सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 03]
3. अमीरुल मोमिनीन अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु की वालिदा माजिदा:
आप जलीलुल् क़द्र फ़ाज़िला और बुज़ुर्ग सहाबिया हैं, आपका नामो नसब फ़ातिमा बिन्ते अ़हद बिन हाशिम बिन अ़ब्दे मुनाफ़ बिन क़ुस़य अल्हाश्मिया है। हाशमी ख़ानदान की आप ऐसी पहली ख़ातून हैं जिनके बतन से एक हाशमी पैदा हुआ। [फ़ज़ाइले सहाबा: 2/685]
आपको उस वक्त नबी ﷺ की परवरिश व ख़बरगीरी का शर्फ़ हासिल रहा, जब अ़ब्दुल मुत़्तलिब की वस़िय्यत की बिना पर आप ﷺ अपने चचा अबू त़ालिब की किफ़ालत में आए। अपनी हक़ीक़ी माँ से मह़रूमी के बाद यही आपकी माँ थीं जो आपकी देखभाल करतीं और ह़त्तल मक़दूर आपकी ख़िदमत व परवरिश करतीं। नबी अकरम ﷺ ने अपनी ज़िन्दगी की तक़रीबन बीस साला मुद्दत मौसूफ़ा ही की निगहदाश्त में गुज़ारी। इन्होंने इस्लामी दावत पर लब्बैक कहा और मुशर्रफ़ ब इस्लाम होने वाली उन अव्वलीन ख़वातीन में अपना नाम दर्ज करा लिया जिन्होंने अज़्मतो फ़ज़ीलत के मैदान में बुलन्दो बाला मक़ाम हासिल किया था। आप मुमताज़ व मुंतख़ब ख़वातीन में से थीं, अपनी बहू फ़ात़िमा ज़ौहरा के साथ शफ़्क़त व मुहब्बत का मिसाली बर्ताव पेश किया, उनके दादा नबी करीम ﷺ की तौक़ीरो एहतिराम के पेशेनज़र फ़ातिमा का हर मुम्किन ख़्याल करती थीं। अमीरुल मोमिनीन अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैंने अपनी माँ से कहा: पानी लाने और दीगर ज़रूरियात के मुहैया करने में फ़ातिमा बिन्ते रसूलुल्लाह ﷺ की मदद कर दिया कीजिए, वोह चक्की चला लिया करेंगी और आटा गूंध लेंगी आपको नहीं करना होगा। [मज्मउ़ज़्ज़वाइद: 9/356] इसके रावी सही बुख़ारी के रावी हैं।
नबी करीम ﷺ के ज़ेरे साया परवरिश का शर्फ़ हासिल होने के साथ जिस चीज़ ने आपकी शख़्सियत को दो बाला किया वोह यह कि आपने अहादीसे नब्विया को याद किया और उन्हें रिवायत किया। चुनाँचे बहुत सारी अ़हादीस आपसे मरवी है। रसूलुल्लाह ﷺ की निगाह मे बड़ा ऊँचा मक़ाम था, आप ﷺ उनके पास ख़ुस़ूस़ी तह़ाइफ़ भेजा करते थे। हाफ़िज़ इब्ने ह़जर 'अल्इस़ाबा' में लिखते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने मेरे पास दबीज़ रेशम का जोड़ा भेजा और कहला भेजा कि उसे दो पट्टों में तब्दील करके फ़वात़िम में तक़्सीम कर दो। [सुनन इब्ने माजा/किताबुल् लिबास/हदीस: 3596]
मैंने इसमें चार दुपट्टे बनाए, एक दुपट्टा फ़ातिमा बिन्ते रसूलुल्लाह ﷺ दूसरा फ़ातिमा बिन्ते अ़हद के लिए, तीसरा फ़ातिमा बिन्ते ह़मज़ा के लिये और चौथे का ज़िक्र नहीं किया। [अल्इस़ाबा: 8/27; नम्बर 11593]
