Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 25)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu


सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 25]


26. तज़्किरए अ़ली के वक्त़ "रज़ियल्लाहु अ़न्हु" या "कर्रमल्लाहु वज्हहू' या "अलैहिस्सलाम"

अस़ल ये है कि जब सहाबाए किराम में से किसी का भी ज़िक्र हो तो उनके लिये रज़ियल्लाहु अन्हु कहा जाए, जैसाकि अल्लाह तआ़ला का इर्शाद है:

وَالسَّبِقُونَ الْأَوَّلُونَ مِنَ الْمُهْجِرِينَ وَالْأَنْصَارِ وَالَّذِينَ اتَّبَعُوهُمْ بِإِحْسَانٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ

और मुहाजिरीन और अंस़ार में से सब्क़त करने वाले सबसे पहले लोग और वोह लोग जो नेकी के साथ उनके पीछे आए, अल्लाह उनसे राज़ी हो गया। [सूरह तौबा: 100]

और फ़र्माया:

لَقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ

बिला शुब्हा यक़ीनन अल्लाह ईमानवालों से राज़ी हो गया, जब वोह उस दरख़्त के नीचे तुझसे बैअ़त कर रहे थे। [सूरह फ़तह: 18]

चुनाँचे इन्हीं आयात के पेशेनज़र अहले सुन्नत ने ये इस़्त़िलाह़ ईजाद की कि जब किसी सहाबी का जिक्र आए, या उससे कोई हदीस रिवायत की जाए तो उसके लिये रज़ियल्लाहु अन्हु कहा जाए। मस्लन रिवायत यूँ बयान हो : अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है।" मेरी मालूमात की हद तक किसी सहाबा के लिये‌ "अस्सलाम" का लफ़्ज़ शरीअ़त में नहीं इस्तेमाल हुआ है। बावजूद ये कि सलाम मुसलमानों का बाहमी तह़िय्या है, जैसे कि अल्लाह का इर्शाद है :

فَإِذَا دَخَلْتُمْ بُيُوتًا فَسَلِّمُوا عَلَى أَنْفُسِكُمْ تَحِيَّةً مِنْ عِنْدِ اللَّهِ مُبْرَكَةٌ طَيِّبَةٌ

फिर जब तुम किसी तरह के घरों में दाख़िल हो तो अपने लोगों पर सलाम कहो, ज़िन्दा सलामत रहने की दुआ़ जो अल्लाह की त़रफ़ से मुक़र्रर की हुई बाबरकत, पाकीज़ा है। [सूरह नूर: 61]

इसी बिना पर ये कहा जा सकता है कि सहाबा के ह़क़ में 'अ़लैहिस्सलाम' के बिल्मुक़ाबिल 'रज़ियल्लाहु अन्हु' कहना अफ़ज़ल व बेहतर है। अल्लाह ने फ़र्माया :

وَرِضْوَانٌ مِنَ اللَّهِ أَكْبَرُ

और अल्लाह की तरफ़ से थोड़ी सी ख़ुशनुदी सबसे बड़ी है। [सूरह तौबा :72]

नबी करीम ﷺ का इर्शाद है कि अल्लाह तआ़ला जन्नत वालों से कहेगा : मैं अपनी रज़ामन्दी को तुम पर ह़लाल कर देता हूँ, मैं तुम पर कभी नाराज़ न होऊँगा।" [मिश्कातुल मसाबीह़: 1286]

इसी तरह उ़लमा ए सलफ़ इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि "सलाम" का कलिमा अगरचे तह़िय्यतु बैनल् मुस्लिमीन के लिये मुस्तअ़मल होता है, लेकिन इसका ख़ुस़ूस़ी इस्तेमाला अम्बिया ए किराम के लिये होगा, इसलिए कि अल्लाह तआ़ला का इर्शाद है :

وَسَلَمٌ عَلَى الْمُرْسَلِينَ

पैग़म्बरों पर सलाम हो। [सूरह स़ाफ़्फ़ात: 181]

यह़या अ़लैहिस्सलाम के बारे में फ़र्माया :

وَسَلَّمٌ عَلَيْهِ يَوْمَ وُلِدَ

उस पर सलाम है जिस दिन वो पैदा हुआ। [सूरह मरियम: 15]

चूँकि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के ह़क़ में नबी करीम ﷺ का ये इर्शाद है कि: क्या तुम्हें ये पसन्द नहीं कि तुम्हें मुझसे वही मंज़िलत ह़ास़िल हो जो हारून को मूसा से थी। [सहीह बुख़ारी: 4416]

इसलिए मुतअ़स़्स़िब रवाफ़िज़ अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के ह़क़ में अलैहिस्सलाम या कर्रमल्लाहु वज्हहू इस्तेमाल करने लगे। हम भी इस बात से मुत्तफ़िक़ हैं और मानते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु इसके अहल हैं, लेकिन हमारे और रवाफ़िज़ में फ़र्क़ ये है कि इस मंज़िलत में हम सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ तमाम सहाबा किराम को मुश्तरक मानते हैं।

बहुत सारे नाक़िलीने कुतुब की इबारतों में ह़त्ताकि बाज़ उ़लमा अहले सुन्नत के नज़दीक ये चीज़ देखी गई है कि वो दीगर सहाबा को छोड़कर सिर्फ़ अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ही के लिये अलैहिस्सलाम या कर्रमल्लाहु वज्हहू लिखते हैं, यक़ीनन इसका मअ़ना बिलकुल दुरुस्त है लेकिन मुनासिब ये है कि तमाम सहाबा को इस दर्जे में बराबर रखा जाए।

अम्बिया, सहाबा और स़ालेह़ीने उम्मत के दरम्यान इम्तियाज़ और फ़र्क़ मरातिब का तक़ाज़ा है कि अम्बिया के लिये अलैहिस्सलाम, सहाबा के लिये रज़ियल्लाहु अन्ह और सालेहीन के लिये रह़िमहुल्लाहु इस्तेमाल किया जाए।


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 25 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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