सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु
[तहरीर नंबर 02]
2. सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के वालिद अबू त़ालिब:
जनाब अबू त़ालिब कोई स़ाहिबे सर्वत और दौलतमंद आदमी न थे, लेकिन वोह अपने भतीजे को अपने फ़रज़न्द से ज़्यादा अज़ीज़ रखते थे, कहीं जाते तो अपने साथ ले जाते, यह जनाब अबू त़ालिब ही थे जिन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ की उनके दादा के बाद परवरिश व ख़बरगीरी की ज़िम्मेदारी ली और हमेशा उनकी हिमायत की और साथ दिया।
और जब रसूलुल्लाह ﷺ ने इस्लाम की क़ुबूलियत का ऐलान किया तो जनाब अबू त़ालिब आपके मुआ़विन बनकर आपके पहलू में खड़े हो गए और पुख़्ता इरादा कर लिया कि हर हाल में आप ﷺ की मदद करेंगे और जीते जी आपको रुस्वा न होने देंगे। क़ुरैश पर यह बात सख़्त गिराँ गुज़री, वोह ह़सद से तिलमिला उठे और आपके ख़िलाफ़ साज़िश का जाल बिछाना शुरू कर दिया। उन लोगों में यह मुआ़हिदा हो कि उनके ख़ानदान से शादी ब्याह के ताल्लुक़ात ख़त्म कर लिये जाएँ, उनके हाथ कोई ख़रीदो फ़रोख़्त न करे और फिर उस मुआ़हिदे को कअ़बा के अन्दरूनी ह़िस़्से़ पर लटका दिया जाए। चुनाँचे सभी ने उसकी पाबन्दी की, ख़ानदाने बनू हाशिम और बनू अ़ब्दुल मुत्त़लिब के अफ़राद ने अबू त़ालिब का साथ दिया और उनके साथ वोह भी 'शेअ़बे अबी त़ालिब' में दाखिल हो गए। [अस्सीरतुन् नब्वियतु /इब्ने हिशाम : 1/350, 351
यह वाक़िया नुबुव्वत के सातवें साल माहे मुह़र्रम का है, तीन साल तक बनू हाशिम उस शेअ़ब में मह़बूस रहे, छुप छुपकर लोग कुछ पहुँचा आते थे। बहरहाल जो कुछ पेश आना था पेश आया और बिल्आख़िर दीमक ने उस अहदनामे को चाट लिया। नबी करीम ﷺ ने अबू त़ालिब को इसकी ख़बर दी और फिर यह अहदनामा चाक कर दिया गया और उस पर अमल मंसूख हो गया। [अस्सीरतुन् नब्वियतु/इब्ने हिशाम: 1/373 से 377]
नुबुव्वत के दसवें साल वस्ते़ शव्वाल में अबू त़ालिब की वफ़ात हो गई, उस वक्त उनकी उम्र कुछ ऊपर अस्सी (80) साल थी, लेकिन अबू त़ालिब ने इस्लाम कुबूल नहीं किया। [बुलूग्ग़ूल अरब: 1/224] उसी साल ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा ज़ौजा नबी करीम ﷺ ने भी वफ़ात पाई। यह वो साल था जिसमें रसूलुल्लाह ﷺ को पे दर पे कई मस़ाइब पेश आए, इसीलिए इस साल का नाम आ़मुल ह़ुज़्न (ग़म का साल) पड़ गया। [अस्सीरतुन् नब्वियतु/इब्ने हिशाम: 1/415, 416]
3. बिरादराने अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु:
अबू त़ालिब के चार लड़के थे, एक त़ालिब जिनके नाम से आपकी कुन्नियत अबू त़ालिब थी दूसरे अ़क़ील, तीसरे जाफ़र और चौथे अ़ली और दो स़ाह़बज़ादियाँ थीं, उम्मे हानी और जुमाना और यह सब फ़ातिमा बिन्ते असद के बत़न से थे, उन तमाम भाई बहनो में दस दस साल का फ़र्क़ था, चुनाँचे अबू त़ालिब अ़क़ील से दस साल बड़े थे और ऐसे ही जाफ़र अ़ली से दस साल बड़े थे। [अल् बिदाया वन् निहाया: 7/223]
यहाँ बिरादराने अ़ली का मुख़्तसर तआ़रुफ़ पेश किया जा रहा है।
4. सय्यदना अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की बीवियाँ और औलादें
i. फ़ातिमा बिन्ते रसूलुल्लाह ﷺ: इनके बत़न से ह़सन और हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा पैदा हुए, इन दोनों की ज़िन्दगी पर मुफ़स्सल गुफ़्तगू इंशाअल्लाह आइन्दा पोस्ट में आएगी और साहबज़ादियों में जै़नब अल्कुब्रा और उम्मे कुलसुम अल्कुब्रा थीं।
ii. ख़ौला बिन्ते जाफ़र बिन कै़स बिन मस्लमा: इनके बत़न से मुह़म्मद अ़कबर मारूफ़ ब मुह़म्मद बिन हनफ़िया पैदा हुए।
