Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu (Tahreer No. 13)

Seerat Ali bin Abi Talib RaziAllahu Anhu

सीरत-ए सय्यदना अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु

[तहरीर नंबर 13]


15. आप ﷺ की मर्ज़ुल मौत की वस़िय्यत की हक़ीक़त

आप ﷺ ने अपनी मर्ज़ुल मौत में जो वस़िय्यतनामा लिखवाने का इरादा किया था उसकी हक़ीक़तः सैय्यदना अ़ब्दुल्लाह बिन अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि जब रसूलुल्लाह ﷺ की वफ़ात का वक्त क़रीब हुआ तो घर में बहुत से सहाबा किराम मौजूद थे। आप ﷺ ने इर्शाद फ़र्माया, "लाओ मैं तुम्हारे लिये एक दस्तावेज़ लिख दूँ,अगर तुम उस पर चलते रहे तो फिर तुम गुमराह न हो सकोगे।" 

इस पर कुछ लोगों ने कहा कि आप ﷺ पर बीमारी की सख़्ती हो रही है, तुम्हारे पास क़ुरआन मौजूद है। हमारे लिये तो अल्लाह की किताब काफ़ी हे फिर घरवालों में झगड़ा होने लगा, कुछ ने तो यह कहा कि आप ﷺ को कोई चीज़ लिखने की दे दो कि उस पर आप हिदायत लिखवा दें और तुम उसके बाद गुमराह न हो सको, कुछ लोगों ने इसके ख़िलाफ़ दूसरी राय पर इस़रार किया, जब शोरो गुल और नज़ाअ़ ज़्यादा हुआ तो आप ﷺ ने फ़र्माया: "क़ूमू" यहाँ से जाओ। 

उ़बैदुल्लाह ने बयान किया कि इ़ब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु (उसके बाद) कहते थे: मुसीबत सबसे बड़ी यह थे कि लोगों ने इख़्तिलाफ़ और शोर करके आप ﷺ को वोह हिदायत नहीं लिखने दी। [सहीह बुखारी: 4432]

दूसरी रिवायत में यूँ है कि इ़ब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने जुमेरात के दिन का ज़िक्र किया और फ़र्माया: "मालूम भी है कि जुमेरात के दिन क्या हुआ था" रसूलुल्लाह ﷺ के मर्ज़ में तेज़ी पैदा हुई थी, उस वक्त आपने फ़र्माया, "शाना व दवात लाओ मैं तुम्हारे लिये वस़िय्यत नामा लिख दूँ कि तुम उस पर चलोगे तो उसके बाद फिर तुम कभी गुमराह न होगे।" लेकिन यह सुनकर वहाँ इख़्तिलाफ़ पैदा हो गया, हालाँकि नबी करीम ﷺ के सामने नज़ाअ़ न होना चाहिए था। कुछ लोगों ने कहा कहीं आप ﷺ शिद्दते मर्ज़ की वज़ह से बेम‌अ़नी कलाम तो हों फ़र्मा रहे हैं? बात समझने की ग़र्ज़ से आपसे दोबारा इस्तिफ़्सार कर लो, तो आप ﷺ से सहाबा पूछने लगे। आपने फ़र्माया, "यहाँ शोरोगुल न करो, जिस काम में मशगूल हों वोह उससे बेहतर है जिसके लिये तुम कह रहे हो" उसके बाद आप ﷺ ने सहाबा को तीन चीज़ों को वस़िय्यत की। फ़र्माया "मुश्किीन को जज़ीरए अरब से निकाल दो, वफ़द (जो क़बाइल के तुम्हारे पास आएँ) उनकी इस तरह ख़ातिर किया करना जिस तरह मे करता आया हूँ" और तीसरी बात (इ़ब्ने अ़ब्बास ने या सईद ने) बयान नहीं की, या (सईद बिन ज़ुबैर या सुलेमान ने कहा) में तीसरी बात भूल गया। [सहीह बुखारी: 4431]

