Namaz-e-Janaza ek se zyada baar padhna

Namaz-e-Janaza-ek-se-zyada-baar-padhna


नमाज़-ए-जनाज़ा एक से ज़्यादा बार पढ़ना

एक मय्यत पर एक से ज़ायद बार नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की जा सकती है। यह नबी अकरम ﷺ की सुन्नत है। अहनाफ़ (हनीफ़ी मकतब-ए-फ़िक्र) के नज़दीक ऐसा करना जाइज़ नहीं, जबकि इसके सुबूत पर बहुत सारी अहादीस-ए-मुबारका वारिद हुई हैं।

सैय्यदना अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:

إِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلَّى عَلَى قَبْرٍ .

"नबी करीम ﷺ ने एक क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की।" [सही मुस्लिम: 955]

सैय्यदना जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:

إِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَلَّى عَلَى قَبْرِ امْرَأَةٍ بَعْدَ مَا دُفِنَتْ .

"नबी करीम ﷺ ने एक औरत की क़ब्र पर दफ़्न के बाद नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की।" [सुनन अन-नसाई: 2027] और इसकी सनद हसन है।

इमाम शअबी रहमतुल्लाही अलैहि बयान करते हैं:

أَخْبَرَنِي مَنْ مَرَّ مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَلَى قَبْرٍ مَنْبُودٍ، فَأَمَّهُمْ ، وَصَلَّوْا خَلْفَهُ .

"मुझे इब्न अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने ख़बर दी, जो नबी करीम ﷺ के साथ एक अलग-थलग क़ब्र के पास से गुज़रे थे। बयान करते हैं कि नबी करीम ﷺ ने सहाबा किराम की इमामत की और उन्होंने आपकी इक़्तिदा (पीछे) में नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की।" [सही बुख़ारी: 1336, सही मुस्लिम: 954]

बाज़ लोग कहते हैं कि क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना नबी अकरम ﷺ का ख़ासा हैं।

उनके रद्द में अल्लामा इब्न हज़्म रहमतुल्लाही अलैहि‌ (456 हिजरी) लिखते हैं:

هُذَا أَبْطَلَ الْخُصُوصَ، إِنَّ أَصْحَابَهُ عَلَيْهِ السَّلَامُ، وَعَلَيْهِمْ رِضْوَانُ اللَّهِ صَلَّوْا مَعَهُ عَلَى الْقَبْرِ ، فَبَطَلَتْ دَعْوَى الْخُصُوصِ .

"इस हदीस ने दावा-ए-ख़ुसूसियत को बातिल कर दिया है, क्योंकि सहाबा ने भी नबी करीम ﷺ के साथ क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी थी। यूँ ख़ुसूसियत का दावा बातिल हो गया।" [अत-मुहल्ला बिल-आसार: 141/5]

"मुहद्दिसीन-ए-किराम ने इस हदीस पर اَلصَّلَاةُ عَلَى الْقَبَرِ के उनवान से अबवाब क़ायम किए हैं। अल्लामा अब्दुल हई लखनवी हनफ़ी (1304 हिजरी) इस दावा-ए-ख़ुसूसियत को तहक़ीक़ के ख़िलाफ़ क़रार देते हैं। [अत-तअलीक़ुल मुमज्जिद, सफ़ा: 167]

सैय्यदना अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि एक सियाह फ़ाम औरत (या मर्द) मस्जिद में झाड़ू देती थी। नबी अकरम ﷺ ने उसे गुम पाया, तो उसके बारे में दरियाफ़्त किया। सहाबा किराम ने अर्ज़ किया कि वह औरत फ़ौत हो गई है। फ़रमाया: आपने मुझे इत्तला क्यों न की? गोया सहाबा ने उसके मामले को मामूली समझा था। आप ﷺ ने फ़रमाया: 

