Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 01)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 01)


सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 01]


1. नाम, नसब, कुन्नियत और अल्क़ाब:

i. नामो नसब : 

आपका नाम और नसब यह है अ़ली बिन अबी त़ालिब (अ़ब्दे मुनाफ़ (अबू त़ालिब का नाम अ़ब्दे मुनाफ़ है।) बिन अ़ब्दुल मुत़्तलिब (अ़ब्दुल मुत़्तलिब का नाम शैबतुलल ह़म्द है। [अल्इस्तीआ़ब: 3/1089] बिन हाशिम बिन अ़ब्दे मुनाफ़ बिन क़ुस़य बिन किलाब बिन मुर्रा बिन कअ़ब बिन लूई बिन ग़ालिब बिन फ़िहर बिन मालिक निब नज़्र बिन किनाना बिन ख़ुज़ैमा बिन मुदरिका बिन इल्यास बिन मुज़र बिन नज़्ज़ार बिन मअ़दि बिन अदनान [तब्क़ातुल कुब्रा: 3/19, सिफ़तुस्सफ़्वा: 1/308; अल् बिदाया वन् निहाया: 7/333; अल्इसाबा: 1/507; अल्इस्तीआ़ब: 1/1089; अल् मुन्तज़िम 5/66; अल्मुअजम अल्कबीर लित्तब्रानी: 1/50]

आप रसूलुल्लाह ﷺ के चचाज़ाद भाई थे। आपके दादा अब्दुल मुत़्तलिब बिन हाशिम पर आपका नसब ख़ानदाने नुबुव्वत से मिल जाता है। अ़ब्दुल मुत़्तलिब के साह़बज़ादे अबू त़ालिब, नबी करीम ﷺ के वालिद अब्दुल्लाह के हक़ीक़ी भाई थे, आपकी विलादत के वक्त आपकी माँ ने अपने बाप असद बिन हाशिम के नाम पर आपका नाम 'असद' रखा था, 

अबू तालिब घर में मौजूद न थे, जब आए तो आपको यह नाम पसन्द न आया और आपका नाम अ़ली रख दिया। 


ii. कुन्नियत: 

आपकी कुन्नियत अबुल ह़सन है। यह निस्बत आपके बड़े स़ाह़बज़ादे ह़सन रज़ियल्लाहु अन्हु की तरफ़ है जो कि फ़ातिमा बिन्ते रसूलुल्लाह ﷺ के बत़न से पैदा हुए। आपकी कुन्नियत अबू तुराब भी है, इस कुन्नियत से आपको नबी करीम ﷺ ने नवाज़ा था, जब आपको अबू तुराब कहकर पुकारा जाता था तो आप बहुत खुश होते थे, इस कुन्नियत की वजह यह थी कि एक रोज़ रसूलुल्लाह ﷺ फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा के घर आए तो अली रज़ियल्लाहु अन्हु को घर पर न पाया। आपने पूछा : "तुम्हारे ससुरज़ाद (शौहर) कहाँ है? 

फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा ने कहा: एक मामले पर मेरे और उनके बीच अनबन हो गई, वोह मुझसे नाराज़ होकर यहाँ से चले गए, मेरे पास कैलूला भी नहीं किया। 

आप ﷺ ने एक आदमी से कहा: देखो वोह कहाँ गए, वोह साहब तलाश करके लौटे तो बताया कि अल्लाह के रसूल ! वोह मस्जिद में सो रहे हैं। अल्लाह के रसूल ﷺ मस्जिद में तशरीफ़ लाए, देखा तो वोह बेख़बर सो रहे हैं और निस्फ़ चादर ज़मीन पर है और जिस्म पर मिट्टी लगी हुई है। आप ﷺ अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के जिस्म से मिट्टी झाड़ने लगे और कहा: "ऐ अबू तुराब ! उठ जाओ।" [सहीह मुस्लिम: 2409]

और सहीह बुख़ारी की रिवायत है कि वल्लाह, नबी करीम ﷺ ही ने आपको इस कुन्नियत से नवाज़ा है। [सहीह बुख़ारी: 441, 3703, 3280]

आपकी एक कुन्नियत अबुल ह़सन वल हुसैन और अबुल क़ासिम, हाशमी है। [अल् बिदाया वन् निहाया: 7/223] नीज़ अबुस्सब्त़ैन एक कुन्नियत है। [असदुल ग़ाबाः 4/16] सब्तै़न से मुराद ह़सन और हुसैन हैं।


iii. लक़ब : 

