सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 06]
6. सय्यदा फ़ात़िमा रज़ियल्लाहु अन्हा का ज़ुहदो क़नाअ़त और सब्र:
आपकी ज़िन्दगी तकल्लुफ़ात से पाक और निहायत सादा थी, ख़ुशह़ाली की बनिस्बत तंगदस्ती ज़्यादा थी। आइन्दा सुत़रों में जो वाक़िया तहरीर किया जा रहा है, वोह हमारे सामने सय्यदा फ़ात़िमा रज़ियल्लाहु अन्हा की थकावट और ख़ादिम के मुत़ालबे पर नबी अकरम ﷺ के मौक़िफ़ की बख़ूबी अ़क्कासी करता है।
वाक़िया यूँ है कि एक दिन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़ात़िमा रज़ियल्लाहु अन्हा से कहा: मैं पानी लाते लाते थक गया हूँ, यहाँ तक कि अब मेरे सीने में तक्लीफ़ होती है,
अल्लाह ने तुम्हारे वालिद को जंगी क़ैदी अता किये हैं। जाओ और उसमें से एक ख़ादिम माँग लाओ,
वोह कहने लगें : वल्लाह! चक्की चलाते चलाते मेरे भी हाथों में छाले पड़ गए हैं। चुनाँचे वोह रसूलुल्लाह ﷺ के पास आईं, आपने कहा “ऐ मेरी अज़ीज़ा! तुम्हारा आना कैसे हुआ?"
उन्होंने जवाब दिया: बस सलाम करने और खै़रियत दरयाफ़्त करे के बाद, वोह शर्मा गईं, कुछ कह न सकीं और वापस लौट आईं।
अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: क्या हुआ?
उन्होंने कहा: मैं कुछ माँगने से शर्मा गई।
फिर वो दोनों एक साथ आए और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल ﷺ! अल्लाह की क़सम, में पानी लाते लाते थक जाता हूँ, यहाँ तक कि मेरे सीने मे तक्लीफ़ होने लगती है।
और फ़ातिमा कहने लगीं: मैं मुसलसल चक्की चलाती हूँ, यहाँ तक कि मेरे हाथों में छाले पड़ चुके हैं, अल्लाह ने आपको बहुत से जंगी कैदी अता किये हैं उसमें से हमें खादिम दे दीजिए।
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़र्माया, मै अहले सुफ़्फ़ा को छोड़कर कि भूख से जिनके पेट में बल पड़ रहे हैं, तुम्हें नहीं दूँगा, मेरे पास उनके अख़्रजात के लिये कुछ नहीं है, उन गुलामों को फ़रोख़्त करके उनकी क़ीमत उन अहले सुफ़्फ़ा पर ख़र्च करूँगा।
चुनाँचे दोनों वापस आ गए, फिर अल्लाह के रसूल ﷺ उनके पास आए, दोनों चादर से बदन ढाँप चुके थे। जब सर ढाँपते तो पैर खुल जाते और पैर ढाँपते तो सर खुल जाते। (आपकी आमद की आहट पाकर) दोनों उठने लगे।
आपने फ़र्माया: ठहरो, फिर फ़र्माया, क्या तुम्हें तुम्हारे मुतालबे से बेहतर चीज़ न बता दूँ'
उन्होंने कहा: हाँ।
आपने फ़र्माया चंद कलिमे हैं, जिन्हें मुझे ज़िब्रील ने सिखाया था, फिर फ़र्माया: हर नमाज़ के बाद दस बार सुब्हानल्लाह और दस बार अल्हम्दु लिल्लाह, दस बार अल्लाहु अकबर पढ़ लिया करो और जब अपने बिस्तर पर आओ तो
- तैंतीस (33) बार सुब्हानल्लाह,
- तैंतीस बार अल्हम्दु लिल्लाह और
- चौंतीस (34 बार अल्लाहु अकबर
पढ़ लिया करो।" [सहीह बुख़ारी: 3705; सहीह मुस्लिम: 2725, सहीह बुखारी: 3705; सहीह मुस्लिम: 2727]
इस वाक़िया से मुस्तम्बत़ होने वाली चंद अहम व आला अक़्दार व नमूने:
