Shab-e-Mi'raj (Lailat al-Miʿraj) | 27 Rajab | Isra wal-Miʿraj

Shab-e-Mi'raj (Lailat al-Miʿraj) | 27 Rajab | Isra wal-Miʿraj


मिराज की रात (27 रजब) की फ़ज़ीलत और इबादतों की हक़ीक़त


Table Of Content

बिदअत को अच्छा और सुन्नतो को नया काम समझने की वजह
         1. दुनिया परस्त आलिम, मौलवी, मुफ़्ती
इसरा और मेराज क्या है?
मेराज कब हुई?
रजब के मुताल्लिक बयान की जाने वाली हदीसें


आपने बहुत उलेमा ऐ हक़ की तकारीर सुनी होंगी आर्टिकल भी इस मोज़ू पे पढ़े होंगे अल्हम्दुलिल्लाह हमने इस्तफादा भी हासिल किया है लेकिन क्या वजह है कि हम इतना सब कुछ पढ़ने के बाद भी इन चीजों को अपनी नजरों से ओझल कर देते हैं। 


बिदअत को अच्छा और सुन्नतो को नया काम समझने की वजह

आज की उम्मत ऐ मुहम्मदिया की बात करें तो हाल ये है की लोग बिदअत को अच्छा और सुन्नतो को नया काम बताने लगे। 

अभी कुछ दिनों क़बल, मैं रफा यदेन कर रहा था मेरे रिश्तेदार ने ये देख कर कहा मुहम्मद ये क्या नया तरीक़ा तुमने अपनाया नमाज़ को बदल दिया। (अस्तग़्फ़िरुल्लाह)

यानी जो अमल नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से साबित हो उसको लोग नया काम कह रहे हैं इसकी वजह क्या है?

वजह:

1. दुनिया परस्त आलिम, मौलवी, मुफ़्ती

2. हमारे पुराने बुज़ुर्ग

3. नफ़्स परस्ती लालच


1. दुनिया परस्त आलिम, मौलवी, मुफ़्ती

ये वो आलिम है जिन्होंने उम्मत मे सिर्फ अपने आपको मशहूर करने के लिए वाह-वाही लूटने के लिए हराम की दौलत कमाने के लिए दीन को दाव पर लगा दिया। ये अपनी मजलिसो मे ऐसे वाज़ (स्पीच) देते हैं जो उम्मत को टुकड़े टुकड़े कर देती है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बातो को छोड़ कर अपने बाबो, पीरों, नाम निहाद जोगियो के क़िस्से बयान करते हैं। 

हदीस की बात करें तो झूठी हदीसे बयान करके उम्मत को उन झूठी हदीसो का आदि बना देते हैं ताकि कोई सहीह हदीस और क़ुरान से कुछ ऐसा ना पेश कर दें की हमारे लिए तमाशा बन जाए। 

ये लोग तकरीर मे आपको कहेंगे की क़ुरान हदीस को खुद ना पढ़ना वरना गुमराह हो जाओगे। 

ये आपसे कहेंगे की अपने बुज़ुर्गो का दीन ना छोड़ना वरना गुमराह हो जाओगे

ये सब ये उलेमा ऐ सू (नफ़्स परस्त आलिम) इसलिए करते हैं की कहीं लोग खुद से क़ुरआन-हदीसे समझने लगे तो हमारी रोज़ी रोटी कहाँ से चलेगी?

हमें फिर तकरीर कराने का नज़राना (हदिया/गिफ्ट) कैसे मिलेगा?

और ये फिर हमसे सुवाल करेंगे तो हम कैसे जवाब देंगे क्यूंकि हमने तो हक़ीक़त मे झूठी कहानियां क़िस्से बयान किये थे अब जब इन्हे दीन ऐ मुहम्मदी का असल तरीक़ा पता चल जायेगा तो हमारी दुकाने बंद हो जाएगी

  • ना कोई क़ुरआन खानी के पैसे देगा। 
  • ना कोई तीजा, चालीसवा पे मुर्गे मुसल्लम पे बुलाएगा। 
  • ना कोई दरगाह पे चादर चढ़ाने आएगा। 
  • ना कोई नात खान को बुलाएगा। 
  • ना कोई फातिहा का खाना खाने देगा इत्यादि। 


आइये कुछ हदीसो की तरफ चलते हैं इन उलेमाओ के बारे मे हदीस मे क्या आया है?

