तक़दीर कब और कैसे तय होती है?
पैदाइश से पहले ही हमारी तक़दीर क्यों और कैसे लिख दी जाती है?
क्या आपने कभी सोचा है कि हम दुनिया में कैसे आते हैं? हमारी ज़िन्दगी कैसी होगी, हमें क्या मिलेगा, हम क्या करेंगे? ये सब कौन तय करता है?
इसका जवाब हमें हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ ने बहुत खूबसूरत तरीके से समझाया है।
"हर इंसान की ज़िन्दगी की शुरुआत उसकी माँ के पेट में होती है। जब बच्चा माँ के पेट में होता है, तो पहले 40 दिन तक वो नुत्फ़ा (यानि पानी की एक बूंद) की शक्ल में होता है। फिर अगले 40 दिन में वो जम चुके खून (अलका) जैसा बन जाता है। फिर तीसरे 40 दिन में वह एक चबाए हुए गोश्त की तरह बनता है। [सहीह बुख़ारी 3208; सहीह मुस्लिम 2643]
यानी पूरे 120 दिन (लगभग 4 महीने) में उसकी बॉडी बनती है।
इसके बाद, अल्लाह एक फ़रिश्ता भेजता है जो उस अजन्मे बच्चे की चार बातें लिखता है:
- ये बच्चा बड़ा होकर क्या-क्या काम करेगा (अच्छे या बुरे)
- उसका रिज़्क़ कितना होगा (कितनी कमाई, क्या-क्या मिलेगा)
- उसकी उम्र कितनी होगी और
- वह जन्नती होगा या जहन्नमी
फिर उस बच्चे में रूह (जान) डाली जाती है।
लेकिन सबसे हैरान कर देने वाली बात...
रसूलुल्लाह ﷺ ने यह भी बताया कि “कभी एक इंसान पूरी ज़िन्दगी अच्छे काम करता है। लोग उसे बहुत नेक समझते हैं। लेकिन फिर आखिरी वक़्त में वह कोई ऐसा काम कर बैठता है, जो दोज़ख़ का रास्ता बन जाता है।”
और कभी ऐसा होता है कि “एक इंसान पूरी ज़िन्दगी बुरे काम करता है, गुनाह करता है, लेकिन आखिरी वक़्त में वो अल्लाह की तरफ लौट आता है और ऐसे नेक काम करता है कि जन्नत में चला जाता है।”
इससे हमें क्या सीख मिलती है?
इस हदीस में बहुत बड़ी सीख छुपी है:
- हमारी तक़दीर अल्लाह पहले से जानता है, लेकिन हमें नहीं पता कि हमारा अंजाम क्या होगा। इसलिए घमंड या मायूसी दोनों नहीं होनी चाहिए।
- कभी किसी के बारे में जल्दी राय न बनाएं। कोई ज़िन्दगी भर अच्छा रहा लेकिन आख़िर में फिसल गया। कोई ज़िन्दगी भर गुनहगार रहा, लेकिन आख़िर में तौबा करके अल्लाह का प्यारा बन गया।
- हमेशा अच्छे काम करते रहो, क्योंकि कौनसा अमल आख़िरी हो हमें नहीं पता।
- अल्लाह की रहमत बहुत बड़ी है। गुनाहगार से भी अल्लाह प्यार करता है, बस वो तौबा कर ले।
- तक़दीर पर यकीन करो, लेकिन मेहनत और नेक अमल मत छोड़ो। क्योंकि अल्लाह ने हमें कोशिश करने का हुक्म दिया है।
दोस्तों, ये दुनिया बहुत छोटी है। हम यहाँ हमेशा के लिए नहीं आए हैं। जो थोड़े से दिन मिले हैं, उनमें जितना हो सके अच्छे काम करें, लोगों का भला करें, और अल्लाह से दुआ करें कि वो हमें अच्छी तक़दीर वालों में लिख दे।
हमारा अंजाम कैसा होगा, ये हम नहीं जानते लेकिन हम ये तय कर सकते हैं कि हमेशा अच्छे रास्ते पर चलें।
ज़रा सोचिए, जब हमें ये मालूम ही नहीं कि हमारी ज़िन्दगी कब ख़त्म होगी, तो फिर अक़्लमंदी इसी में है कि हर लम्हा ऐसे गुज़रे जैसे ये आख़िरी हो।
- अगर कोई ग़लती हो जाए तो तुरंत तौबा कर लो।
- अगर किसी का दिल दुखा दिया हो तो माफ़ी मांग लो।
- अगर नेमतें मिली हैं तो अल्लाह का शुक्र अदा करो।
- और अगर तकलीफ़ मिली है तो सब्र करो।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, “सबसे अक़्लमंद वह है जो अपनी मौत को याद रखे और उसके बाद की तैयारी करे।” [इब्न माजह – 4259]
तक़दीर और हमारी कोशिश
याद रखिए, तक़दीर पर ईमान लाना ईमान का हिस्सा है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएँ। अल्लाह ने हमें इरादा और कोशिश दी है। हमारी कोशिश ही तय करेगी कि आख़िर में हमारी तक़दीर कैसी लिखी जाए।
अगर हम नेकी की राह चुनते हैं, दूसरों के लिए आसानी पैदा करते हैं और अल्लाह को राज़ी करने की कोशिश करते हैं, तो उम्मीद है कि अल्लाह हमें अच्छे अंजाम तक पहुँचा देगा।
नसीहत
- ज़िन्दगी एक इम्तिहान है और मौत उसकी आख़िरी घंटी। इसीलिए अपने दिल को हर वक़्त साफ़ रखते रहो।
- किसी से नफ़रत मत पालो।
- दूसरों को तकलीफ़ मत दो।
- अपने गुनाहों पर शर्मिन्दा रहो और अल्लाह से रहमत की दुआ करो।
क्योंकि कल जब हमारी किताब-ए-अमल सामने आएगी, तो वहाँ सिर्फ़ हमारे कर्म ही बोलेंगे।
अल्लाह हमें नेक आमाल की तौफ़ीक़ दे, हमारी तक़दीर को बेहतरीन बना दे और हमें उन ख़ुशक़िस्मत लोगों में शामिल कर दे जिनका अंजाम जन्नत में होगा। आमीन।
By Islamic Theology

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