आपका लक़ब अमीरुल मोमिनीन और चौथे ख़लीफ़ए राशिद हैं। [तारीखुल् इस्लाम/अज़हबी, पेज 276; अल् बिदाया वन् निहाया: 7/223; ख़ुलास़ा तहज़ीबुल कमाल: 2/250]


iv. पैदाइश: 

इस सिलसिले में रिवायात मुतअ़द्दद व मुख्तलिफ़ है कि आपकी पैदाइश किस सन में हुई। चुनाँचे ह़सन बस़री रहमतुल्लाह अलैह‌ के नज़दीक आपकी विलादत बिअ़सते नबवी से पन्द्रह या सौलह बरस पहले हुई। [अल्मुअ़जमुल कबीर लित़ब्रानी: 1/54; रक़म 161; इसकी सनद मुर्सल है।] 

जबकि इब्ने इस्हाक़ के नज़दीक आपकी विलादत बिअ़सते नबवी से दस बरस पहले हुई। [अस्सीरतुन् नब्विया: 1/262 (इसकी सनद मज़्कूर नहीं है।)] 

हाफ़िज़ इब्ने हूजर ने दूसरे क़ौल को राजेह क़रार दिया है। [अल्इसाबा: 2/501] और अल्बाक़िर मुहम्मद बिन अ़ली ने इस सिलसिले में दो अक्क़ाल नक़्ल किये हैं: 

  1. एक तो इब्ने इस्हाक़ की तहक़ीक़ के मुताबिक़ कि जिसे हाफ़िज़ इब्ने ह़जर ने भी राजेह माना है यानी बिअ़सते नबवी से दस बरस पहले [अल्मुअजमुल कबीर लितब्रानी: 1/53; रक़म 165; इसकी सनद हसन है।] 
  2. दूसरा यह कि आपकी विलादत बिअ़सते नबवी के पाँच साल पहले हुई। [अल्मुअ़जमुल कबीर लित्तबरानी: 1/53; रक़म 166*] मुहम्मद अल्बाक़िर तक इसकी सनद हसन है लेकिन उन्होंने मुर्सलन रिवायत किया है। 

मेरा रुझान हाफ़िज़ इब्ने ह़जर और इब्ने इस्हाक़ के क़ौल की तरफ़ है यानी सही तहक़ीक़ के मुताबिक़ आपकी विलादत बिअ़सते नबवी से दस बरस पहले हुई। [फ़त्हुल बारी: 7/174, अल्इसाबा: 2/507] और फ़ाकही (साहिबे अख़बार मक्का, बित्तहक़ीक़ अ़ब्दुल मलिक बिन दुहेश यह रिवायत सनदन सही नहीं, इसलिए ज़ईफ़ है।) बनू हाशिम में अ़ली सबसे पहले ऐसे शख़्स हैं जो ख़ानए कअ़बा में पैदा हुए। और इमाम हाकिम ने लिखा है कि बेशुमार अख़बार व आसार दलालत करते हैं कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ख़ानए कअ़बा में पैदा हुए। [अल्मुस्तदरक 3/483] रिवायत ज़ईफ़ है।


v. अ़ब्दुल मुत़्तलिब बिन हाशिम:

रसूलुल्लाह ﷺ और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के दादा थे, अ़ब्दुल मुत़्तलिब बिन हाशिम अपने चचा 'मुत्त़लिब' के बाद ह़ुज्जाज के लिये पीने का पानी फ़राहम करने और उनकी मेहमान नवाज़ी करने के मंसब पर सरफ़राज़ हुए, उन्होंने अपने अहद में अपने आबाओ अज्दाद के नक़्शे क़दम पर लोगों की यह ख़िदमतें बड़ी ख़ूबी और वुस्अ़त से अंजाम दों, जिससे लोगों के बीच उनका रुत्बा बुलन्द हुआ और उनको वोह इज़्ज़तो तौक़ीर, अवाम की अक़ीदत और ख़्वास का एह़तिराम हासिल हुआ जो उनके पेशरू बुजुर्गों को भी हासिल नहीं हुआ था। [अस्सीरतुन् नब्वियतु/इब्ने हिशाम: 1/142]

अ़ब्दुल मुत़्तलिब अपने दादा क़ुस़य की तरह बड़े मालदार और कुरैश के तन्हा मख्दूमो मुत़ाअ़ नहीं थे, बल्कि उस वक्त मक्का में उनसे ज़्यादा मालदार, साहिबे हैसियत व वजाहत लोग मौजूद थे, अल्बत्ता आयाने मक्का में उनका शुमार था, क्योंकि सक़ायह व रिफ़ादह का मंस़ब उन्हें हासिल था, वोह बिअरे ज़मज़म के मुतवल्ली थे और ज़मज़म का बैतुल्लाह से जो ताल्लुक़ है उसकी बिना पर उनकी वजाहत में इज़ाफ़ा हुआ। [अल्मुफ़स़्स़ल फ़ी तारीख़िल अ़रब क़ब्लल इस्लाम/जव्वाद अ़ली: 4/78; अल्मुर्तज़ा: 22]