मुलाहिज़ा फरमाए:


हदीस 01: रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया :

"मैं अपनी उम्मत पर गुमराह कुन इमामों (हाकिमों) से डरता हूँ।" 
[तिरमिज़ी 2229]


हदीस 02: नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: 

कयामत के दिन जब अल्लाह सुवाल करेगा उसमे से एक आलिम भी होगा जिसने इल्म पढ़ा और पढ़ाया और क़ुरआन की क़िरात की, उसे पेश किया जायेगा (अल्लाह के सामने) अल्लाह उसे अपनी नेमतो की पहचान कराएगा वो फरमायेगा तूने इनकी नेमतो के साथ क्या किया?
वो कहेगा: मैंने इल्म पढ़ा और पढ़ाया और तेरी खातिर क़ुरआन की क़िरात की,
अल्लाह फरमायेगा: तूने झूठ बोला तूने इसलिए इल्म हासिल किया की कहा जाये (ये) आलिम है और तूने क़ुरआन इसलिए पढ़ा की कहा जाये ये क़ारी है फिर इसके बारे मे हुक्म दिया जायेगा उसे मुंह के बल घसीटा जाए हत्ता के आग में डाल दिया जाएगा। 
[सहीह मुस्लिम 1905]


हदीस 03: हजरत अनस बिन मालिक रजि अल्लाहहू अन्हो से रिवायत है :-

मेराज की रात नबी सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम का गुजर ऐसे लोगों के पास से हुआ जिनकी बांन्छे आग की कैंची से काटी जा रही थी।  
जिब्राइल अलैहिस्सलाम से पूछा: यह कौन लोग हैं? 
जिब्राइल ने कहा: आपकी उम्मत के खतीब हैं जो नेकी का हुक्म देते लेकिन खुद भूल जाते हालांकि यह किताबउल्लाह पढ़ते थे क्या यह अक़्ल नहीं रखते थे?
[मुसनद अबी याला 3992]

तो इन आलिमो का आपने हाल देख लिया यह वह आलिम है जिन्होंने दींन के साथ खिलवाड़ किया और उम्मत को गुमराह किया और आज उम्मत का अक्सर हिस्सा इन्ही मौलवियों के पीछे चल रहा है। 


किसी शख्स ने क्या खूब कहा है की एक चोरी करने वाला भी जानता है मैं चोरी कर रहा हूं यह गुनाह है, एक ज़िना करने वाला भी जानता है यह गुनाह है और वो तोबा करने की सोचता भी है लेकिन जो बिदात करते हैं उनको तौबा नसीब नहीं क्योंकि आलिमों ने उम्मत को बताया ही इस तरह है की बिदअत सवाब का काम है। यानी उनको एहसास ही नहीं होता बिदअत बुरा काम इसलिए तौबा की सोचते भी नहीं जबकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वाज़ेह हदीस है। फ़रमाया:

"जिसमे मेरे दीन मे कोई ऐसी चीज दाखिल की जो उसमे मौजूद नहीं थी वो अमल मरदूद है।" [बुखारी 2697]

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: 

"हर बिदअत गुमराही है और गुमराही जहन्नम तक ले जाएगी।" [मुस्लिम 2005]

इन हदीसों से यह बात पता चली की उम्मत में बिदात किस तरह से फेली है और इसी बात से मुझे एक हदीस याद आ गयी जिसमे नबी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:

"मेरी उम्मत मे बिदअत इस तरह फैलेगी की जैसे एक पागल कुत्ता काट ले उसका ज़हर जिस्म के हर हिस्से मे होता है उसी तरह मेरी उम्मत मे बिदअत फैलेगी।" [अबू दाऊद 4597]

  • क्या ये पैशगोई पूरी हो रही है या नहीं?
  • क्या उम्मत मे बिदअत कूट-कूट कर भरी है या नहीं?

अल्लाह हम सबको बिदअत से बचाये। 


2. हमारे पुराने बुज़ुर्ग

उम्मत मे गुमराही का चोर दरवाज़ा एक ये भी है की जब हम कोई काम करते हैं जिसकी दलील ना क़ुरआन मे हो ना हदीस मे हो पूछा जाता है दलील क्या है कहते हैं "हमने अपने बड़ो, बुज़ुर्गो को इसी दीन पे पाया था।" 

यानी बिदअत एक ऐसी वायरस है की उसको ना हदीस से मतलब ना क़ुरआन से शैतान ने जाल बनाया है बस किसी तरह से इंसान को बिदअत शिर्क मे मुबतिला कर दू अल्लाह बचाये


3. नफ़्स परस्ती लालच

अत्यधिक जो बिदअत हम करते है हम जानते हैं ये बिदअत है सिर्फ इसलिए इससे नहीं रुकते क्यूंकि कारोबार ही बिदअत से चल रहा है |

उसको बिदअत मे इतना मज़ा आता है वो इसको छोड़ने का नाम नहीं लेता यही वजह है हम नफ़्स को खुदा बनाकर बिदअत जैसे बुत सनामखाने बना चुके हैं अल्लाह हमें बचाये। 

तफसील से हमने जाना बिदअत कितना बड़ा गुनाह है की जहन्नुम तक ले जायेगा अब इस तफसील के बाद चलते हैं "रजब के महीने मे होने वाले कामो की तरफ":


इसरा और मेराज क्या है?