इस हदीस और इसके मज़्मून पर मुश्तमिल दीगर अ़हादीस में सहाबा किराम के इख्तिलाफ़ और शोरोशग़फ़ के मुताल्लिक़ जो कुछ मज़्कूर है और जिसे रवाफ़िज़ अपने तानो तश्नीअ़ का हदफ़ बनाते हैं दरहक़ीक़त उससे उन पर कोई तानो तश्नीअ़ लाज़िम नहीं आता, बल्कि उनके तमामतर ऐतिराज़ात यक्सर फ़ासिद व बातिल हैं, मुतक़द्दिमीन उ़लमा ने इससे मुताल्लिक उनके चंद अहम ऐतिराज़ात की तर्दी द की है और उनके शुब्ह़ात का इज़ाला किया है।


a. बिला शुब्हा सहाबा के दरम्यान इख़्तिलाफ़ रहा है और इसकी वजह यह है कि आप ﷺ की बात समझने और इसका मअ़नी मुतअ़य्यन करने में इनकी राए मुख्तलिफ़ रहें। ह़ुक्मे नबवी से सरताबी की वजह से इख़्तिलाफ़ कभी न रहा। इमाम क़ुर्तुबी फ़र्माते हैं कि सहाबा में इख़्तिलाफ़ की वज़ह यह थी कि उन्होंने इज्तिहाद किया और नेक नियती से इज्तिहाद किया। इस इज्तिहाद में दोनों फ़्रीक़ हक़ पर रहे या एक दुरुस्त राय तक पहुँचे और दूसरा इससे क़ाज़िर रहा ऐसी सूरत में दुरुस्त राय तक जिसकी रसाई न हो सकी वोह गुनाहगार न होगा बल्कि वोह भी नेक निय्यती से इज्तिहाद की बिना पर सवाब का मुस्तहिक़ होगा। आगे फ़र्माते हैं वस़िय्यतनामा के बारे में इख़्तिलाफ़ हो जाने पर अल्लाह के रसूल ﷺ ने किसी की कोई सरज़निश नहीं की और न ही बुरा भला कहा, बल्कि सहाबा से कहा: "(यहाँ शोरोगुल न करो) जिस काम में मशगुल हों वोह उससे बेहतर है जिसके लिये तुम कह रहे हो।" यह वाक़िया ऐसे ही है जैसे कि ग़ज़्वए अ़ह़जाब के मौके पर पेश आया। आप ﷺ ने सहाबा से कहा: "तुम लोग बनू क़ुरैज़ा के पास पहुँचकर ही अ़स़र की नमाज़ पढ़ो।" [सहीह बुखारी: 4119] चुनाँचे उनमें से कुछ लोगों ने बनू कुरैज़ा पहुँचने से पहले ही इस ख़ौफ़ से नमाज़ पढ़ ली कि नमाज़ का वक्त ख़त्म हो जाए। और कुछ लोगों ने कहा कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने हमें वहाँ पहुँचकर ही नमाज़ पढ़ने का ह़ुक्म दिया है इसलिए हम वहीं पढ़ेंगे लेकिन इस इख़्तिलाफ़ के बावुजूद किसी ने किसी को बुरा भला नहीं कहा। [अल्मुफ़्हम लिमा अश्कलु मिन तल्ख़ीसु किताब मुस्लिम: 4/559]


b. रवाफ़िज़ का एक ऐतिराज़ यह है कि उस मौके पर सहाबा का आपस में इख़्तिलाफ़ और उसके नतीजे में नबी करीम ﷺ के वसिय्यतनामे का वुजूद में ना आना। दो ऐसी चीजें थीं जिनकी वजह से पूरी उम्मते मुस्लिमा फ़साद का शिकार हुई और वोह मासूम न रह सकी।

रवाफ़िज़ का ये ऐतिराज़ बातिल है, क्योकि इसका लाज़मी मफ़्हूम यह हुआ कि नबी करीम ﷺ ने ऐसी कुछ बातों की तब्लीग नहीं की जिससे उ़म्मत गुमराही से महफूज़ रह सकती थी और अपने सिर्फ़ सहाबा के इख़्तिलाफ़ को देखकर अल्लाह की शरीअ़त को छुपा लिया और उसी पर मौत हो गई, हालाँकि यह मफ़्हुम क़ुरआन मजीद की इस आयते करीमा के सरीह मुखालिफ़ है:

 یٰۤاَیُّہَاالرَّسُوۡلُ بَلِّغۡ  مَاۤ اُنۡزِلَ اِلَیۡکَ  مِنۡ رَّبِّکَ ؕ وَ  اِنۡ لَّمۡ تَفۡعَلۡ فَمَا بَلَّغۡتَ رِسَالَتَہٗ ؕ وَ اللّٰہُ یَعۡصِمُکَ مِنَ النَّاسِ ؕ اِنَّ اللّٰہَ  لَا یَہۡدِی الۡقَوۡمَ الۡکٰفِرِیۡنَ ﴿۶۷﴾

