जन्नती औरतों की सरदार (क़िस्त 4-1)
3. फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा बिन्ते मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जिगर का टुकड़ा, उम्मुल मोमेनीन ख़दीजा ताहिरा रज़ि अल्लाहु अन्हा के दिल की धड़कन, ज़ैनब, रुक़य्या, और उम्मे कुलसूम रज़ि अल्लाहु अन्हुन्ना की दुलारी फ़ातिमा ज़हरा रज़ि अल्लाहु अन्हा का जन्म उस समय हुआ जब नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पैग़म्बरी के पद पर आसीन हो गये थे। चालीस वर्ष की उम्र में अल्लाह तआला ने इस मानव जाति का मार्गदर्शन करने के लिए उन्हें चुना और अगले ही वर्ष उनके घर में फ़ातिमा ज़हरा रज़ि अल्लाहु अन्हा का जन्म हुआ, यानी फ़ातिमा ज़हरा ने इस्लाम और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चरणों में आँखें खोलीं और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपना आदर्श मानकर उनकी हर इच्छा और आज्ञा पर अमल किया।
फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने जब ज़रा होश संभाला तो देखा कि उनके पिता तो लोगों को एक अल्लाह की तरफ़ बुलाते हैं और लोग उनकी बातें सुनने और मानने के बजाए तरह तरह से दुख और नित नई तकलीफ़ पहुँचताते हैं चुनांचे एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बैतुल्लाह में इबादत कर रहे थे और क़ुरैश के बड़े बड़े सरदारों का एक समूह बैठा गप शप कर रहा था उन्होंने एक प्लान बनाया, अबु जहल बोला, क्या तुम इस दिखावा करने वाले को नहीं देखते? कोई है जो फ़ुलाँ क़बीले के ज़बह किये हुए ऊँट का गोबर, ख़ून और ओझड़ी उठा लाए और जब यह सजदे में जाये तो यह गंदगी उसके ऊपर डाल दे। चुनांचे उन में से सबसे बद-बख़्त व्यक्ति उक़बा बिन मुईत उठा और जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सजदे में गए तो उसने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की गर्दन और पीठ पर ये गन्दगियाँ डाल दीं। उसके वज़न में भारी होने के कारण नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सजदे से सिर नहीं उठा पा रहे थे। मुशरेकीन ये देख कर मज़ाक़ उड़ा रहे थे और मारे हँसी के एक-दूसरे पर लौट पोट होने लगे। अब्दुल्लाह इब्ने-मसऊद रज़ि अल्लाहु अन्हु फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के पास सूचना देने के लिए आए जो अभी बच्चे ही थे। वह दौड़ती हुई आईं तो देखा कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अब तक सजदा की ही हालत में पड़े थे फिर फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा उन गन्दगियों को आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ऊपर से बड़ी मुश्किल से हटाया और मुशरेकीन को बुरा भला कहा।
[सही बुख़ारी 240, 520, 2934, 3037, 3185, 3854/ सही मुस्लिम 4649, सुनन निसाई 308 /मुसनद अहमद 10521/अस सिलसिला अस सहीहा 2840]
फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने भी नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के परिवार के साथ मदीना हिजरत की उस समय उनकी आयु लगभग बारह वर्ष थी। "उनसे निकाह के लिए अबु बकर और उमर रज़ि अल्लाहु अन्हुमा ने पैग़ाम भेजा तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया वह छोटी है फिर अली ने पैग़ाम दिया तो आप ने उनके साथ निकाह कर दिया।" [सुनन निसाई 3223]
अल्लामा नासिरुद्दीन अल्बानी रहमतुल्लाह अलैहि ने इमाम तबरानी के हवाले से एक हदीस नक़ल किया है, अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा से निकाह का पैग़ाम भेजा तो आप ने फ़रमाया, "वह तुम्हारे लिए है अगर तुम उससे अच्छा सुलूक करो।" [अस सिलसिला अस सहीहा 2010/ अल मुअजम अल कबीर तबरानी 3489]
