Jannati aurton ki sardar kon-kon hain? (part 4-2)

Jannati aurton ki sardar kon-kon hain? (part-4)


जन्नती औरतों की सरदार (क़िस्त 4-2)


3. फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा बिन्ते मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा सूरत से शक्ल तक नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूरी तरह मिलती थीं पिता को अपनी बेटी से और बेटी को अपने पिता से जितना लगाव था हर मुसलमान बल्कि तमाम व्यक्तियों के लिए एक मार्गदर्शन है जिस युग मे लोग बेटियों को इतना बुरा समझते थे कि उन्हें पैदा होते ही ज़िंदा दफ़न कर देते थे ऐसे समाज को नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आदर्श दिया कि बेटी के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?

आयेशा रज़ि अल्लाहु अन्हा का बयान है कि, "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत, सूरत और बात चीत में फातिमा से ज़्यादा किसी को मुशाबह नहीं देखा जब वह आतीं तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनका स्वागत करते, उनका हाथ पकड़ते, उनकी पेशानी पर बोसा देते, और उन्हें अपनी जगह बिठाते और जब आप उनके यहां तशरीफ़ ले जाते तो वह भी आप का हाथ पकड़तीं, बोसा देतीं और अपनी जगह बिठातीं।" [सुनन अबु दाऊद 5217 हदीस हसन/ जामे तिर्मिज़ी 3772/ अल मुस्तदरक लिल हाकिम 4732/ मिशकातुल मसाबीह 4689]


अनस बिन मालिक ने बयान किया कि, "लोगों में सैयदना हसन बिन अली और सैयदा फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हुमा से बढ़ कर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जैसा नहीं था।" [मुसनद अहमद 11370]

इमाम हसन रज़ि अल्लाहु अन्हु रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुशाबह नहीं थे बल्कि इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु की शक्ल व सूरत में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बिल्कुल कॉपी थे जैसा कि ख़ुद अनस रज़ि अल्लाहु दनहु से एक रिवायत है, 

जब हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु का सिर मुबारक उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद के पास लाया गया और एक थाल में रख दिया गया तो वह बद-बख़्त उस पर लकड़ी से मारने लगा और आप के ख़ूबसूरती के बारे में भी कुछ (अपशब्द) कहा इस पर अनस रज़ि अल्लाहु अन्हु बोल पड़े,

 كَانَ أَشْبَهَهُمْ بِرَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ

"रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु सबसे ज़्यादा मुशाबेह थे।" [सही बुख़ारी 3748/मुसनद अहमद 12422]


फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के निकाह के नौ या दस महीने बाद उहद की लड़ाई हुई जिसके लिए मदीने में एक मीटिंग हुई और मशविरा में यह तय पाया कि मदीने से बाहर निकल कर जंग लड़ी जाय चुनांचे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक हज़ार का लश्कर लेकर उहद पहाड़ की तरफ़ आए (रास्ते में मुनाफ़िक़ों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई तीन सौ लोगों को लेकर अलग हो गया और मुसलमानों के लश्कर की संख्या केवल सात सौ रह गई), लड़ाई में पहले मुसलमानों का पल्ला भारी था अचानक ख़ालिद बिन वलीद की एक जंगी तदबीर से जंग का पांसा पलट गया और जीती हुई जंग हार में बदल गई, सत्तर सहाबा शहीद हुए। ख़ुद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को काफ़ी चोट आई, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आगे के दो दांत शहीद हो गए , ख़ौद आप के सिर पर टूट गई और ख़ौद की कड़ियाँ गाल में चुभ जाने के कारण आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सख़्त ज़ख़्मी हो गए इसकी सूचना जैसे ही फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा को मिली तो वह फ़ौरन मदीने से निकलीं और उहद के मैदान में पहुंचीं और पहुंचते ही नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़ख़्मों को धोया, अली रज़ि अल्लाहु अन्हु अपनी ढाल में पानी लाते थे और फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ख़ून साफ़ करती थीं लेकिन ख़ून बंद नहीं हो रहा था, आख़िर में जब ख़ून नहीं रुका तो चटाई या बोरिया जलाया गया और फिर उसकी राख भरी गई तब कहीं जाकर ख़ून का बहना बंद हुआ।