"ऐ रसूल !  पहुँचा दे जो कुछ आप की तरफ़ तेरे रब की जानिब से नाज़िल किया गया है और अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो पैग़म्बर का हक़ अदा नहीं किया। और अल्लाह तुझे लोगों से बचाएगा। बेशक अल्लाह काफ़िर लोगों को हिदायत नहीं देता।" [ सूरह माइदा: 67]

चूँकि आप ﷺ इस ख़यानत से बिलकुल पाक थे, और तज़्कियए इलाही,

 لَقَدۡجَآءَکُمۡ رَسُوۡلٌ مِّنۡ اَنۡفُسِکُمۡ عَزِیۡزٌ عَلَیۡہِ مَا عَنِتُّمۡ حَرِیۡصٌ عَلَیۡکُمۡ بِالۡمُؤۡمِنِیۡنَ رَءُوۡفٌ رَّحِیۡمٌ ﴿۱۲۸﴾

"तुम्हारे पास एक ऐसे पैग़म्बर तशरीफ़ लाये हैं जो तुम्हारी जिन्स से हैं जिनको तुम्हारी मज़र्रत की बात बहुत गिराॅं गुज़रती है। तुम्हारी मन्फ़अ़त के बड़े ख़्वाहिशमंद रहते हैं। ईमानवालों के साथ बड़े ही शफ़ीक़ और मेहरबान हैं।" [सूरह तोबा: 128]

नबी करीम ﷺ बमौजिब ऐसी तोहमतों से बिलकुल बरी थे, इसलिए अल्लाह ने आपके क़ल्बी रुझहान को यूँ ताबीर किया कि आप ﷺ अपनी उम्मत पर हरीस हैं, यानी उम्मत की हिदायत और उसके दुनियावी व उखरवी नफ़ारसानी के लिये ख़्वाहिशमंद हैं। [तफ़्सीर इब्ने कसीर: 2/404] 

तमाम मुसलमानों को इस बात पर यकीन है और जिसके दिल में ज़र्रा बरबार ईमान की रमक़ होगी उसे भी शक न होगा कि नबी करीम ﷺ ने अल्लाह के तमामतर पैग़ामात को पहुँचा दिया और वो अपनी उम्मत की खै़रख़्वाही के हमेशा ख़्वाहिशमंद थे जैसाकि आपकी मुजाहिदाना ज़िन्दगी, क़ुर्बानियों और तर्गी़बो तश्जीअ़ के वाक़ियात इस पर दलालत करते हैं तो जब आप ﷺ की यह दयानतदारी और खै़रख़्वाही हर ख़ासो आम के नज़दीक मुसल्लम है तो हमें इस बात पर यक़ीन करना चाहिए कि अगर वो वस़िय्यतनामा इतना अहम होता जिससे पूरी उम्मत गुमराही से बच जाती और क़ियामत तक के लिये उसमें कोई इख़्तिलाफ़ वाक़ेअ न होता, तो अ़क़्लन और नस़्स़न किसी ऐतिबार से यह बात हर्गिज़ समझ में नहीं आती कि आप ﷺ उसे अपनी ज़िन्दगी के इस तंग वक्त तक के लिये मुअख़्ख़र किये रहते और अगर मुअख्ख़र भी किया था तो सिर्फ़ चंद सहाबा के इख़्तिलाफ़ की वजह से उसे बयान न करते। [मुख्तस्रर तौहफ़तुल इस्ना अशरा: 251, अल्इंतिसारु लिस्सहवि वल आल: 228, 229] 

ऐसा कभी तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता कि आप ﷺ अपने रब के फर्मान की तब्लीग़ छोड़ दें और अगर बिल्फ़र्ज़ यह तस्लीम कर लिया जाए कि किसी मस़्लिह़त की वजह से आपने उस वक्त नहीं लिखवाया, तो बाद में उसे लिखवाने से कौनसी चीज़ मानेअ रही क्योकि उसके बाद मज़ीद चंद दिनों यानी दो शंबा तक आप बाह़यात रहे, जैसाकि सहीहैन वग़ैरह में अनस रज़ि० से साबित है। [सहीह बुख़ारी: 4448; सहीह मुस्लिम: 419] 