फ़ातिमा रज़ि का निकाह रजब के महीने में हुआ लेकिन रुख़्सती नहीं हुई। इसके दो कारण थे, एक तो जंगे बद्र के आसार सिर पर मंडला रहे थे यह मुसलमानों के लिए पहली जंग थी, दूसरे उस समय तक अली रज़ि अल्लाहु अन्हु नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ ही रहते थे उनका अपना कोई निजी मकान नहीं था लेकिन अब शादी के बाद एक मकान की ज़रूरत थी चुनांचे जंगे बद्र के बाद जब रुख़्सती का मामला सामने आया तो एक सहाबी हारिसा बिन नोमान ने अपना एक मकान दिया और इस प्रकार ज़िलहिज्जा के महीने में रुख़्सती हुई।
फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा निकाह बहुत ही सादगी से मस्जिद में हुआ, कोई बाजा गाजा न था, कोई गजरा और हार भी न था, न रंगा रंग पोशाक थी न कंगन था और न लाल जोड़ा था यही हाल उधर अली रज़ि अल्लाहु अन्हु का भी था न कोई पगड़ी थी और न शेरवानी और खुशनुमा जूते थे बल्कि वही कपड़ा था जो आम दिनों में पहनते थे। वलीमा और महर के लिए भी पैसे पास न थे जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वालीमे को अनिवार्य बताया जैसा कि हदीस में आया है,
जब अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा से निकाह का पैग़ाम दिया तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया "शादी के बाद वलीमा ज़रूरी है।" [मुसनद अहमद 7031]
अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने अपने वालीमे का इंतेज़ाम किया हुआ था लेकिन एक हादसा पेश आया जिसके कारण वलीमा करने के लायक़ नही रहे थे। हदीस में वह हादसा यूं बयान हुआ है,
"अली रज़ि अल्लाहु अन्हु को जंगे बद्र के माले ग़नीमत में एक ऊंट मिला था और एक ऊंट नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें ख़ुम्स (माले ग़नीमत का पांचवां भाग) में से दिया था। इन दोनों ऊंटों को उन्होंने इसलिए रख छोड़ा था कि वह फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा की रुख़्सती पर वलीमा करेंगे उस समय तक शराब हराम नहीं हुई थी, चुनांचे एक गाने वाली गाना सुना रही थी जब उसने पढ़ा أَلَا يَا حَمْزُ لِلشُّرُفِ النِّوَاءِ
"ऐ हमज़ा उठो जवान उंटनियों की तरफ़ बढ़ो" तो हमज़ा रज़ि अल्लाहु अन्हु जोश में उठे, तलवार लहराई और उन उंटनियों के कोहान चीर डाले, पेट फाड़ दिए, और कलेजी निकाल दी। यह देखकर अली रज़ि अल्लाहु अन्हु को बहुत दुख हुआ उन्होंने ज़ैद बिन हारिसा रज़ि अल्लाहु अन्हु को साथ लिया और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से शिकायत की। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम यह सुनकर उठे उन दोनों को साथ लिया और वहां पहुंचे और नागवारी ज़ाहिर की। हमज़ा रज़ि अल्लाहु अन्हु ने नज़र उठाई और कहा तुम सब मेरे बाप दादा के ग़ुलाम हो। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब ऐसा देखा तो वापस पलट आये। [सहीह बुख़ारी 2375, 3099, 4003/ मुसनद अहमद 7555, 10724]
इसके बावजूद जब रुख़्सती का समय आया तो आप ने पूछा, "अली तुम्हारे पास कुछ है? अली ने जवाब दिया, "या रसूलुल्लाह मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।" फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा, "बद्र के मैदान में जो ज़िरह तुम्हारे हाथ आई थी वह कहां है? अली रज़ि अल्लाहु अन्हुने कहा, "वह तो मेरे पास है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसे बेचने का आदेश दिया।" चुनांचे वह ज़िरह चार सौ अस्सी दिरहम और सीरतुन्नबी के लेखक अल्लामा शिबली नोमानी के शब्दों में उस से भी कम क़ीमत में बेची गई। कुछ रिसर्चर के अनुसार वह ज़िरह उस्मान रज़ि अल्लाहु अन्हु ने ख़रीदी थी और बाद में अली रज़ि अल्लाहु अन्हु को गिफ़्ट कर दिया था। चुनांचे उन पैसों से महर अदा की अदा किया गया और जो बचा उससे और कुछ सहाबा की मदद से वलीमा का प्रबंध हुआ।
जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वलीमा को ज़रूरी बताया तो सैयदना सअद रज़ि अल्लाहु अन्हु ने कहा, "मैं एक दुंबा दूंगा, एक और सहाबी ने कहा मैं इतनी और इतनी मकई दूंगा।" [मुसनद अहमद 7031]