دُلُّونِي عَلَى قَبْرِهِ، فَدَلَّوْهُ، فَصَلَّى عَلَيْهَا

"मुझे उसकी क़ब्र बताएँ। सहाबा किराम ने उसकी क़ब्र के मुताल्लिक़ बताया, तो आप ﷺ ने उस पर नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की।" [सही बुख़ारी: 1337, सही मुस्लिम: 956]

यज़ीद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं: हम नबी अकरम ﷺ के साथ बाहर निकले। बक़ीअ में पहुँचे, तो अचानक एक क़ब्र नज़र आई। नबी अकरम ﷺ ने उसके बारे में सवाल किया, तो सहाबा किराम ने अर्ज़ किया: यह फ़ुलाँ औरत की क़ब्र है। नबी करीम ﷺ ने उसे पहचान लिया। फ़रमाया: आपने मुझे इसके बारे में इत्तला क्यों नहीं की? सहाबा ने अर्ज़ किया: आप रोज़े की हालत में थे और दोपहर को आराम फ़रमा रहे थे। फ़रमाया:

لَا تَفْعَلُوا لَا أَعْرِفَنَّ مَا مَاتَ مِنْكُمْ مَيِّتٌ مَا كُنْتُ بَيْنَ أَظْهُرِكُمْ إِلَّا آذَنْتُمُونِي بِهِ، فَإِنَّ صَلَاتِي عَلَيْهِ رَحْمَةٌ قَالَ : ثُمَّ أَتَى الْقَبْرَ ، فَصَفَفْنَا خَلْفَهُ ، وَكَبَّرَ عَلَيْهِ أَرْبَعًا 

"आइंदा ऐसा न करना, जब तक मैं आपके दरमियान मौजूद हूँ, मेरे इल्म में यह न आए कि कोई फ़ौत हुआ है और आपने मुझे इत्तला नहीं की, क्योंकि मेरा नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना उसके लिए बाइस-ए-रहमत है। फिर आप ﷺ क़ब्र पर आए। हमने आपके पीछे सफ़ें बनाईं। आप ﷺ ने उस पर चार तकबीरें कहीं।" [मुस्नद अल-इमाम अहमद: 8452 सुनन अन-नसाई: 2024, अल-मुस्तदरक अलस-सहीहैन लिल-हाकिम: 3525] और इसकी सनद सही है)

इस हदीस को इमाम इब्न हिब्बान रहमतुल्लाही अलैहि (3087) ने "सही" कहा है।

इमाम इब्न हिब्बान (रहमतुल्लाही अलैहि (354 हिजरी) फ़रमाते हैं:

फ़रमान-ए-नबवी ﷺ فَإِنَّ صَلَاتِي عَلَيْهِمْ رَحْمَةٌ "मेरा नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करना फ़ौत होने वालों के लिए रहमत का बाइस है। इससे बाज़ लोगों को वहम हुआ है कि क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करना जाइज़ नहीं, हालाँकि इल्लत (वजह) वह नहीं है, जो बाज़ लोगों के वहम में आई है कि यह तरीक़ा नबी अकरम ﷺ के साथ ख़ास है, उम्मत के लिए नहीं, क्योंकि अगर ऐसे होता, तो नबी अकरम ﷺ सहाबा किराम को अपने पीछे सफ़ें बनाने और अपने साथ क़ब्र पर नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमा देते। आपका क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करने वालों को न रोकना तौफ़ीक़-ए-इलाही से नवाज़े हुए लोगों के लिए वाज़ेह दलील है कि यह काम आपके और आपकी उम्मत सब के लिए जाइज़ है।" [सहीह इब्न हिब्बान: 3090]

अल्लामा अबुल हसन मुहम्मद बिन अब्दुल हादी सिंधी हनफ़ी (1138 हिजरी) लिखते हैं:

مِنْ هُهُنَا قَدْ أَخَذَ الْخُصُوصَ مَنِ ادَّعَى ذَلِكَ، وَهُوَ دَلَالَةٌ غَيْرُ قَوِيَّةٍ

