Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 04)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 04)


सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 04]


4. क़ुबूले इस्लाम और हिज़्रत से पहले मक्का के अहम कारनामे

i. क़ुबूले इस्लाम: अल्लाह तआ़ला ने अ़ली बिन अबी त़ालिब के हक़ में जो ख़ुस़ूस़ी इन्आ़म, और खै़रो बरकत मुक़द्दर कर रखा था, इसका ज़ाहिरी सबब यह हुआ कि क़ुरैश स़ख़्त तंगहाली की मुसीबत से दो चार हुए और अबू त़ालिब कसीरुल अ़याल थे, अल्लाह के रसूल ﷺ ने अपने चचा अ़ब्बास से जो ख़ुशहाल लोगों में से थे। कहा: चचा! आपके भाई अबू त़ालिब कसीरुल अ़याल हैं और आपको मालूम है कि लोग किस तरह मुसीबतो से दो चार हैं। चलिए इनका कुछ बोझ हल्का करें, इनके बाल बच्चों में एक की परवरिश मैं अपने ज़िम्मे लेता हूँ और एक आप अपने ज़िम्मे ले लें। अ़ब्बास ने कहा: ठीक है।

चुनाँचे दोनों अबू त़ालिब की ख़िदमत में पहुँचे और कहा: हम दोनों इसलिए आए हैं कि जब तक यह तंगी और सख़्ती का ज़माना है और जिसमें सब ही गिरफ़्तार हैं, उस वक्त तक हम आपके बाल बच्चों का कुछ बोझ अपने ज़िम्मे लेकर आपकी परेशानियों को हल्का करें, अबू त़ालिब ने इन दोनों से कहा: अ़क़ील को मेरे पास छोड़ दो, बाक़ी के बारे में जिस तरह चाहो फ़ैसला कर लो। चुनाँचे आप ﷺ ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की ज़िम्मेदारी ख़ुद ली और जाफ़र की किफ़ालत अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने क़ुबूल की। अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु उस वक्त से रसूलुल्लाह ﷺ से वाबस्ता रहे, यहाँ तक कि वोह वक्त आया जब आप ﷺ को अल्लाह तआ़ला ने नबी बनाकर मब्ऊ़स किया और अ़ली बिन अबी त़ालिब ने आप‌ ﷺ का इत्तिबाअ़ किया, आपकी सदाक़त पर ईमान लाए, और तस्दीक़ की, जबकि जाफ़र अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की किफ़ालत में रहे यहाँ तक कि इस्लाम ले आए और किफ़ालत की ज़रूरत बाक़ी नहीं रही। [अस्सीरतुन् नब्विया/इब्ने हिशाम: 1/246]

इस वाक़िया में हम देख रहे हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ अपने चचा मुहतरम अबू त़ालिब को इनकी बेइन्तिहा शफ़्क़त और अज़ीम एहसान का बेहतरीन सिला देना चाहते थे, क्योंकि दादा अ़ब्दुल मुत़्तलिब के बाद इन्होंने ही आप ﷺ की किफ़ालत की थी। चुनाँचे अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु पर अल्लाह तआ़ला की सबसे बड़ी नेअ़मत यह रही कि उनकी तर्बियत आप ﷺ के ज़ेरे साया हुई और ऐसी ज़ात ने आपको अदब सिखाया जो अल्लाह की तर्बियत याफ़्ता थी और अल्लाह ने उसे अपने हिफ़्ज़ो अमान में रखा था। क़ुरआन उसके अख़लाक़ का आयनेदार था, पस उस अज़ीम तरीन शख़्सियत की तर्बियत की बरकत थी कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु क़ुरआनी अख़लाक़ के ढाँचे में ढल और सँवर गए और यही तर्बियत आपकी पहली व आख़िरी तर्बियत ठहरी।

चुनाँचे इस्लामी घराने में आप पले बढ़े, ज़िन्दगी के बिलकुल इब्तिदाई मरह़ ले ही से इस्लाम के असरारो रुमूज़ से वाक़फ़ियत हुई, यह सब कुछ उस वक्त की बात है जबकि इस्लाम बिलकुल नो ज़ाइदा था, इस्लाम की दावत ख़ानाए नुबुव्वत की चारो दीवारी से बाहर न निकली थी और न अपने अंसारो मुआ़विनीन की तलाश में आगे बढ़ी थी कि वोह लोग उसे तक़ियत पहुँचाते, लोगों के बीच उसे आम करते और उन्हें तारीकियों से निकालकर रोशनी की तरफ़ लाते। अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को इस्लाम की तरफ़ सब्क़त का शर्फ़ तो हासिल है, लेकिन इस नुक्ते़ पर लोगों में इख़्तिलाफ़ है कि ख़दीजा बिन्ते खुवेलिद रज़ियल्लाहु अन्हा के बाद सबसे पहले कौन इस्लाम लाए, क्या वोह अबूबक्र थे या अ़ली ! मेरा रुझान इस बात की तरफ़ है कि आज़ाद मर्दों में सबसे पहले अबूबक्र सिद्दीक़ इस्लाम लाए और बच्चों में अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और औरतों में ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा। वाज़ेह रहे कि ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा मुल्लक़ तौर पर सबसे पहले इस्लाम लाईं और गुलामों में ज़ैद बिन ह़ारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु [अल् बिदाया वन् निहाया: 3/26, 28] 

इसी तरह अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु बच्चों में सबसे पहले इस्लाम लाए।


ii. इस्लाम लाने का वाक़िया: इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि एक बार सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु नबी करीम ﷺ के पास आए, उस वक्त ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा इस्लाम ला चुकी थी, देखा तो दोनों नमाज़ पढ़ रहे थे, अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने पूछा: यह क्या मामला है? 