जब लड़की शौहर के घर जाती है तो अपने साथ मायके से जो भी समान ले जाती है उसे दहेज कहते हैं। आज कल इस मामले में ख़ूब दिखावा होता है और शादी से एक दो दिन पहले एक हाल में तरतीब के साथ तमाम सामान सजाया जाता है और पड़ोस और रिश्तेदारों में बुलावा जाता है कि लोग आएं और दहेज का माल देखें लेकिन फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा की शादी तो सादगी का नमूना थी इसलिए वहां दिखावा की कोई जगह न थी बल्कि वहां तो दिखावे के तमाम काम शिर्क की कैटेगरी में आते थे।
चुनांचे फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा का दहेज एक ऊँनी चादर, एक मुश्क या मशकीज़ा (पानी की छागल), चमड़े का एक तकिया (जिसमें खुजूर के पेड़ की छाल या इज़ख़र घास भरी हुई थी), चमड़े का एक गद्दा (जिसमें पत्ते भरे हुए थे), दो चक्कियां और दो घड़े थे। [सुनन इब्ने माजा 4152/ सुनन निसाई 3386/ मुसनद अहमद 4940 से 4942]
प्रशिद्ध शायर हफ़ीज़ जालंधरी ने शाहनामा ए इस्लाम के दूसरे भाग में फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के दहेज पर अति सुंदर नज़्म लिखी है:
जहेज़ उनको मिला जो कुछ शहंशाहे दो आलम से,
मिला है दर्स हमको सादगी का फ़ख़्र ए आदम से।
मताए दुनियवी जो हिस्सा ए ज़हरा में आई थी,
खुजूरी खुरदरी सी बान की एक चारपाई थी।
मुशक्कत उम्र भर करना जो लिखा था मुकद्दर में,
मिली थीं चक्कियां दो ताकि आटा पीस लें घर में।
घड़े मिट्टी के दो थे और एक चमड़े का गद्दा था,
ना ऐसा ख़ुशनुमा था यह न बदज़ेब व भद्दा था।
भरे थे उसमें रुई की जगह पत्ते खुजूरों के,
यह वह सामां था जिस पर जान व दिल क़ुरबान हूरों के।
वह ज़हरा जिनके घर तसनीम व कौसर की थी अर्ज़ानी,
मिली थी मुश्क उनको ताकि ख़ुद लाया करें पानी।
मिला था फ़क़रो फ़ाक़ा ही मगर असली जहेज़ उनको,
कि बख़्शी थी ख़ुदा ने एक जबीन ए सज्दारेज़ उनको।
चली थी बाप के घर से नबी की लाडली पहने,
हया की चादरें, इफ़्फ़त का जामा, सब्र के गहने।
रिदा ए सब्र भी हासिल थी तौफ़ीक़ ए सख़ावत भी,
कि होना था उसे सरताज ख़ातूनाने जन्नत भी।
उसी की तरबीयत में उसवा था युमनो सआदत का,
उसी की गोद से दरिया उबालना था शहादत का।
वह ग़ैरत जो मुहरे ख़ातिमे हक़ का नगीना थी,
अमीं की लाडली ही उस अमानत की अमीना थी।
अली अल मुर्तज़ा के आज ताज ए हल अता आया,
दुल्हन की शक्ल में एक पैकर ए सिद्क़ व सफ़ा आया।
पिदर के घर से रुख़्सत हो के ज़हरा अपने घर आई,
तवक्कुल के ख़ज़ाने दौलत ए मेहर व वफ़ा लाई।
दुल्हन को कुछ न कुछ तोहफ़ा (gift) ज़रूर देना चाहिए चुनांचे जिस समय अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा की रुख़्सती के संबंध में बात चीत की तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "उसे कुछ दो अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने जवाब दिया मेरे पास तो कुछ नहीं है।" रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा, "वह हुतमी ज़िरह कहाँ है?" अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने कहा, "वह तो मेरे पास है।" आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "वही उसे दे दो।" [सुनन अबु दाऊद 2125, 2126/सुनन निसाई 3377, 3378, मुसनद अहमद 6937, 10722]
नोट:- हुतमी से मुराद या तो हुतम बिन मुहारिबा का क़बीला है जो तलवारें बनाते थे या ऐसी ज़िरह मुराद है जो इतनी मज़बूत होती थी उसपर तलवार पड़ते ही टूट जाती थी।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा को सुबह शाम यह दुआ पढ़ने की नसीहत की
يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ بِرَحْمَتِكَ أَسْتَغِيثُ. وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّه، وَلَا تَكِلْنِي إلى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْن أَبَدًا.
