने अबी शैबा : 2/62] इस पर तमाम मुसलमान का इज्माअ़ है। [फ़िक़्हुल इमाम अ़ली बिन अबी त़ालिब : 1/181] इसकी दलील नबी करीम ﷺ का ये फ़र्मान है:
وَأَقِمِ الصَّلوةَ لِذِكْرِى
जब तुममें से कोई नमाज़ से सो जाए या ग़ाफ़िल हो जाए तो जब वो याद आए पढ़ ले, इसलिए कि अल्लाह तआ़ला फ़र्माता है, तुम मेरे ज़िक्र के लिये नमाज़ क़ायम करो। [त़ाहा: 14, सहीह मुस्लिम/अल्मसाजिदु व मवाज़िउ़स़्स़लात: 684]
v. तरावीह की नमाज़ : अबू अ़ब्दुर्रह़मान अस्सुल़मी से रिवायत है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने उन्हें रमज़ान में क़यामुल्लैल (तरावीह़) पढ़ाई। [अल्मुग्नी: 2/169; मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा : 2/395]
इस्माईल बिन ज़ियादा से रिवायत है कि उन्होंने फ़र्माया कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु रमज़ान के महीने में चंद मस्जिदों के पास से गुज़रे, उनमें क़िंदीलें जल रही थीं। आपने फ़र्माया : अल्लाह तआ़ला उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु की क़ब्र को नूर से भर दे जैसाकि उन्होंने हमारी मस्जिदों को नूर से भर दिया है। [अल्मुन्नी: 2/169] तमाम अहले सुन्नत का इस पर इज्माअ़ है। [अल्मुग़्नी : 2/165] इसकी दलील अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस है कि नबी करीम ﷺ ने फ़र्माया : जिसने ईमान की हालत में और सवाब की निय्यत से रमज़ान में क़याम किया उसके गुज़िश्ता गुनाह बख़्श दिये जाएँगे। [सहीह मुस्लिम: 759]
इस हदीस से वजहे इस्तिदलाल ये है कि क़यामे रमज़ान ही का नाम तरावीह है, लिहाज़ा ये सुन्नत है। अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के नज़दीक तरावीह की नमाज़ बाजमाअ़त पढ़ना अफ़ज़ल है। आप खुद इसका एहतिमाम करते थे। [अल्मुग्नी : 2/168] अल्बत्ता मर्दों और औरतों का अलग अलग इमाम होता था। चुनाँचे अ़रफ़जा सक़फ़ी से रिवायत है कि उन्होंने फ़र्माया : अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु माहे रमज़ान में लोगों को क़याम का हुक्म देते थे और मर्दों और औरतों के लिये अलग अलग इमाम मुक़र्रर करते थे, अ़रफ़जा का बयान है कि मैं औरतों का इमाम था। [अल्मज्मुअ़: 4/34; मुसनफ़ इब्ने अबी शैबा : 2/222]
तरावीह़ की नमाज़ का सुबूत नबी करीम ﷺ की सीरते त़य्यिबा से है, चुनाँचे अ़र्वा बिन ज़ुबैर रिवायत करते हैं कि आ़इशा रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनको खबर दी कि एक बार अल्लाह के रसूल रमज़ान की निस़्फ़ शब में मस्जिद तशरीफ़ ले गए और वहाँ तरावीह की नमाज़ पढ़ी, कुछ सहाबा ने भी आपके साथ नमाज़ पढ़ी, सुबह के वक्त उन्होंने इसका चर्चा किया, चुनाँचे दूसरी रात ज़्यादातर लोगों ने आप ﷺ के साथ नमाज़ पढ़ी, दूसरी सुबह को और ज़्यादा चर्चा हुआ, फिर तीसरी रात उससे भी ज़्यादा लोग जमा हो गए, आप ﷺ ने (उस रात भी) नमाज़ पढ़ी और लोगों ने आपकी इक्तिदा की। चौथी रात को मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वालों के लिये जगह भी बाक़ी न रही थी (लेकिन उस रात आप घर से निकले ही नहीं) सुबह की नमाज़ के लिये बाहर तशरीफ़ लाए, जब नमाज़ पढ़ ली तो लोगों की तरफ़ मुतवज्जह होकर ह़म्दो सलात के बाद फ़र्माया : अम्माबअ़द! आप लोगों के यहाँ जमा होने का मुझे इल्म था, लेकिन मुझे ख़ौफ़ इसका हुआ कि कहीं ये नमाज़ तुम पर फ़र्ज़ न कर दी जाए और फिर तुम इसकी अदायगी से आजिज़ आ जाओ, चुनाँचे नबी करीम ﷺ की वफ़ात तक यही कैफियत क़ायम रही। [सहीह बुखारी: 2012]
vi. कमज़ोर और सनरसीदा लोगों को मस्जिद मे ईद की नमाज़ पढ़ाना : जब अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु ने मंस़बे ख़िलाफ़त सम्भाला और कूफ़ा तशरीफ़ ले गए तो वहाँ की आबादी बहुत ज़्यादा थी, लोगों ने कहा : अन्दरूने शहर कमज़ोर और सनरसीदा लोग हैं, सहूरा में जाकर ईद की नमाज़ पढ़ना उनके लिये गिराँ है, तो आपने वहाँ एक आदमी को अपना नाइब बना दिया जिसने ऐसे लोगों को मस्जिद में ईद की नमाज़ पढ़ाई और आपने दूसरे लोगों को शहर से बाहर सहूरा में नमाज़ पढ़ाई। आपसे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। इसकी बुनियाद आपने रखी और ये क़ाबिल अ़मल है, इसलिए कि आप ख़ुलफ़ाए राशिदीन में से हैं जिनके बारे में रसूलुल्लाह ﷺ का इर्शाद है : तुम अपने लिये मेरी सुन्नत और मेरे हिदायत याफ्ता खुलफ़ाए राशिदीन की सुन्नत को लाज़िम कर लो। [सुनन तिरमिज़ी: 2676, हसनुन सहीहुन]
चुनाँचे इस हदीस की रोशनी में जो शख़्स खुलफ़ाए राशिदीन की सुन्नत का पैरूकार हुआ उसने अल्लाह और उसके रसूल ﷺ(की इताअत की। [अल्फ़तावा : 24/113] इस सिलसिले में वाज़ेह रहे कि ईदैन की नमाज़ आबादी से बाहर ईदगाह (मैदान) में पढ़ना ही सुत्रत है, लेकिन बवक्ते ज़रूरत मस्जिद में पढ़ना जाइज़ है। इस सिलसिले में शैख़ अल्बानी रहमतुल्लाह अलैह के रिसाला "सलातुल् ईदैन फ़िल्मुसल्ला' का मुतालआ इन्तिहाई मुफ़ीद है।
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 27 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology

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