सय्यदा फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा अपनी ज़िन्दगी में और वफ़ात के वक्त भी बड़ी खुशनसीब ठहरों, उनकी तक्रीमो अ़ज़्मत की बात यह भी है कि नबी करीम ﷺ की ज़िन्दगी में ही आपकी वफ़ात हुई। आपकी तदफ़ीन से मुताल्लिक़ अ़नस रज़ियल्लाहु अन्हु से एक तफ़्सीली रिवायत मरवी है जो बिलकुल नाक़ाबिले ऐतिबार और इन्तिहाई ज़ईफ़ है और यह रिवायत मुतअ़द्दद सनदों से वारिद है, लेकिन सबकी सब ज़ईफ़ हैं। वोह रिवायत इस तरह है कि अ़नस रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की वालिदा माजिदा फ़ातिमा बिन्ते अ़हद की वफ़ात हो गई, तो अल्लाह के रसूल ﷺ उनके पास गए और सरहाने बैठ गए और कहने लगे: ऐ अम्माजान ! अल्लाह आप पर रह़म करे, मेरी माँ के बाद आप ही मेरी माँ थीं, आप ख़ुद भूखी रहकर मुझे शिकमसीर करती थीं, ख़ुद न पहनतीं और मुझे कपड़े पहनाती थीं, ख़ुद अच्छी चीज़ न खातीं बल्कि मुझे खिलाती थीं, यह सब कुछ आप अल्लाह की रज़ाजूई और अपनी आख़िरत की भलाई के लिये करती थीं, फिर आपने उन्हें तीन तीन बार ग़ुस्ल देने का हुक्म दिया, जब आपके पास काफूर मिला हुआ पानी लाया गया तो आपने उसे ख़ुद उनके जिस्म पर उँडेला, फिर अपनी क़मीस उतारी और उसे फ़ातिमा को पहना दिया, फिर उसके ऊपर एक चादर से कफ़न दे दिया, फिर ओसामा बिन ज़ैद, अबू अय्यूब अंसारी, उ़मर बिन ख़त्ताब और एक स्याह फ़ाम गुलाम को बुलाया ताकि उनकी क़ब्र खोदें। चुनाँचे उन्होंने क़ब्र खोदी। जब खुदाई लह़द तक हो गई तो रसूलुल्लाह ﷺ ने लह़द अपने हाथ से खोदा, उसकी मिट्टी ख़ुद निकाली, और जब लह़द तैयार हो गई तो आप उसमें लैट गए और कहा: अल्लाह ही है जो ज़िन्दगी अता करता है और मौत देता है, वोह हमेशा ज़िन्दा रहने वाला है, वोह मरने वाला नहीं। ऐ अल्लाह! मेरी माँ फ़ातिमा बिन्ते अ़हद को बख़्श दे और हिसाब के वक्त सही बात कहने की तौफ़ीक़ अता फ़र्मा, अपने नबी और मुझसे पहले जो अम्बिया गुज़रे हैं उन सबका वास्ता है कि इनकी क़ब्र को कुशादा कर दे, तू रहम करे वालों में सबसे ज़्यादा रह़म करने वाला है।" फिर आपने चार बार तक्बीर कही और अ़ब्बास व अबूबक्र को साथ लेकर उन्हें क़ब्र में लह़द के अन्दर रख दिया। [सिलसिलतुल अ़हादीसुल ज़ईफ़ा/अल्बानीं : 1/32; नम्बर 23]
कुछ लोगों ने इस रिवायत को ज़ात और ह़क़ के वसीले से दुआ़ करने के जवाज़ के लिये इस्तिदलाल किया है। इसी बेबुनियाद रिवायत से सम्हूदी ने वफ़ाउल वफ़ाअ 4/1374 में और कौसरी ने मह़क़ुत्तकूल 379, 391 में और बूत़ी ने अस्सल्फ़िययतु मरहूल : 155 में और उ़लूई मालिकी ने मफ़ाहीम 65 में इस्तिदलाल किया है। मुलाहिज़ा हो इस रिवायत की तमाम सनदों को जमा किया यह रिवायत पाँच सनदों से मरवी है, उनमें तीन मुत्तस़िल और दो मुर्सल हैं, लेकिन कोई भी सनद मुख़्तलिफ़ इल्लतों से ख़ाली नहीं, सबकी सब सख़्त ज़ईर्फ़ हैं। इन तमाम रिवायात में ज़ोअफ़ की जो भी नोइयत है वोह तो है ही, मगर अ़नस रज़ियल्लाहु अन्हु की सनद से मरवी हदीस के अलावा किसी में भी इस मनगढ़ंत वसीले का ज़िक्र नहीं है। पस इस सिलसिले की रिवायात इस हदीस को भी मालूल की फ़हरिस्त में शामिल कर देती हैं, इसलिए कि सब में ज़ोअ़फ़ है और हर एक की इल्लत ज़ोअ़फ़ दूसरे से मरबूत है, जिसकी बिना पर हदीस की अदम कुबूलियत और ज़ोअ़फ़ में इज़ाफ़ा ही होता जाता है।