"ऐ ज़िंदा और क़ायम रहने वाले! तेरी रहमत के वास्ते मैं मदद का सवाल करती हूं मुझे सदैव ठीक रख और कभी पलक झपकने के बराबर भी मुझे मेरे नफ़्स के हवाले न कर।" [अस सिलसिला अस सहीहा 2942/ अल मुस्तदरक लिल हाकिम 2000]
फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा की रुख़्सती के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बराबर उनके घर जाते रहते और वह भी आप के यहां आती रहतीं अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि अल्लाहु अन्हुमा का बयान है कि बहुत कम ऐसा होता कि आप घर जाएं और फ़ातिमा के घर न जाएं बल्कि उन्हीं के यहां से शुरू करते। एक बार का वाक़िआ है।
अली बिन अबि तालिब रज़ि अल्लाहु अन्हा के यहां एक मेहमान आया जब खाना तैयार हो गया तो फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने अली रज़ि अल्लाहु अन्हु से कहा क्यों न हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी बुला लें ताकि वो हमारे साथ खाने में शरीक हो जाएं? चुनांचे अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दावत दी। जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आए तो और अपना हाथ दरवाज़े की चौखट पर रखा तो घर में एक तरफ़ एक छपा हुआ बारीक धारीदार पर्दा नज़र आया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वापस लौट गए फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा पीछे-पीछे दौड़ी गईं और एक रिवायत के अनुसार अली रज़ि अल्लाहु अन्हु को भेजा और लौटने के कारण पूछा तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "मेरे या किसी नबी के लिए मुनासिब नहीं कि वह सजे हुए घर में दाख़िल हो, मेरा भला दुनिया और उसकी रंगरंगी से क्या वास्ता।" इब्ने अब्बास का बयान है कि वह पर्दा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आदेशानुसार फ़ातिमा ने किसी और भेजवा दिया।
[सही बुख़ारी 2613/ सुनन अबु दाऊद 4149, 4150/सुनन इब्ने माजा 3360/ मुसनद अहमद 8079, 8081/ मिश्कातुल मसाबीह 3221]
फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के गले में एक सोने की चैन थी वह एक औरत को दिखा रही थीं और यह कह रही थीं कि देखो यह सोने की चैन है यह अबु हसन (अली रज़ि अल्लाहु अन्हु) ने मुझे गिफ़्ट दिया है उसी समय रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आ गए और देखते ही पूछा, फातिमा तुम्हें क्या यह पसंद है कि लोग कहें कि तुम्हारे हाथ में आग की एक ज़ंजीर है, यह कह कर आप बैठे नहीं, बाहर निकल आए। फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने उस चैन को बेचकर एक ग़ुलाम ख़रीदा और उसे आज़ाद कर दिया। जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक यह सूचना पहुंची तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "अल्लाह का शुक्र है जिसने फ़ातिमा को आग से बचा लिया।" [सुनन निसाई 5143/ मुसनद अहमद 7993/ अस सिलिसिला अस सहीहा 3083]
इन शा अल्लाह अगली क़िस्त में आगे की बातें जानेंगे।
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
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