इसरा: अहले सुन्नत वल जमात का इजमा अक़ीदा है की नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मक्का से बैतूल मक़दिस ले जाया गया बुर्राक जैसी सवारी पर, इस सफर को इसरा कहते हैं। 

मेराज: फिर मस्जिद ऐ अक़्सा से आसमानी सफर तय किया गया इस सफर को मेराज कहते हैं | और ये सफर हालत ऐ बेदारी मे हुआ ख्वाब नहीं। 


(i) हाफ़िज़ ज़हबी फरमाते हैं:

अइम्मा सलफ (ओल्ड) अइम्मा खलफ़ (न्यू) का अक़ीदा है नबी अलैहिस्सलाम को आसमानो से ऊपर सिदरा तुल मुन्तहा तक मेराज कराई गयी। [उलुल अलीउल गफ्फार पेज 102]


(ii) इमाम हाफ़िज़ बगवी फरमाते हैं:

अक्सर अहले इल्म के मुताबिक नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को हालत बेदारी मे जिस्म और रूह के साथ सैर कराई गयी इस पर मुत्वातिर अहदीस हैं। [तफसीर ए बगवी वॉल्यूम 03 पेज 105]


मेराज कब हुई?

उम्मत मे इस बात को लेकर बहुत इख़्तिलाफ है की मेराज कब हुई?

बाज़ मुल्को मे इसरा व मेराज की याद के तोर पर 27 रजब की रात को जश्न मनाया जाता है जबकि इस रात मे मेराज होना सहीह नहीं। 


(i) हाफ़िज़ इब्ने हजार असक़लानी इब्ने रहिया रहिमाउल्लाह से नक़ल करते हैं के, 

बाज़ क़िस्सा गो (क़िस्से बनाने वाले) लोगो ने ये बयान किया है की मेराज माह ए रजब मे पेश आयी थी ये कज़ब (झूठ) है। [तबिनुल अजब पेज 06]


(ii) अल्लामा इब्ने रजब ने फतह उल बारी जिल्द 07 सफा 242-243 मे मेराज के वक़्त के बारे मे इख़्तिलाफ ज़िक्र किया है और वाज़ेह किया है के एक क़ौल ये है की मेराज माह ए रजब मे हुई थी, दूसरा क़ौल ये है शववाल या रमजान मे हुई थी। एक मे ये है रबी उल अव्वल मे हुई थी। सहीह बात वही है जो अल्लामा इब्ने तहमिया फरमाते हैं, मेराज का महीना अशरा और दिन के बारे मे कोई क़तई दलील साबित नहीं। बल्कि इस सिलसिले मे कण्ट्रोडिक्शन वाली बाते हैं। [लताइफ उल मुआरिफ इब्ने रजब पेज 233]


इस तफसील से साबित हुआ मेराज कब हुई कौन से महीने में हुई इसका कोई भी सहीह सबूत नहीं है। 

जब सबूत ही नहीं है तो आजकी अवाम क्यों माहे रजब की 27 तारीख को जश्न ए मेराज मनाने की तैयारी करते हैं?

अगर मेराज जैसी रात जश्न मनाना जाएज़ होता तो सबसे पहले नबी अलैहिस्सलाम के सहाबा इसको मनाते क्यूंकि सहाबा से ज़्यादा दींन कोई नहीं समझता और ना ही उन्होंने नबी अलैहिस्सलाम के नाम मेराज की रात जश्न मनाया। 

लिहाज़ा खुलासा ये है मेराज कब हुई कौन से महीने में इसका इल्म हमें नहीं है सिर्फ अल्लाह जानता है।

इतने खुलासे के बाद अब चलते हैं उन हदीसो की तरफ जो रजब के मुताल्लिक बयान की जाती हैं।  


रजब के मुताल्लिक बयान की जाने वाली हदीसें

इस रोज़ रजब की रात खासकर लोग इबादत करते हैं जो की सरीह बिदअत है दीन मे नया काम है इसके मुताल्लिक जो रिवायतें पेश की जाती हैं उनको देख लेते हैं-


हदीस 01: सय्यदना सलमान फ़ारसी से मरवी है की नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

"27 रजब के दिन रोज़ा रखना और रात को क़ियाम करने वाले को 100 बरस के रोजो और क़ियाम का सवाब मिलता है, इसी दिन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मबऊस हुए।" [शुएब उल ईमान 3530 इनके अलावा कई किताबों मे ये हदीस आयी है]

जवाब: सख्त ज़इफ व मुंकर रिवायत है। 

1. खालिद बिन हयाज बिन बुस्तान ज़इफ है, इसकी अपने वालिद से मरवी रिवायत मुंकर होती हैं। 