नबी करीम ﷺ ने फ़र्माया: "यह अल्लाह का दीन है जिसको उसने अपने लिये पसन्द किया और उसी के लिये अम्बिया को मब्ऊ़स किया है, मैं तुमको भी अल्लाह वाहिद और उसकी इबादत की तरफ़ बुलाता हूँ और चाहता हूँ कि लात और उज़्ज़ा को मअ़बूद मानने से इंकार कर दो।"

अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा: यह वोह बात है जिसको मैंने पहले कभी नहीं सुना और जब तक मैं अबू त़ालिब से ज़िक्र न कर लूँ कुछ फ़ैसला नहीं कर सकता, जबकि रसूलुल्लाह ﷺ की मंशा थी कि जब तक इस्लाम की ऐलानिया दावत का आग़ाज़ न हो यह राज़ फ़ाश न हो, चुनाँचे आपने फ़र्माया:

"ऐ अ़ली! अगर तुम ईमान नहीं लाते हो तो उसको अभी पोशीदा रखना।"

अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु उस रात ख़ामोश रहे और अल्लाह तआ़ला ने उनके दिल में इस्लाम डाल दिया सुबह सवेरे रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहा: आपने मुझे कल क्या दावत दी थी? 

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़र्माया: इस बात की गवाही दो कि अल्लाह के अलावा कोई मअ़बूद बरह़क़ नहीं, वोह यक्ता है, उसका कोई शरीक नहीं और लातो ज़्ज़्ज़ा को माबूद मानने से इंकार कर दो, और किसी को उसका शरीक ठहराने से बराअ़त का इज़्हार करो।

चुनाँचे अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने कलिमए शहादत पढ़ लिया, फिर इस्लाम ले आए और रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में अबू त़ालिब से छुप छुपाकर आया करते और अपने इस्लाम को उन पर ज़ाहिर न करते। 

[अल् बिदाया वन् निहाया : 3/4] इब़्ने इस्हाक़ बायान‌ कर रहे हैं जबकि वह पैदा भी नहीं हुए थे।


iii. अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु और अबू त़ालिब के बीच क्या पेश आया: इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि कुछ अहले इल्म बयान करते हैं कि जब नमाज़ का वक्त होता तो रसूलुल्लाह ﷺ मक्का की किसी घाटी में जाकर इबादत करते और आपके साथ अ़ली बिन अबी त़ालिब भी अपने वालिद, चचा और तमाम अफ़राद ख़ानदान से छुप छुपकर जाते और तमाम नमाज़े रसूलुल्लाह ﷺ के साथ अदा करते, शाम हो जाती तो घर वापस आते, यह सिलसिला जब तक अल्लाह को मंजूर था, जारी रहा। एक दिन जबकि यह दोनों नमाज़ पढ़ रहे थे, अबू तालिब ने देख लिया। अबू त़ा लिब ने रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा: अज़ीज़ मन! यह कौनसा दीन है जिसकी तुम पैरवी कर रहे हो? आप ﷺ ने जवाब दिया: अम्मे मुहतरम ! अल्लाह का, अल्लाह के फ़रिश्तों का, उसके पैग़म्बरों का और हमारे जद्दे अमजद इब्राहीम अलैहिस्सलाम का दीन है। [अल् बिदाया वन् निहाया : 3/9 सनद ज़ईफ़]

दूसरी रिवायत के बमौजिब आप ﷺ ने फ़र्माया: अल्लाह ने मुझे अपने बन्दों की तरफ़ रसूल बनाकर भेजा है और चचाजान! आप सबसे ज़्यादा इस बात के मुस्तहिक़ हैं कि आपके साथ खैरख़्वाही करूँ और राहे रास्त की तरफ़ दावत दूँ, आप सबसे ज़्यादा मुस्तहिक़ हैं कि मेरी दावत कुबूल करें और मेरी मदद करें, अबू तालिब ने जवाब दिया: ऐ मेरे भतीजे ! मैं अपने आबाओ अज्दाद का मज़हब और उनके तौर तरीक़ नहीं छोड़ सकता, लेकिन अल्लाह की क़सम खाकर कहता हूँ कि जब तक मैं ज़िन्दा हूँ तुम्हें तुम्हें कोई गज़न्द नहीं पहुँचेगा, सीरत निगारों का बयान है कि आपने अपने साहबज़ादे अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु से कहा: ऐ बेटे ! यह कौनसा मज़हब है जिस पर तुम चल रहे हो? उन्होंने कहा: वालिद साहब! मैं अल्लाह और उसके र सूल पर ईमान ला चुका हूँ और रसूलुल्लाह ﷺ के साथ अल्लाह की इबादत करता हूँ और उनकी पैरवी करता हूँ। रावियों का ख़्याल है कि इसके जवाब में अबू तालिब ने कहा: वोह तुमको अच्छी बात ही की तरफ़ बुलाते हैं, लिहाज़ा इस पर क़ायम रहो। [अस्सीरतुन् नब्विया/इब्ने हिशाम: 1/246]


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 04 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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