जबकि बिल्इत्तिफ़ाक़ वस़िय्यतनामा लिखवाने का वाक़िया जुमेरात का है। [तारीखुल बग़दाद: 3/455]

और इस पर भी रवाफ़िज़ और अहले सुन्नत सब मुत्तफ़िक़ हैं कि फिर अपनी वफ़ात तक आप ﷺ ने कुछ नहीं लिखवाया। पस यक़ीनी तौर पर हमें मानना पड़ेगा कि जिस चीज़ को आप ﷺ लिखवाना चाहते थे, वो कोई ऐसी चीज़ न थी जिसकी तब्लीग़ के लिये आप मामूर रहे हों, क्योंकि क़ुरआन के बयान के मुताबिक़ अल्लाह ने इस वाक़िया से पहले ह़ज्जतुल वदाअ़ के मौके पर ही दीन के मुकम्मल होने का ऐलान कर दिया था: 

 "اَلۡیَوۡمَاَکۡمَلۡتُ لَکُمۡ دِیۡنَکُمۡ وَ اَتۡمَمۡتُ عَلَیۡکُمۡ نِعۡمَتِیۡ وَ رَضِیۡتُ لَکُمُ الۡاِسۡلَامَ دِیۡنًا ؕ فَمَنِ"

"आज मैं ने तुम्हारे लिये तुम्हारा दीन कामिल कर दिया और तुम पर अपनी नेअ़मत पूरी कर दी और तुम्हारे लिये इस्लाम को दीन की हैसियत से पसन्द कर लिया।"‌ [सूरह माइदा: 3]

इमाम इ़ब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: "वस़िय्यतनामा लिखवाने का हुक्मे इलाही होता तो आप ﷺ उसे लिखवाते या उसी वक्त बताते, अगर ऐसी बात होती तो आप उसकी बजाआ़वरी से हर्गिज़ बाज़ न आते, आपने अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त के मुताल्लिक़ मुत्वक़्क़ा नज़ाअ़ के इज़ाले की मस्लिहत से कुछ लिखवाना चाहा था, लेकिन जब आपको अन्दाज़ा हो गया कि इख़्तिलाफ़ होना ही है तो आप ﷺ ख़ामोश हो गए। [मिन्हाजुस्सुन्ना: 6/316]

एक दूसरे मक़ाम पर फ़र्माते हैं: इस तहरीर या वस़िय्यतनामा का वाक़िया जैसे अल्लाह के रसूल ﷺ लिखवाना चाहते थे, बड़ी वज़ाहत से सहीहैन में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से यूँ मरवी है कि नबी करीम ﷺ ने अपनी मर्ज़ुल मौत में फ़र्माया : "अपने बाप और भाई को मेरे पास बुलाओ ताकि मैं वस़िय्यत लिख दूँ, मुझे डर है कि ह़रीस़ इसकी आरज़ू करेंगे और कुछ कहने वाले यह भी कहेंगे कि ख़िलाफ़त का हक़दार मैं ज़्यादा हूँ, मगर अबूबक्र की ख़िलाफ़त के सिवा न ही अल्लाह किसी की ख़िलाफ़त को तस्लीम करेगा और न मुसलमान।" [सहीह बुखारी: 5666, 7217; व सहीह मुस्लिम: 2387] 

इसके बाद चंद रिवायात लिखते हैं और फ़र्माते नबी करीम ﷺ ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से जिस राय का इज़्हार किया उसके तैईं वस़िय्यत लिखवाने का अ़ज़्म कर लिया था, लेकिन जब आपने देखा कि कुछ लोगों के ज़हनों में अबूबक्र की ख़िलाफ़त के मुताल्लिक़ शक हाइल हो गया है? तो सोचा कि वस़िय्यतनामा उस शक को ज़इल नहीं कर सकता, लिहाज़ा वस़िय्यतनामा लिखवाने का कोई फ़ायदा नहीं है। मज़ीद आप ﷺ को इस बात का भी इल्मो यक़ीन हो चुका था कि अल्लाह तआ़ला मेरी ही ख़्वाहिश और अ़ज़्म के मुताबिक़ मुसलमानों को अबूबक्र रज़ि० की ख़िलाफ़त पर मुत्तफ़िक़ करेगा, जैसाकि आप ﷺ फ़र्माया: अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िलाफ़त के सिवा न ही अल्लाह किसी की ख़िलाफ़त को तस्लीम करेगा, न मुसलमान। [मिन्हाजुस्सुन्ना: 6/23-25]