जहाँ तक इस हदीस के मतन का ताल्लुक़ है तो वोह भी चंद ऐतिबार से ग़ैर मुअ़तबर है, तज्हीज़, तक्फ़ीन और तदफ़ीन से मुताल्लिक़ अहदे नबवी में जो निज़ाम उमूमन जारी था, यह हदीस इसमें मुबालगा आमेज़ी और इन्तिहा पसन्दी पर दलालत करती है। चुनाँचे औरत को गुस्ल दिलाने और उसकी तक्फ़ीन के बारे में रसूलुल्लाह ﷺ की जो सुन्नत रही है, कई ऐतिबार से यहाँ इसकी मुखालिफ़त हो रही है, मस्लन:
किसी औरत की मय्यित को आप ﷺ ने अपने दस्ते मुबारक से पानी डालकर ग़ुस्ल दिया हो ऐसा कोई वाक़िया आपकी ज़िन्दगी में कहीं नहीं मिलता, आपकी लख़्ते जिगर जैनब को ग़ुस्ल दिलाने से मुताल्लिक़ जो वाक़िया हदीस में मिलता है उसमें भी आप ﷺ ने खुद नहीं ग़ुस्ल दिया था, बल्कि दीगर ख़वातीन को हुक्म दिया था कि उसे ग़ुस्ल दें।
चुनाँचे सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम में मुहम्मद बिन सीरीन से रिवायत है, उन्होंने उम्मे अ़त़िया रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया है कि हम आप ﷺ की बेटी को ग़ुस्ल दिला रही थीं कि आप ﷺ हमारे पास आए और कहा: बेरी के पत्ते मिले हुए पानी से उसे तीन बार या पाँच बार और अगर इससे ज़्यादा की ज़रूरत मेहसूस करो तो मज़ीद ग़ुस्ल दो और आख़िर में काफ़ूर इस्तेमाल कर लो। जब ग़ुस्ल देकर फ़ारिग़ हो जाओ तो मुझे बताओ। उम्मे अ़त़िया रज़ियल्लाहु अन्हा का बयान हे कि जब हम ग़ुस्ल देकर फ़ारिग़ हो गईं तो आपने हमारी तरफ़ अपना इज़ारबन्द बढ़ाया और कहा: इसे उसको ऊपर से पहना दो। आप ﷺ ने इससे ज़्यादा कुछ न किया।
नबी करीम ﷺ का अपने हाथ से कोई क़ब्र खोदना, फिर उसकी मिट्टी खुद ही बाहर निकालना और फिर लह़द में लेट जाना, यह सब ऐसी बातें हैं जिनका तज़्किरा इस ज़ईफ़ हदीस के अलावा आपकी ज़िन्दगी में कहीं नहीं मिलता। यह सब अमल आप ﷺ के अफ़्आ़़ल व फ़र्मूदात के ख़िलाफ़ हैं और मुबालगा व इफ़्राज़ पर मुश्तमिल हैं।
ग़ायब के सेग़ा से दुआ़ का आग़ाज़ करना, फिर मुख़ात़ब का सेग़ा बाद में इस्तेमाल करना, यह अस्लूब दुआ आप ﷺ से मंक़ूलशुदा उन मासूरा दुआओं के ख़िलाफ़ है, जिनका आग़ाज़ से़ग़ए मुख़ात़ब 'अल्लाहुम्म अन्त...' से कहते हुए होता है। इस रिवायत में मज़्कूर दुआ़:
अलाहुल्लज़ी... के अलावा हमें कहीं उन सेग़ों से दुआ़ का आग़ाज़ नहीं मिलता है।
इस रिवायत के ज़ईफ़ होने की सबसे क़वी दलील रावी का यह ऐतिराफ़ है कि आप ﷺ ने ख़िलाफ़ आदत यह सब काम सिर्फ एक बार उसी मक़ाम पर किया था। शायद रावी यह कहकर इस रिवायत के लिये वजहे जवाज़ पेश करना चाहता था, लेकिन हक़ीक़त और अफ़साने मे बड़ा फ़र्क़ है।
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 03 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology
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