Siraat e mustaqeem | sidha rasta

Siraat e mustaqeem | sidha rasta


सिरात ए मुस्तकीम


اِهۡدِنَا الصِّرَاطَ الۡمُسۡتَقِيۡمَ

"हमें सीधा रास्ता दिखा।" [क़ुरआन 1:5]   


सवाल: क्या हम जानते है ये सिराते मुस्तकीम क्या है?

जवाब: जिसे हम हर नमाज़ की हर रकात में हासिल करने की दुआ मांगते हैं।


ये तो जाहिर है की ये बहुत बड़ी चीज है, जिसे मांगने का हुक्म कायनात के मालिक ने हमे दिया है।  

जैसे हम अपने छोटे बच्चो को आने वाले वक्त की ज़रूरियात बताते हैं, लेकिन उस वक्त उन्हें उस बात की अहमियत का मालूम नही होता तो वो बताने के बाद भी बचकानी हरकते करते हैं। यहां तक वो अपने तजुर्बे से वही बात सीखते है जो बड़े (उम्र व तजुर्बे में) पहले बता चुके हैं क्योंकि बड़े पहले उन हालत से गुजर चुके होते हैं।  

अल्लाह के सामने तो पूरी कायनात है। उसे हर चीज की खबर हैं जो हों चुका, जो हो रहा, जो होने वाला है। रब ए करीम हमारे लिए आसानी फरमाता है ओर सिरात ए मुस्तकीम को आसान करता है। 


صِرَٰطَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ

"उन लोगों का रास्ता जिनपर तूने इनाम किया।" [क़ुरआन 1:6]   

ब्रह्मांड का हाकिम हमे बताता है कि उन लोगो का रास्ता मांगना जो अपने अच्छे अमल की वजह से हमारे इनाम के हकदार बने! 

इसकी ज्यादा और आसान जानकारी के लिए कुरान, हदीस को देखे किन लोगो पर इनाम, रहम, महरबानी की गई! उन लोगो पर की गई जो हक़ के साथ थे, जिन्होंने हक़ का साथ दिया था, हक़ के खिलाफ लोगो से जद्दोजहद की थी और कर रहे हैं। 

  • नूह अलेहिस्सलाम और उनके साथियों को सिर्फ़ बचाया ही नही बल्कि ज़मीन का हाकिम भी बना दिया। 
  • मूसा अलैहिस्सलाम और उनके साथियों को फिरऔन के ज़ुल्म से बचाया ही नहीं बल्कि ज़मीन का मुंतजिम भी बनाया। 

आखरी नबी मुहम्मद ﷺ का समय याद करे,

ऐलान ए नूबूवत के बाद बहुत सख्त हालात पेश आए यहाँ तक की मक्का की जमीन तंग कर दी गई। ऐलानिया सोशल और फाइनेंसशियल बायकाट कर दिया गया। ये शख्त आजमाइश मक्का में 10 साल चली। जिसमे मुसलमानो को हर तरह से सताया जाता रहा और इसमें कमी भी नही की जाती। हज़रत अम्मार रज़ी० और उनकी बीवी हजरत सुमय्या रज़ी० को ज़ालिमाना तरीके से शहीद कर दिया गया। हजरत बिलाल रज़ी० हजरत खब्बाब रज़ी० ओर सहाबी ए रसूल को अजियते दी गई यहां तक आप ﷺ के जान लेने के दर तक पहुंच गए।  

आखिर अल्लाह के हुक्म पर आप ﷺ मुसलमानों सहित हिजरत करके मदीना तशरीफ़ ले आएं। ज़ालिम फसादी लोगो ने वहा परेशान करने में कमी नहीं की यहां तक कि सहाबा रजी० कह उठे, "अल्लाह की मदद कब आएगी।"  

इस खतरनाक सख़्त मुश्किल इम्तेहान (आजमाइश) के बाद अल्लाह ने करम फरमाया। यहां तक उनको जमीनों का ख़लीफ़ा (मुंतजिम) बना दिया। जो कभी कमज़ोर थे वो मुल्क के हाकिम बना दिए गए। 


غَیۡرِ الۡمَغۡضُوۡبِ عَلَیۡہِمۡ وَ لَا الضَّآلِّیۡنَ

"जो मातूब [प्रकोप और ग़ज़ब का शिकार] नहीं हुए, जो भटके हुए नहीं हैं।" [क़ुरआन 1:7]   

यहां पर 2 तरह के लोगो का जिक्र है यानी मातूब और भटके हुए। 

1. मातूब से मुराद यहूदी है, जो अल्लाह के गज़ब का शिकार है खुदा के गज़ब में घिरे हुए लोगों का बचना मुश्किल है यहां तक कि वो तौबा कर ले। (अभी वक्ति तौर पर अल्लाह ने उन्हें छूट दी है ताकि वो सब एक जगह जमा हो जाए जैसे पहले हो चुका हैं।)

2. भटके हुए लोगो से मुराद ईसाई है, जिन्होंने अपने बड़ों के चक्कर में हज़रत ईसा अलेहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा बना लिया है। भटके हुए का वापस आना आसान है।  

नोट:

यानी इनाम पानेवालों से हमारी मुराद वो लोग नहीं हैं जो देखने में जो आरज़ी (वक़्ती) तौर पर अल्लाह की दुनियावी नेमतों से मालामाल तो होते हैं, मगर असल में वो अल्लाह के ग़ज़ब के हक़दार हुआ करते हैं और अपनी कामयाबी और ख़ुशनसीबी की राह भूले हुए होते हैं। 

इस सल्बी तशरीह (नकरात्मक व्याख्या) से ये बात ख़ुद खुल जाती है कि इनाम से हमारी मुराद हक़ीक़ी और हमेशा रहनेवाले इनाम हैं न कि वो वक़्ती और नुमाइशी इनाम जो पहले भी फ़िरऔनों, नमरूदों और क़ारूनों को मिलते रहे हैं और आज भी हमारी आँखों के सामने बड़े-बड़े ज़ालिमों, बदकिरदारों और गुमराहों को मिले हुए हैं।

"सिराते मुस्तकीम पर चलना बहुत मुश्किल है नामुमकिन नहीं है, लेकिन हमेशा की कामयाबी है।" 


आपकी दीनी बहन 
राही हयात

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