[सही बुख़ारी 243, 2903, 2911, 4075, 5248, 5722/ सही मुस्लिम 4642/ जामे तिर्मिज़ी 2085/ सुनन इब्ने माजा 3464, 3465/ मुसनद अहमद 6948, 7695]


फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के निकाह के बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचा अब्बास रज़ि अल्लाहु अन्हु की बीवी उम्मे फ़ज़ल रज़ि अल्लाहु अन्हा ने एक ख़्वाब देखा कि "नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जिस्म का एक टुकड़ा उनके कमरे में है यह ख़्वाब देखकर आप घबरा गईं और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमके पास पहुंच कर ख़्वाब बयान किया नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया अगर अल्लाह ने चाहा तो फ़ातिमा के यहां बच्चा जन्म लेगा और तुम उसे पालोगी चुनांचे फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने वास्तव में सैयदा हसन को जन्म दिया और उनको उम्मे फ़ज़ल के हवाले कर दिया। उम्मे फ़ज़ल ने अपने बेटे क़सम के साथ दूध पिलाया" [मुसनद अहमद 442, 443, 11998]


हसन रज़ि अल्लाहु अन्हु की पैदाइश पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बकरी का अक़ीक़ा किया और आदेश दिया, "फ़ातिमा इसका का सिर मूंड दो और उसके बाल के बराबर चांदी सदक़ा करो" फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने उनके बाल को वज़न किया तो उसका वजन चांदी के एक दिरहम के बराबर या उससे कम था।" [जामे तिर्मिज़ी 1519]


फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा घर का तमाम काम ख़ुद करती थीं पानी भरकर लाना, चक्की पीसना, खाना पकाना और घर के सभी काम करती थीं। चक्की पीसने के कारण उनके हाथों में छाले पड़ गए थे, बहुत तकलीफ़ महसूस हो रही थी उन्हें पता चला कि कुछ ग़ुलाम नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आये हैं लेकिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम घर पर नहीं थे तो उन्होंने उम्मुल मोमेनीन आयेशा सिद्दीक़ा रज़ि अल्लाहु अन्हा से अपने आने का उद्देश्य बयान किया। जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम घर आये तो आयेशा सिद्दीक़ा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने सूचना दी। यह सुनते ही नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसी समय अली रज़ि अल्लाहु अन्हु के घर गए तमाम लोग बिस्तर पर लेट चुके थे आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया अगर अल्लाह तुम्हारे लिए कोई चीज़ अता करेगा तो वह तुम तक ज़रूर पहुंचेगी और जिस चीज़ का तुमने सवाल किया क्या मैं उससे बेहतर चीज़ बताऊं "जब तुम अपने बिस्तर पर जाओ तो 33 बार सुब्हानल्लाह, 33 बार अल्हम्दुलिल्लाह और 34 बार अल्लाहु अकबर पढ़ लिया करो यह तुम्हारे लिए ख़ादिम मिल जाने से बेहतर है।"

[सही बुख़ारी 350 3705, 5361, 5362, 6318/ सही मुस्लिम 6891, 6915, 6916, 6918/ सुनन अबु दाऊद 2987, 5062, 5065/ जामे तिर्मिज़ी 3408, 3409/ मुसनद अहमद 1879, 5543, 5545/ मिश्कातुल मसाबीह 2387, 2388]