ह़दीस का जो आख़िरी टुकड़ा है कि "लन् तज़िल्लू बअ़दी" मेरे बाद गुमराह न होगे, शाह वलिउल्लाह मुहूद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह‌ ने इसकी तौजीह में फ़र्माया कि अगर यह ऐतिराज़ किया जाए कि जिस चीज़ को लिखा जाना था उसका ताल्लुक दीन से न था तो आप ﷺ ने उसके बारे में यह क्यों फ़र्माया "लन् तज़िल्लू बअ़दी" यानी मेरे बाद हर्गिज़ गुमराह न होगे। तो इसका जवाब यह है कि गुमराही का लफ़्ज़ मुख्तलिफ़' मक़ामात पर मुख्तलिफ़ मअ़नी के लिये इस्तेमाल में आता है। यहाँ मुराद ये है कि निज़ामे मम्लिकत चलाने में ग़लती न करोगे, यानी जज़ीरए अ़रब से मुश्किीन को निकालने, वफ़ूद की ख़ातिरो मदारात करने और लश्करे ओसामा को रवाना करने में मेरी सियासत कारबन्द हो गए और फिर आप ﷺ की वफ़ात के बाद अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु और सहाबा किराम अज्मईन ने ऐसा ही किया, यहाँ 'ज़लालत' का मअ़ना दीन से गुमराही नहीं है। [मुख़्तस़र तौहफ़तुल इस्ना अ़शरिया: पेज 251]

हदीस के आख़िर में इ़ब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि लोगों ने शोर करके आप ﷺ को कुछ लिखने न दिया। [सहीह बुखारी: 4432] 

इस क़ौल की तशरीह में इ़ब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं, "उस वस़िय्यत के लिखने में जो चीज़ ह़ाइल हुई वोह बड़ी मुसीबत थी, लेकिन उनके हक़ में मुसीबत थी जिन्होंने ख़िलाफ़ते सिद्दीक़ी के बारे में शक किया और यह मसला उन पर मुश्तबा हो गया। अगर कोई वस़िय्यतनामा होता तो यक़ीनन इसका शक ज़ाइल हो जाता और मुसीबत दूर हो जाती, रहा वोह शख़्स जिसे कामिल यक़ीन है कि अबूबक्र सिद्दीक़ की ख़िलाफ़त बरहक़ और मुकम्मल है अल्ह़म्दु लिल्लाह! ऐसे शख़्स के लिये कोई मुसीबत नहीं।" [मिन्हाजुस्सुन्ना: 6/25]

इस मफ़्हूम की तौज़ीहो ताईद इस बात से होती है कि इ़ब्ने अ़ब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने यह बात उस वक्त कही जब ख़वारिज व रवाफ़िज़ जैसे अहले बि‌दअ़त और नफ़्सपरस्तों का जुहूर हो गया। इ़ब्ने तैमिया रहमतुल्लाह अलैह‌ : 6/316 और इ़ब्ने ह़जर (रह.) ने इसकी सराहत की है। [फ़न्हुल बारी: 1/209]

मज़्कूर हदीस की रोशनी में कुछ रवाफ़िज़ का यह दावा है कि आप उस वस़िय्यतनामा में अली रज़ियल्लाहु अन्हु को ख़िलाफ़त के लिये नामज़द करना चाहते थे लेकिन यह दावा भी बातिल है। इ़ब्ने तैमिय रहमतुल्लाह अलैह‌ इस दावे के जवाब में फ़र्माते हैं "जिसे यह वहम हो कि यह वस़िय्यतनामा अली रज़ियल्लाहु अन्हु के ख़िलाफ़त के बारे में लिखा जाना था, वो उ़लमाए अहले सुन्नत वल जमाअ़त और उ़लमाए रवाफ़िज़ शिया दोनों के अक़ीदे के मुताबिक़ बिल्इत्तिफ़ाक़ गुमराह और जाहिल है। अहले सुन्नत तो इस पर मुत्तफ़िक़ ही हैं कि अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु ख़लीफ़ए अव्वल और सबसे अफ़ज़ल थे और शियाने जो कि अली रज़ियल्लाहु अन्हु को इमामत का अव्वलीन मुस्तहिक़ क़रार देते हैं वो कहते हैं कि इस वाक़िया से बहुत पहले बिलकुल वाज़ेह और मारूफ़ तरीके से आपको इमामत के लिये नामज़द किया जा चुका है। ऐसी सूरत में आपके इस्तिहक़ाक़ के इस्बात के लिये किसी वसिय्यतनामे की कोई ज़रूरत ही नहीं रहती।" [मिन्हाजुस्सुन्ना: 6/25: अल्इंतिसारु लिम़्स़हब वल आल, पेज 281, 281, 283]