अ़ब्दुल मुत़्तलिब को बैतुल्लाह की अज़्मत और उसके ख़ानाए ख़ुदा होने का यक़ीन और उसकी निगहबानी व पासबानी का पुख़्ता ऐतिमाद था। इसका अन्दाज़ा इस बात से किया जा सकता है जो यमन के हाकिम अब्रहा से की थी, जब उसने मक्का पर हमलावर हुआ और उसकी एहानत की और अज़्मत को पामाल करने का इरादा किया, तो अब्रहा के सिपाही अधब्दुल मुत़्तलिब के दो सौ ऊँट भगा ले गए, अ़ब्दुल मुत़्तलिब उससे गुफ़्तो शुनीद के लिये गए, उसके दरबार में जाने की इजाज़त ली, अब्रहा ने उनकी ताज़ीम की और उनके इस्तिक़बाल में अपने तख़्त से उतर पड़ा और उन्हें अपने साथ बिठाया और पूछा: क्या हाजत है जिसके लिये तक्लीफ़ की? 

अ़ब्दुल मुत़्तलिब ने फ़र्माया: मेरी हाजत यह है कि तुम्हारे आदमी मेरे दो सौ ऊँट भगाकर ले आए हैं वोह वापस कर दो।

अ़़ब्दुल मुत्त़लिब की जुबान से यह बात सुनकर अब्रहा ने ह़क़ारत आमेज़ निगाहों से उनको देखा और बोला: तुम दो सो ऊँटों के बारे में बातचीत करने आए हो और उस 'घर' को फ़रामोश कर रहे हो, जिससे तुम्हारे और तुम्हारे आबाओ अज्दाद का दीन वाबस्ता है और जिसको मैं मुन्हदिम करने आया हूँ। 

अ़ब्दुल मुत़्तलिब ने कहा: मैं ऊँटों का मालिक हूँ और उस घर का एक अल्लाह मालिक है, वोह मौजूद है और वही उसकी तरफ़ से दिफ़ाअ करेगा। 

अब्रहा ने कहा वोह मुझे इससे नहीं रोक सकेगा, अ़ब्दुल मुत़्तलिब ने जवाब दिया: तुम जानो और वोह जाने। 

[सीरते इब्ने हिशाम: 1/49, अल्मुर्तज़ा: 23]

बिल्आख़िर वही हुआ, जो अ़ब्दुल मुत़्तलिब ने कहा था: ख़ानाए कअबा के मालिक ने अपने घर की हिफ़ाज़त की और अब्रहा की साज़िश और उसकी फ़ौजी काविशो कार्रवाई रायगाँ गई:

وَ أَرْسَلَ عَلَيْهِمْ طَيْرًا أَبَابِيلَ تَرْمِيهِمْ بِحِجَارَةٍ مِنْ سِجِيلٍ فَجَعَلَهُمْ كَعَصْفٍ مَّاكُولٍ

"और उन पर झुण्ड के झुण्ड परिन्दे भेज दिये। जो उन पर खंगर (पकी हुई मिट्टी) की पथरियाँ फेंकते थे. तो उसने उन्हें खाये हुए भूसे की तरह कर दिया।" [सूरह फ़ील: 3-5]

अ़ब्दुल मुत्तूलिब अपनी औलाद को जुल्मो ज़्यादती से बाज़ रखते, अख़लाक़ी व शराफ़त के उसूल पर क़ायम रहने और पस्ती व बदअख़लाक़ी से दूर रहने की नसीहत किया करते थे। साल से ज़्यादा उम्र पाने के बाद अ़ब्दुल मुत़्तलिब ने वफ़ात पाई। उस वक्त रसूलुल्लाह ﷺ की उम्र आठ (8) साल थी। इसका मतलब यह हुआ कि उनकी वफ़ात तक़रीबन 578 ईस्वी में हुई। मुअर्रिख़ीन ने लिखा है कि उनकी वफ़ात पर बहुत दिनों तक मक्का के बाज़ार बन्द रहे। [अल्मुफ़स़्स़ल फ़ी तारीख़िल अ़रब क़ब्लल इस्लाम: 4/78]


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 01 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Subscribe

Follow Us

WhatsApp
Chat With Us
WhatsApp
WhatsApp Chat ×

Assalamu Alaikum 👋
How can we help you?

Start Chat