"जिन्होंने ख़ुसूसियत का दावा किया है, उन्होंने यहाँ से दलील ली है, लेकिन यह इस्तिदलाल क़वी नहीं है।" [हाशिया अस-सिंधी अला सुनन अन-नसाई:4/ 85]

इन अहादीस के अलावा भी अहादीस-ए-मुबारका साबित हैं।

अल्लामा इब्न हज़्म रहमतुल्लाही अलैहि (456 हिजरी) फ़रमाते हैं: 

هذِهِ آثَارٌ مُّتَوَاتِرَةٌ ، لَا يَسَعُ الْخُرُوجُ عَنْهَا

"मुतवातिर अहादीस हैं, जिनके इनकार की गुंजाइश नहीं।" [अल-मुहल्ला बिल-आसार: 141/5]

इब्न अबी मुलैका रहमतुल्लाही अलैहि बयान करते हैं:

تُوُفِّيَ عَبْدُ الرَّحْمَنِ بْنُ أَبِي بَكْرٍ فِي مَنْزِلٍ كَانَ فِيهِ، فَحَمَلْنَاهُ عَلَى رِقَابِنَا سِتَّةَ أَمْيَالٍ إِلَى مَكَّةَ وَعَائِشَةُ غَائِبَةٌ، فَقَدِمَتْ بَعْدَ ذلِكَ فَقَالَتْ : أَرُونِي قَبْرَهُ فَأَرُوهَا فَصَلَّتْ عَلَيْهِ 

"अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु अपने घर में फ़ौत हो गए। हम उन्हें मक्का की तरफ़ छह मील अपने कंधों पर उठा कर ले गए। आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा सफ़र में थीं। वह इसके बाद तशरीफ़ लाईं, तो फ़रमाया: मुझे उनकी क़ब्र दिखाएँ। लोगों ने आपको अब्दुर्रहमान बिन अबी बक्र की क़ब्र दिखाई, तो आपने उन पर नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की।" [मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा: 3/360] और इसकी सनद सही है

नाफ़े रहमतुल्लाही अलैहि बयान करते हैं:

تُوُفِّيَ عَاصِمُ بْنُ عُمَرَ، وَابْنُ عُمَرَ غَائِبٌ فَقَدِمَ بَعْدَ ذَلِكَ بِثَلَاثٍ، قَالَ : فَقَالَ : أَرُونِي قَبْرَ أَخِي ، فَأَرُوهُ فَصَلَّى عَلَيْهِ 

"आसिम बिन उमर फ़ौत हुए तो सैय्यदना इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हु मौजूद नहीं थे। आप तीन दिन बाद तशरीफ़ लाए, तो फ़रमाया: मुझे मेरे भाई की क़ब्र दिखाएँ। लोगों ने क़ब्र दिखाई, तो आपने (वहाँ) नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की।" [मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा: 3/360] और इसकी सनद सही है

अल्लामा इब्न हज़्म रहमतुल्लाही अलैहि (456 हिजरी) लिखते हैं:

مَا عَلِمْنَا أَحَدًا مِنْ الصَّحَابَةِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ نَهَى عَنِ الصَّلَاةِ عَلَى قَبْرِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَمَا نَهَى اللهُ تَعَالَى عَنْهُ ، وَلَا رَسُولُهُ عَلَيْهِ السَّلَامُ، فَالْمَنْعُ مِنْ ذَلِكَ بَاطِلٌ ، وَالصَّلَاةُ عَلَيْهِ فِعْلُ خَيْرٍ ، وَالدَّعْوَى بَاطِلٌ إِلَّا بِبُرْهَانٍ 