c. इस ह़दीस के हवाले से रवाफ़िज़ शिया उ़मर रज़ि० पर त़अ़न करते हैं, उनका कहना है उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु ने अहजर कहकर नबी करीम ﷺ पर बेमअ़नी क़लाम करने की तोहमत लगाई और आप ﷺ की बात न सुनी और कहा कि हमारे लिये अल्लाह की किताब काफ़ी हे इस ऐतिराज़ का जवाब यह है कि अहजर' के लफ़्ज़ के निस्बत उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु की तरफ़ करना यक्सर गलत और बातिल है। यह बात उस मौके पर जो लोग हाज़िर थे उनमें से किसने कही थी? सहीहैन की रिवायात से इसके क़ाइल की तअयीन नहीं होती क्योंकि इसके अल्फ़ाज़ "फ़क़ालू माशअनुहु अहजर" में क़ाइल के लिये जमा का से़ ग़ा इस्तेमाल हुआ है। लिहाज़ा उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु को इसका क़ाइल नहीं माना जा सकता है। हाफ़िज़ इ़ब्ने ह़जर रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: "मेरे ख़्याल में एक तीसरा एह़तिमाल राजेह़ है जिसे क़ुर्तुबी ने ज़िक्र किया है। वो ये कि ऐसी बात किसी ऐसे शख़्स ने कही होगी जो नो मुस्लिम रहा होगा, और वोह पहले से जानता रहा होगा जो सख़्स़ सख़्त मुसीबत व उलझन से दो चार होता है वो उस वक्त में अपना अस़ली मक़्सद अच्छी तरह से से तहरीर नहीं करवा पाता।" [फ़त्हुल बारी: 8/133]

शाह अ़ब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: "यह कहाँ से साबित होता है कि यह बात उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कही थी जबकि अक़्सर रिवायात में क़ाइल के लिये जमा का सै़ग़ा 'क़ालू' वारिद हुआ है।" [मुख़्तसर तौहफ़तु वल इस्ना अशरिया: पेज 250]

दरहक़ीक़त इस सिलसिले में रिवायात जो सही और साबित हैं उसमें यह कलिमा सै़ग़ाए इस्तिफ़्हाम के साथ यानी 'अहजर' वारिद है और जिन रिवायात में 'हजर' या 'यहजिर' के अल्फ़ाज़ हैं, वो रिवायात मुह़द्दिसीन व शारेह़ीन हदीस मस्लन क़ाज़ी ऐ़याज़, [अश्शफ़ाउ: 2/886; क़ुर्तुबी अल्मुफ्हम: 4/559 और नववी शरह सहीह मुस्लिम: 1/93 और इ़ब्ने ह़जर फ़ल्हुल बारी: 8/133 वगैरह के नज़दीक मरजूह हैं]