और यह दुआ भी पढ़ने की वसीयत की, 

اللَّهُمَّ رَبَّ السَّمَوَاتِ السَّبْعِ وَرَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ رَبَّنَا وَرَبَّ كُلِّ شَيْءٍ مُنْزِلَ التَّوْرَاةِ وَالْإِنْجِيلِ وَالْقُرْآنِ فَالِقَ الْحَبِّ وَالنَّوَى أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ كُلِّ شَيْءٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهِ أَنْتَ الْأَوَّلُ فَلَيْسَ قَبْلَكَ شَيْءٌ وَأَنْتَ الْآخِرُ فَلَيْسَ بَعْدَكَ شَيْءٌ وَأَنْتَ الظَّاهِرُ فَلَيْسَ فَوْقَكَ شَيْءٌ وَأَنْتَ الْبَاطِنُ فَلَيْسَ دُونَكَ شَيْءٌ اقْضِ عَنِّي الدَّيْنَ وَأَغْنِنِي مِنْ الْفَقْرِ

ऐ अल्लाह! सातों आसमानों के रब, अर्शे-अज़ीम के रब, हमारे रब! और हर चीज़ के रब, तौरात, इंजील और क़ुरआन के नाज़िल करनेववाले, ज़मीन फाड़कर दाने उगाने और निकालने वाले, मुझे आपकी पनाह चाहिए हर चीज़ के शर से जिसकी पेशानी आपके हाथ में है। आप पहले हैं (शुरू से है), आपसे पहले कोई चीज़ नहीं है। आप सबसे आख़िर है, आपके बाद कोई चीज़ नहीं। आप सबसे ज़ाहिर (यानी ऊपर है), आपके ऊपर कोई चीज़ नहीं है। आप छिपे हुए हैं सबकी नज़रों से, लेकिन आपसे कोई चीज़ छिपी हुई नहीं है। "ऐ अल्लाह! आप मेरे ऊपर से क़र्ज़ और मुझे मोहताजी से निकालकर मालदार कर दें।" [सही मुस्लिम 6891/ जामे तिर्मिज़ी 3481/ सुनन इब्ने मजा 3831]


इस तस्बीह के हवाले से एक रिवायत यूँ भी बयान हुई है:

कुछ ग़रीब लोग नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और (मुसनद अहमद की रिवायत के अनुसार अबु ज़र ग़िफ़ारी ने) कहा कि अमीर और रईस लोग बुलन्द दरजात और हमेशा रहने वाली जन्नत हासिल कर चुके, हालाँकि जिस तरह हम नमाज़ पढ़ते हैं वह भी पढ़ते हैं और जैसे हम रोज़े रखते हैं वह भी रखते हैं, लेकिन माल और दौलत की वजह से उन्हें हम पर प्राथमिकता हासिल है कि उसके कारण वह हज्ज करते हैं, उमरा करते हैं, जिहाद करते हैं और सदक़े देते हैं और हम मोहताजी की वजह से उन कामों को नहीं कर पाते। इस पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "लो मैं तुम्हें एक ऐसा अमल बताता हूँ कि अगर तुम उसकी पाबन्दी करोगे, तो जो लोग तुमसे आगे बढ़ चुके हैं उन्हें तुम पा लोगे और तुम्हारे मर्तबे तक फिर कोई नहीं पहुँच सकता और तुम सबसे अच्छे हो जाओगे, सिवाए उनके जो यही अमल शुरू कर दें, हर नमाज़ के बाद तैंतीस मर्तबा तस्बीह वसुब्हानल्लाह (سُبْحَانَ اللَّهِ), तैंतीस मर्तबा तहमीद अल्हम्दुलिल्लाह (أَلْحَمْدُلِلَّهِ) और चौंतीस मर्तबा तकबीर अल्लाहु अकबर (أَللَّهُ أَكْبَرُ) कहा करो।" [सही बुख़ारी 843, 6329/ सुनन इब्ने माजा 927/ मुसनद अहमद 1862, 1867, 11905]


हदीस में यह तस्बीहात पढ़ने का सामान्य आदेश भी है कि हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद तैंतीस बार सुब्हानल्लाह, तैंतीस बार अल्हम्दुलिल्लाह और चौंतीस बार अल्लाहु अकबर पढ़ने वाला महरूम और नामुराद नहीं रहेगा। [सही मुस्लिम 1349, 1350/ जामे तिर्मिज़ी 3412/ सुनन निसाई 1350, अस सिलसिला अस सहीहा 2781/मिशकातुल मसाबीह 966]


फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा की सबसे बड़ी बहन ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा थी उनका निकाह उम्मुल मोमेनीन ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद रज़ि अल्लाहु अन्हा के भांजे अबुल आस बिन रबीअ से हुआ था, ज़ैनब का इन्तेक़ाल 8 हिजरी में हुआ। दूसरी बहन रूक़य्या रज़ि अल्लाहु अन्हा की मृत्यु 2 हिजरी में हुई जब ज़ैद रज़ि अल्लाहु अन्हु बद्र के जीत की ख़ुशख़बरी लेकर मदीना पहुंचे उस समय उनकी तदफ़ीन हो रही थी इसीलिए उनके पति उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ि अल्लाहु अन्हु जंगे बद्र में शामिल न हो सके थे। तीसरी बहन उम्मे कुलसूम रज़ि अल्लाहु अन्हा का निकाह रुक़य्या रज़ि अल्लाहु अन्हा के इन्तेक़ाल के बाद उस्मान रज़ि अल्लाहु अन्हु से हुआ था उनकी की मृत्यु 9 हिजरी में हुई और अब फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा अकेली रह गई थीं।


10 हिजरी में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपना पहला और आख़िरी हज्ज किया यह हज्ज "हज्जतुल विदाअ" के नाम से प्रसिद्ध है। इस मुबारक मौक़ा पर फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ थीं। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आदेश दिया कि जो क़ुरबानी का जानवर साथ नहीं लाया हो वह हज्ज के एहराम को उमरे के एहराम में बदल ले, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना मुनव्वरा से और अली रज़ि अल्लाहु अन्हु यमन से अपनी क़ुरबानी का जानवर साथ लाए थे उन्होंने आकर देखा कि फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा रंगदार कपड़े पहने हुए थीं और सुरमा लगा रखा था। 

अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने बयान किया कि मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास इस विषय में पूछने गया। और कहा, ऐ अल्लाह के रसूल! फ़ातिमा ने रंगदार कपड़े पहने रखे हैं और सुरमा भी लगा रखा है वह पूछने पर बोल रही हैं, कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे उन कामों का हुक्म दिया है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: "उसने सच कहा उसने सच कहा, हां उसने सच कहा है, मैंने ही उसे हुक्म दिया है।" [सही मुस्लिम 2950/ सुनन निसाई 2713/ सुनन अबु दाऊद 1905/ सुनन इब्ने माजा 3074]


रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब बीमार पड़े और फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने उन्हें मौत की सख़्त तकलीफ़ में देखा तो कहने लगीं, हाय अब्बा जान इतनी तकलीफ़! यह सुनकर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "बेटी तुम्हारे बाप पर ऐसा वक़्त आ गया है कि अल्लाह तआला उससे किसी को भी छोड़ने वाला नहीं है क्योंकि वह क़यामत के दिन पूरा पूरा बदला देगा।" [मुसनद अहमद 3021/ अस सिलसिला सहीहा 3328]


एक जगह और बयान हुआ है कि,

बीमारी की शिद्दत से जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेचैनी बहुत बढ़ गई तो फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा की ज़ुबान से निकला आह! आज अब्बा जान कितने बेचैन हैं? यह सुनकर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "आज के बाद तुम्हारे अब्बा जान की बेचैनी नहीं रहेगी।" 

फिर जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफ़ात हो गई तो फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने रोते हुए कहा, 

"आप अपने रब के कितने क़रीब हो गए हैं ऐ अब्बा जान! मैं जिब्रील को आप की मौत की ख़बर देती हूं, ऐ अब्बा जान! जन्नतुल फ़िरदौस आप का ठिकाना है।" [सही बुख़ारी 4462/मुसनद अहमद 3078, 11038]


फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने इन्तेहाई कमज़ोर आर्थिक स्थिति में जीवन व्यतीत किया लेकिन इसकी कभी शिकायत नहीं की वह पर्दे की सख़्त पाबंद थीं लेकिन कभी कभी एक ही चादर होती थी अनस रज़ि अल्लाहु अन्हु का बयान है कि, 

'नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के यहां एक ग़ुलाम लेकर आए जो आपने उन्हें हिबा किया था तो फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ऐसा कपड़ा ओढ़े हुए थीं कि अगर सिर ढाँपती थीं तो पैर खुल जाता था और अगर पैर छुपातीं थीं तो सिर तक न पहुंचता था जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनकी यह परेशानी देखी तो फ़रमाया, "कोई हर्ज नहीं, तुम्हारे वालिद और तुम्हारे ग़ुलाम ही तो हैं।" [सुनन अबु दाऊद 4106/ अस सिलसिला अस सहीहा 96]


एक बार फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा किसी की मय्यत पर उसकी ताज़ियत के लिए उसके घर गईं जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़ब्रिस्तान से लौट कर मय्यत के घर आ रहे थे तो फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा मय्यत के घर के घर से निकल रही थीं कि वहीं मुलाक़ात हो गई। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें क़ब्रिस्तान जाने से सख़्ती के साथ मना किया और चेतावनी भी दी,

अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन अल-आस रज़ि अल्लाहु अन्हुमा का बयान है कि हमने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ थे जब एक मय्यत के दफ़न करके फ़ारिग़ हुए तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम वापस लौटे। हम भी उनके साथ वापस आये। जब आप उसके दरवाज़े के सामने आए तो आप रुक गए हमने देखा एक औरत आ रही है जब वह जाने लगी तो पता चला कि वह फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा हैं। 

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा, फ़ातिमा! तुम अपने घर से क्यों निकली हो? 

उन्होंने उत्तर दिया, मैं तो मय्यत के लिए दुआ और उसके घर वालों को तसल्ली देने के वास्ते आई थी। 

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा और तुम उनके साथ कुदा (क़ब्रिस्तान) भी गई थी? 

उन्होंने जवाब दिया, अल्लाह की पनाह! ऐसा कैसे संभव है जबकि मैंने आप को बहुत सख़्त अल्फ़ाज़ में फ़रमाते हुए सुना है। 

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, 

لَوْ بَلَغْتِهَا مَعَهُمْ مَا رَأَيْتِ الْجَنَّةَ حَتَّى يَرَاهَا جَدُّ أَبِيكِ

"अगर तुम उनके साथ कुदा (क़ब्रिस्तान) जाती तो जन्नत में दाख़िल होना तो दूर की बात है देख भी न पाती भले ही तेरे बाप के दादा (अब्दुल मुत्तलिब) इसे देख लेते।" [सुनन अबु दाऊद 3123/ सुनन निसाई 1881/ अल मुस्तदरक लिल हाकिम 1382]


नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफ़ात के 6 महीने बाद फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा का देहांत हुआ फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा को अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने ग़ुस्ल दिया और उनके साथ अस्मा बिन्ते उमैस रज़ि अल्लाहु अन्हा भी इसकी दलील यह रिवायत है 


غَسَّلْتُ أَنَا وَعَلِيٌّ فَاطِمَةَ بِنْتَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ

"आसमा बिनते उमैस रजि अल्लाहु अन्हा ने बयान किया कि मैंने और अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेटी फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा को ग़ुस्ल दिया।" [अल मुस्तदरक लिल हाकिम 4769]


फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के दो बेटे हसन और हुसैन थे उन्हें हसनैन भी कहा जाता है हसन रज़ि अल्लाहु अन्हु का इन्तेक़ाल 59 हिजरी में हुआ जबकि हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु की शहादत 61 हिजरी कर्बला के मैदान में हुई। और दो बेटियां उम्मे कुलसूम और ज़ैनब थीं, उम्मे कुलसूम रज़ि अल्लाहु अन्हा का निकाह पहले उमर फ़ारूक़ रज़ि अल्लाहु अन्हु से चालीस हज़ार दिरहम महर के साथ हुआ था उनकी शहादत के बाद औन बिन जाफ़र रज़ि अल्लाहु अन्हु से हुआ। दूसरी बेटी ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा का निकाह उनके चाचा के बेटे अब्दुल्लाह बिन जाफ़र रज़ि अल्लाहु अन्हु से हुआ था।


फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा से मरवी अहादीस,

सैयदना अली रज़ि अल्लाहु अन्हु एक सफ़र से वापस आए तो सैयदना फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने उन्हें क़ुर्बानी का गोश्त पेश किया यह देखकर अली रज़ि अल्लाहु अन्हु ने पूछा क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इससे मना नहीं किया था? फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने जवाब दिया उन्होंने पहले मना किया था लेकिन फिर इजाज़त दे दी थी। अली रज़ि अल्लाहु अन्हु को इत्मीनान नहीं हुआ आपने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास जाकर सवाल किया तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया "तुम उसे एक ज़ुलहिज्जा से दूसरे ज़ुलहिज्जा तक खा सकते हो" [मुसनद अहमद 4709, हसन]


सैयदा फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब मस्जिद में दाख़िल होते तो ख़ुद पर दरूद भेजते और एक रिवायत में है कि कहते, 

بِسْمِ اللّٰہِ وَالسَّلَامُ عَلٰی رَسُوْلِ اللَّہِ 

"अल्लाह के नाम से और अल्लाह के रसूल पर सलामती हो।" 

और फिर यह पढ़ते, 

 اللَّہُمَّ اغْفِرْلِیْ ذُنُوْبِیْ وَافْتَحْ لِیْ اَبْوَابَ رَحْمَتِکَ۔  

"ऐ अल्लाह मेरे गुनाह माफ़ करदे और मेरे लिए अपने रहमत के दरवाज़े खोल दे।" 

और जब बाहर निकलते तो मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर दरूद व सलाम भेजते और एक रिवायत में है,

بِسْمِ اللّٰہِ وَالسَّلَامُ عَلٰی رَسُوْلِ اللَّہِ 

कहते फिर यह दुआ पढ़ते, 

اللَّہُمَّ اغْفِرْلِیْ ذُنُوْبِیْ وَافْتَحْ لِیْ اَبْوَابَ فَضْلِکَ  

"ऐ अल्लाह मेरे गुनाह बख़्श दे और मेरे लिए अपने फ़ज़ल का दरवाज़ा खोल दे।"

[जामे तिर्मिज़ी 314/ मुसनद अहमद 1332]


अबू सालबा ख़ुशनी रज़ि अल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक जंग से वापस आए तो मस्जिद में दाख़िल हुए और उसमें दो रिकअत नफ़्ल अदा की जैसा कि आप पहले भी करते थे उसके बाद आप फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा के घर गए फ़ातिमा रज़ि अल्लाहु अन्हा ने आपका स्वागत किया आपके चेहरे और आंखों को बोसा दिया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे पूछा फ़ातिमा तुम्हें क्या हुआ? 

उन्होंने जवाब दिया, "मैं देख रही हूं कि आपकी रंगत बदलती जा रही है।" 

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, "ऐ फ़ातिमा! अल्लाह तआला ने तुम्हारे वालिद को ऐसी चीज़ देकर भेजा है जो हर कच्चे पक्के मकान और घास फूस की झोपड़ी तक पहुंच कर रहेगा जो इसे अपनायेगा अल्लाह तआला उसे इज़्ज़त और जो इनकार करेगा उसे ज़िल्लत देगा यहां तक कि यह दीन वहां तक पहुंच जाए जहां रात पहुंचती है।" [मुस्तदरक लिल हाकिम 1797]


इन शा अल्लाह अगली क़िस्त में आगे की बातें जानेंगे। 


आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही

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