iii. लैला बिन्ते मसऊ़द बिन ख़ालिद तमीमी: इनके बत़न से उ़बेदुल्लाह और अबूबक्र पैदा हुए।
iv. उम्मुल बनीन बिन्ते हिज़ाम बिन ख़ालिद बिन जाफ़र बिन रबीआ़: इनसे अ़ब्बास अल् अकबर उ़स्मान, जाफ़र अल् अकबर, अ़ब्दुल्लाह की विलादत हुई।
v. अस्मा बिन्ते उ़मैस अल्ख़स्मिआ़: इनसे यह़या और औ़न पैदा हुए। [अल् बिदाया वन् निहाया : 7/332]
vi. सहबाअ: इनका नाम उम्मे हबीब बिन्ते रबीआ़ बिन बुजैर है, दौरे सिद्दीक़ी में मअ़रकए ऐ़नुत्तमर में क़ैदी बनाकर लाई गई थीं।) इनके बतैन से उ़मरुल अक़बर और रुक़य्या पैदा हुईं।
vii. उमामा: इनकी माँ का नाम जै़नब है जो कि रसूलुल्लाह ﷺ की स़ाह़बज़ादी थीं।) बिन्ते आ़स़ बिन रबीअ़ रज़ियल्लाहु अन्हु से मुह़म्मद अल्औसत़ पैदा हुए।
viii. उम्मे सई़द बिन्ते अ़र्वा बिन मसऊ़द सक़फ़ी: इनके बतन से दो स़ाह़बज़ादियाँ उम्मुल ह़सन और रमला अल्कुब्रा पैदा हुईं।
उम्महातुल औलाद:
i. (लौण्डियों) से मुह़म्मद असग़र, उम्मे हानी, मैमूना, ज़ैनब, अ़स़्सुगरा, रमला अ़स़्सुगरा, उम्मे कुलसुम अ़स़्सुगरा, फ़ातिमा उमामा, ख़दीजा, उम्मुल किराम, उम्मे सलमा,उम्मे जाफ़र, जुमाना, और नफ़ीसा की विलादत हुई।
ii. मुह़य्यात बिन्ते इमरउल कै़स से एक बच्ची की विलादत हुई, जो बचपन ही में फ़ौत हो गई। इब्ने सअ़द का बयान है कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की औलाद में इन सबके अलावा और किसी की सेहत हमारे नज़दीक मुसल्लम नहीं है। [तब्क़ातुल कुब्रा: 3/20]
इस तरह अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की कुल औलाद में चौदह (14) लड़के और (19) लड़कियाँ और कुछ रिवायात के मुताबिक़ (17) लड़कियाँ थीं और आपकी नस्ल कुल पाँच औलाद यानी ह़सन, हुसैन, मुह़म्मद बिन हूनफ़िया, अ़ब्बास बिन कलाबिया और अ़म्र बिन तुग़्लबिया से बाक़ी रही। [तब्क़ात: 3/19, 20, अल् बिदाया वन् निहाया: 7/331-333] सय्यदा फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा नीज़ इनकी औलाद ह़सन, हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुमा और उम्मे कुलसुम रज़ियल्लाहु अन्हा की ज़िन्दगी पर इंशाअल्लाह आइन्दा पोस्ट में रोशनी डाली जाती रहेगी।
5. जिस्मानी औस़ाफ़
इब्ने अ़ब्दुल बर अपनी किताब में लिखते हैं कि मैंने क्या ख़ूब इनके औसाफ़ लिखे देखे हैं कि इनका
- क़द दरम्याना मगर क़द्रे ठिगना था,
- आँखें बड़ी बड़ी और स्याह थीं,
- चेहरा ख़ूबसूरती में चौदहवीं के चाँद जैसा था,
- पेट तो तौंदीला और कँधे की हड्डी चौड़ी थी,
- हथेलियाँ सख़्त थीं,
- गर्दन मिस्ल एक चाँदी की सुराही थी,
- उनकी चाँद पर बाल नहीं थे, मगर गुद्दी और सर पीछे की तरफ़ बालों से भरा हुआ था,
- दाढ़ी बढ़ी थी, दोनों तरफ़ की हड्डियाँ शेर के कँधे की हड्डियों जैसी मज़बूत थीं,
- कलाई और बाजू में फ़र्क़ नहीं था, यानी दोनों एक से थे, ठोस और मज़बूत थे,
- चलने में आगे को झुककर चलते थे,
- जब किसी की कलाई पकड़ लेते तो उस शख़्स का गला घुट जाता ओर वोह साँस नहीं ले सकता था,
- रंग में गंदुम गों थे,
- कलाई और हाथ सख़्त थे।
- जब जंग के लिये निकलते तो पूरे इत्मिनाने कल्ब के साथ तेज़ रफ़्तारी से चलते।
- निहायत ताक़तवर बहादुर थे।
[अल्इस्तीआ़बु फ़ी मारिफ़तिल अ़स्हाब: 3/1123]
सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 02 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन
Team Islamic Theology
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