(i) इमाम इब्ने हिब्बान फरमाते हैं: "इसकी वो रिवायत क़ाबिल ए एतबार हैं जो इसने अपने बाप के अलावा किसी और से बयान की।" [किताब उस सिक़ात 08/225]

(ii) इमाम ज़हबी कहते हैं: "ये अपने बाप से मुंकर रिवायत बयान करता था।" [सियारु आला मिन नुबला 04/114]

और इस रिवायत मे भी इसने अपने बाप से रिवायत किया लिहाज़ा मुंकर है। 

2. हयाज बिन बुस्तान ज़इफ है। 

3. सुलेमान बिन तरखान तेमी मुदल्लिस है। 


खुलासा: लिहाज़ा हदीस ज़इफ हुई। 


हदीस 02: हज़रत अनस बिन मालिक से मरवी है नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

"27 रजब की रात इबादत करने वाले की नेकियां 100 साल इबादत के बराबर है जो इसमें 12 रकात अदा करता है हर रक़ात मे सुरह फातिहा और क़ुरआन की कोई सूरत पढता है हर दो रकात के बाद तशहुद बैठता है आखिर मे सलाम फेरता है बाद अज़ान सुभानअल्लाह,, अल्हम्दुलिल्लाह,, ला इलाहा इल्लाल्लाह और अल्लाहु अकबर की तस्बीह 100 मर्तबा और 100 मर्तबा अस्तग़्फ़िरुल्लाह पढता है 100 मर्तबा नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दुरुद भेजता है तो दुनिया आख़िरत के उमूर मे से जो चाहे माँगे अगली सुबह रोज़े रखे तो दुआए मअसियत के अलावा अल्लाह ताला उसकी हर दुआ को शरफ क़ुबूलियत पहुंचाएगा।" [शुएब उल ईमान 3531 ]


जवाब: झूठी रिवायत है। 

(01) मुहम्मद बिन फज़ल बिन अतिया ऐबी मतरूक व कज़्ज़ाब है। 

(02) अबान बिन अबी अयाश मतरूक है। 

(03) खलफ़ बिन मुहम्मद इस्माइल ख़्याम ज़इफ व मतरूक है। 

(04) अबान का सय्यदना अनस बिन मालिक से सुनना साबित नहीं। 

(05) नश्र बिन हुसैन अबू लैस बुखारी की तोसीक नहीं मिली। 

(06) इसा बिन मूसा खन्जार मुदालिस है। 

(07) मक्की बिन खलफ़ और इनका मुताबे इस्हाक़ बिन अहमद बिन खलफ़ दोनों के हालत ए ज़िन्दगी नहीं मिली। 

(i) हाफ़िज़ हैसमी ने इस रिवायत को ज़इफ क़रार दिया। [शुएब उल ईमान 07/394]

(ii) हाफ़िज़ इबने हजर असक़लानी फरमाते है: "इसकी सनद मजहूल है।" [तबिनुल अजब 63]


खुलासा: ये हदीस झूठी है। 


हदीस 03: सय्यदना इब्ने अब्बास रज़ि अन्हु से मंसूब है,

"जो 27 रजब की रात 12 रकात नमाज़ अदा करता है हर रकात मे सूरत फातिहा और कोई दूसरी सूरह तिलावत करता है नमाज़ से फ़ारिग होने के बाद इसी जगह बैठे बैठे 07 मर्तबा सूरत फातिहा पढता है फिर चार बार सुभानअल्लाही ला इलाहा इल्लाल्लाहु वल्लाहु अकबर वला हवला वला क़ुववता इल्ला बिल्लाहि अलीइल अज़ीम की तस्बीह करता है अगली सुबह रोज़ा रखता है तो अल्लाह ताला उसकी 60 साला खतायें माफ़ फरमा देता है नबी अलैहिस्सलाम को नुबुवत इसी रात मिली।" [तारीख इब्ने असाकिर 27/308 तबिनुल अजब इबने हजर 52]


जवाब: झूठा कोल

(01) मुहम्मद बिन ज़ियाद यशकरी कूफी कज़्ज़ाब (झूठा) है। 

इसे इमाम यहया बिन मुईन, इमाम अहमद बिन हम्बल, इमाम फलास, इमाम अबू ज़ुरआ राज़ी, इमाम नसई ने कज़्ज़ाब कहा है। (पल्ले दर्जे का झूठा था) 

(02) अबुल हुसैन उबैदुल्लाह बिन खालिद के हालत ज़िन्दगी नहीं मिले। 


खुलासा: हदीस झूठी है। 


आपने अंदाजा लगा लिया होगा इनका झूठी रीवायातो पर हमारी क़ौम टिकी हुई है। अल्लाह हम सबको दिन ए मुहम्मदी को समझने की तौफ़ीक़ दे।  

आमीन


आपका दीनी भाई
मुहम्मद


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