यह वाक़िया बताता है कि औलवय्यात और अहमतरीन उमूर की तर्तीब व तर्जीहध के ज़रिये से बड़ी हिक्मते अमली से रसूलुल्लाह ﷺ ने इक्तिस़ादी बोहरान को ह़ल किया, जिससे बाशिन्दगाने मदीना गुज़र रहे थे, चुनाँचे अहले सुफ़्फ़ा को पेट भर खाना देना ऐसी अहम ज़रूरत थी कि फ़ातिमा और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़ादिम को इतनी ज़रूरत न थी, इसलिए आपने अहले सुफ़्फ़ा को उन पर तर्जीहूदी, यही वजह थी कि इक्तिसादी बोहूरान से निपटने के लिये रसूलुल्लाह ﷺ ने कई वसाइल वज़अ किये थे।
सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ज़िन्दगी पर इस तर्बियत का गहरा असर पड़ा था कि ज़माना गुज़रता गया और एक वक्त ऐसा आया कि आप मुसलमानों के ख़लीफ़ा बन गए, फिर भी आपकी ज़िन्दगी पर उसी के असरात नुमायाँ रहे, आप दुनिया और इसकी रंगीनियों से काफ़ी दूर रहे, हालाँकि ज़मीन के ख़ज़ाने और इसकी रअ़नाइयाँ आपके दस्ते सल्तनत में थीं। यह दुनिया बेज़ारी सिर्फ़ इसी वजह से थी कि ज़िक्रे इलाही से आपका दिलो दिमाग़ मामूर था और तक्बीरो तस्बीह की नबवी वस़िय्यत को ह़िर्ज़ जाँ बना लिया था, आपका बयान है कि जब से अल्लाह के रसूल ﷺ ने मुझे यह कलिमात सिखलाए मैंने उन्हें कभी न छोड़ा, आपके एक साथी ने पूछा: मअ़रकए सिफ़्फ़ीन की रात में भी?
आपने फ़र्माया : मअरकए स़िफ़्फ़ीन की रात में भी। [सहीह मुस्लिम : 4/2092]
हमारी जानें अल्लाह के हाथ मे हैं, जब वोह हमें बेदार करना चाहेगा तभी हम बेदार होंगे:
सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत हे कि एक बार रात के वक्त मेरे और फ़ात़िमा के पास रसूलुल्लाह ﷺ तशरीफ़ लाए और हमें नमाज़ के लिये बेदार किया, फिर अपने घर लौट गए और कुछ देर रात गई नमाज़ पढ़ते रहे, आपने हमारी बेदारी की कोई आहट नहीं सुनी, लौटकर फिर हमारे पास आए, हमें बेदार किया। फ़र्माया: तुम लोग उठो नमाज़ पढ़ो। मैं उठकर बैठ गया और आखें मलते हुए कहने लगा: अल्लाह की क़सम ! हम उतनी ही नमाज़ पढ़ सकेंगे जितना हमारी तक़दीर में लिखा होगा, हमारी जानें अल्लाह के हाथों में हैं, जब वोह हमें बेदार करना चाहेगा तभी हम बेदार होंगे, फिर अल्लाह के रसूल ﷺ जाने लगे और अपनी रानों पर हाथ मारते हुए कह रहे थे:
हम उतनी ही नमाज़ पढ़ सकेंगे जितना अल्लाह ने हमारी तक़दीर में लिखा होगा, हम उतनी ही नमाज़ पढ़ सकेंगे जितना अल्लाह ने हमारी तक़दीर में लिखा होगा
وَكَانَ الْإِنْسَانُ أَكْثَرَ شَيْءٍ جَدَلًا
और इन्सान बेशतर चीज़ों के लिये झगड़ालू पैदा किया गया है।
[कहफ़: 54, सहीह बुखारी : 5362; सहीह मुस्लिम: 2727]
इस वाक़िया में साफ़ नज़र आ रहा है कि अधली रज़ियल्लाहु अन्हु हूक़ के लिये किस क़द्र मुख़्लिस और इल्मे नबवी की नश्रो इशाअ़त के शैदाई थे। आप ग़ौर करें कि यह वाक़िया सिर्फ़ आपकी ज़ात से मुताल्लिक़ था, आप चाहते तो उसे छुपा लेते, मालूम रहे यह वाक़िया तहज्जुद की नमाज़ का था, जो कि वाजिब नहीं, फिर भी आपने इसे आम किया, पस मुसलमानों के हक़ में सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का यह अमल एक अज़ीम दर्स है जिस पर मुसलमानों को कारबन्द होना चाहिए।
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 06 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology
).webp)
0 टिप्पणियाँ
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।