इन मुहद्दिसीन ने स़राह़तन यह बात लिखी है कि हाज़िरीने मज्लिस में से जब किसी ने कहा कि न लिखो अल्इंतिस़ारु लिस़्स़ाहब वल आल: पेज 288 तो 'अहजर' के क़ाइल ने इस्तिफ़्हाम इंकारी का ये सै़ग़ा इस्तेमाल किया। (यानी नबी करीम ﷺ बेइख़्तियार कलाम नहीं कर रहे। मुतर्जिम) इमाम क़ुर्तुबी रहमतुल्लाह अलैह‌ ने तब्लीगे़ दीन और दीगर तमाम अह़वाल में गल्तियों से नबी करीम ﷺ की इ़स़्मत और उस पर सहाबा के इत्तिफ़ाक़ के दलाइल को ज़िक्र करने के बाद लिखा है कि यह नामुम्किन है कि आप ﷺ की सख़्त बीमारी की हालत में आपके क़ौल की सदाक़त में किसी शक की बिना पर उन्होंने यह बात कही हो, बल्कि जब क़लम और दवात लाने वाले ने लाने में तरद्दुद किया और उससे पीछे हटा तो उन्होंने कुछ लोगों ने इंकारो तौबीख़ के तौर पर ये बात कही, गोया उनके कहने का मक़सद ये था कि तुम लिखने का सामान क्यों नहीं लाते, क्या समझते हो कि आप ﷺ ग़ैर इख़्तियारी बात नहीं करेंगे, तरद्दुद न करो, और सामान किताबत ह़ाज़िर करो, आप ﷺ हर हाल में हक़ कहेंगे, बेम‌अ़ना कलाम नहीं करेंगे। [अल्मुफ़्हम: 4/559] 

तो यह वाज़ेह दलील है कि तमाम सहाबा नबी करीम ﷺ से हिज़्यानगोई के वक़ूअ़ को बिलकुल नामुम्किन समझते थे, इसी वज़ह से जिन्होंने यह जुम्ला इस्तेमाल किया लाज़मी इंकार के लिये इस्तेमाल किया, ताकि मुख़ालिफ़ के लिये किस तरह से शको शुब्हा की गुंजाइश न निकले और इसी मफ़्हूम से रवाफ़िज़ का दावा भी बातिल हो जाता है।


d. रवाफ़िज़ का यह दावा कि सय्यदना उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने यह कहकर "तुम्हारे पास अल्लाह की किताब है, हमें अल्लाह की किताब काफ़ी है।" रसूलुल्लाह ﷺ से मुआ़रज़ा किया, और वस़िय्यतनामा लिखवाने से मुताल्लिक़ नबी करीम ﷺ के हुक्म की तामील नहीं की। इस बेबुनियाद तोहमत का जवाब ये है कि जनाबे उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु और आपके हमख़्याल दीगर सहाबा के समझ में यह बात आई कि वस़िय्यतनामा तह़रीर करवाने के मुताल्लिक़ आप ﷺ का हुक्म वजूबी नहीं है बल्कि मुस्तक़्बिल में ख़िलाफ़त के मुताल्लिक़ बेहतरीन इक़्दाम की तरफ़ रहनुमाई मक़्सूद है, इसलिए उन्हों ने मुखालिफ़त की। 

क़ाज़ी ए़याज़ अश्शफ़ाउ: 2/887, क़ुर्तुबी अल्मुफ़हम: 2/559, नववी शरह नववी: 11/91 और इ़ब्ने ह़जर फ़त्हुल बारी: 1/209 वग़ैरह इसी बात पर क़ाइल हैं और आप ﷺ के बाद के अमल से उमर फारूक़ रज़ि० के इसी इज्तिहाद की तस़्दीक़ो तौसीक भी हुई। नबी करीम ﷺ ने उस मर्ज़ से शिफ़ा पाने के बाद फिर कुछ न लिखवाया, अगर उसका लिखवाना वाजिब होता तो सहाबा का इख़्तिलाफ़ इस रास्ते में रुकावट न बनता, क्योंकि किसी मुखालिफ़ की मुखालिफ़त से आप ﷺ इस्लाम की तब्लीग़ से रुक जाने वाले न थे, चुनाँचे यही वजह है कि इस वाक़िया को भी उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु के 'मुवाफ़िक़ाते शरअ़' में शुमार किया जाता है। [फ़ल्हुल बारी: 1/209 इ़ब्ने ह़जर]

इसी तरह उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु का ये कहना कि "हमारे लिये अल्लाह की किताब काफ़ी है" दरहक़ीक़त उस शख्स की मुखालिफ़त है जो आपसे हुज्जत कर रहा था, न कि उसमें रसूलुल्लाह ﷺ के किसी हुक्म की मुखालिफ़त है, क्योंकि आपके अल्फ़ाज़ हैं "इन्दकुम किताबुल्लाहि" गोया आपके मुख़ात़ब कई लोग थे जो आपकी राय की मुखालिफ़त कर रहे थे। उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु गहरी नज़र और दुरुस्त राय के मालिक थे, चूँकि ग़ौरो फ़िक्र के बाद आप इस नतीजे पर पहुँचे कि आप ﷺ का फ़र्मान फ़ौरी त़ौर से वाजिबुल अ़मल का मुत्क़ाज़ी नहीं है इसलिए आपने एक क़वी और शरअ़न राजेह़ मस्लिह़त को मुक़द्दम करते हुए वस़िय्यतनामा की तह़रीर पर ज़ोर देने से मना किया और वो मस़्लिह़त ये थी कि मर्ज़ की शिद्दत में आप ﷺ से कुछ लिखवाना आप ﷺ‌ पर शफ़्क़त और मुहब्बत के ख़िलाफ़ और एक नामुनासिब अमल है। आपने रसूलुल्लाह ﷺ के मर्ज़ की शिद्दत को जिन अल्फ़ाज़ में ताबीर किया है वो आपके इम्तिहाद के बरमह़ल और दुरुस्त होने की क़वी दलील है। आपने फ़र्माया था "इन्न रसूलुल्लाहि ﷺ क़द ग़लब्हुल बजउ़" यानी आप ﷺ सख़्त तक्लीफ़ से दो चार हैं, लिहाज़ा मुनासिब नहीं है कि ऐसी ह़ालत में आप ﷺ को मज़ीद परेशानी और तक्लीफ़ में डाला जाए। साथ ही आपके ज़िहन में यह आयते करीमा भी गर्दिश कर रही थी।

"مَا فَرَّطۡنَا فِی الۡکِتٰبِ مِنۡ شَیۡءٍ"

"हमने किताब में किसी चीज़ की कमी नहीं छोड़ी।" [सूरह अन्आम: 38] 

और इर्शादे इलाही है:

"نَزَّلۡنَا عَلَیۡکَ الۡکِتٰبَ تِبۡیَانًا  لِّکُلِّ شَیۡءٍ"

"और हमने आप पर यह किताब नाज़िल की, इस ह़ाल में कि हर चीज़ का वाज़ेह बयान है।" [सूरह नहल: 89]

अ़ल्लामा नववी रहमतुल्लाह अलैह‌ फ़र्माते हैं: शारेहीने हदीस ने उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु की इस राय को बिल्इत्तिफ़ाक़ उनके तफ़क़्क़हू फ़िद्दीन के दलाइल, मनाक़िबो फ़ज़ाइल और दक्त नज़री में शुमार किया है। [शरहन् नववी: 11/90] 

नीज़ वाज़ेह रहे कि सय्यदना उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु वस़िय्यतनामे की अदम तह़रीर पर ज़ोर देने में एक मुज्तहिद थे और 'मुज्तहिद फ़िद्दीन' की ग़लत राय बहरह़ाल क़ाबिले अ़फ़ुव है बल्कि क़ौले रसूलुल्लाह ﷺ "जब कोई हाकिम फ़ैसला देते वक्त इज्तिहाद करे और दुरुस्त राय को पहुँच जाए तो उसे दोहरा अ़ज्र मिलेगा और जब फ़ैसला किया और इज्तिहाद में ग़लती कर गया तो उसे एक अ़ज्र मिलेगा।" सहीह बुखारी: 7352, के मुताबिक़ उसे सवाब भी मिलता है। 

तो आपको इस सिलसिले में क्यों मुत्तहम किया जाता है, जबकि आपने रसूलुल्लाह ﷺ की मौजूदगी में इज्तिहाद किया लेकिन आप ﷺ ने उनकी न कोई मुज़म्मत की, न गुनाहगार कहा, बल्कि अपने अ़मल से इसकी मुवाफ़िक़त ही किया बहरहाल इस वाक़िया के सहारे रवाफ़िज़ शिया सहाबा के ख़िलाफ़ जो भी बदजुबानी और तान करते हैं वो सब ग़लत हैं और रवाफ़िज़ शिया सहाबा के ख़िलाफ़ जो भी ज़हर उ़गलते है वो अहले इल्म के सामने आ ही जाती है।


सीरीज सीरते सय्यदना अ़ली बिन अबी त़ालिब रज़ियल्लाहु अन्हु तहरीर नंबर 13 आगे जारी है इंशाअल्लाह गुजारिश है इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। 

जज़ाकुमुल्लाहु ख़ैरन


Team Islamic Theology

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