"किसी एक सहाबी को भी नहीं जानते, जिसने रसूलुल्लाह ﷺ की क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा से मना किया हो। न अल्लाह तआला ने क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा से रोका, न रसूलुल्लाह ﷺ ने, लिहाज़ा इससे रोकना बातिल है। क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करना कार-ए-ख़ैर है। कोई भी दावा दलील के बग़ैर बातिल ही होता है।" [अल-मुहल्ला बिल-आसार: 141/5]

अब्दुल्लाह बिन औन रहमतुल्लाही अलैहि बयान करते हैं कि मैं इमाम मुहम्मद बिन सीरीन ताबई रहमतुल्लाही अलैहि के साथ था। हम एक जनाज़ा अदा करना चाहते थे। वह हमसे पहले ही अदा कर दिया गया, यहाँ तक कि मय्यत को दफ़्न भी कर दिया गया था। इस पर इमाम इब्न सीरीन रहमतुल्लाही अलैहि ने फ़रमाया:

تَعَالِ حَتَّى نَصْنَعَ كَمَا صَنَعُوا، قَالَ : فَكَبَّرَ عَلَى الْقَبْرِ أَرْبَعًا 

"आइए, हम भी इसी तरह (नमाज़-ए-जनाज़ा अदा) करें, जैसे उन्होंने किया है। आपने क़ब्र पर (नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करते हुए) चार तकबीरें कहीं।" [मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा: 3/360] और इसकी सनद सही है

इमाम शाफ़ई, इमाम अहमद वग़ैरह भी क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करने के क़ायल व फ़ाएल (मानने और करने वाले) हैं। 

सैय्यदना उक़्बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:

إِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَرَجَ يَوْمًا، فَصَلَّى عَلَى أَهْلِ أُحُدٍ صَلَاتَهُ عَلَى الْمَيِّتِ .

"नबी अकरम ﷺ एक दिन बाहर तशरीफ़ ले गए और उहुद के शुहदा (शहीदों) पर नमाज़-ए-जनाज़ा "पढ़ी, जैसे आप ﷺ मय्यत पर नमाज़-ए-जनाज़ा अदा करते थे।" [सही बुख़ारी: 1344, सही मुस्लिम: 2296]

यह हदीस दलील है कि मय्यत पर अगर सालों पहले नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की जा चुकी हो, तो भी नमाज़-ए-जनाज़ा का दोहराना जाइज़ है। इससे (सिर्फ़) दुआ मुराद लेना दुरुस्त नहीं। यह नमाज़-ए-जनाज़ा नबी अकरम ﷺ ने शुहदा-ए-उहुद पर आठ साल बाद अदा की थी, जबकि रसूलुल्लाह ﷺ ने इन शुहदा पर पहले भी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की थी। [शरह मआनी अल-आसार: 1/502] और इसकी सनद हसन है

मज़्कूर-ए-ज़िक्र की गई हदीस से मय्यत पर तक्रार-ए-जनाज़ा (जनाज़ा दोहराने) का जवाज़ साबित होता है। इसी तरह क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा की अदायगी का भी इस्बात होता है, ख़्वाह क़ब्र पुरानी हो या नई और ख़्वाह दफ़्न से पहले नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की गई हो, या न की गई हो।

इसी तरह जिसने एक बार नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ लिया, वह भी दोबारा नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ सकता है।


इब्तिसामा:

मौलाना मुहम्मद सरफ़राज़ ख़ान सफ़दर देवबंदी साहब इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाही अलैहि के मुताल्लिक़ लिखते हैं: "ग़रज़ ये कि इस मज़लूमाना तौर पर 150 हिजरी में उनकी वफ़ात हुई। पहली मर्तबा कम-ओ-बेश पचास हज़ार के मज्मए (भीड़) ने उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी। आने वालों का ताँता बँधा हुआ था। छह मर्तबा नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी गई और दफ़्न के बाद भी बीस दिन तक लोगों ने उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी।" [सीरत अन-नुमान: 42, मक़ाम-ए-अबी हनीफ़ा, सफ़ा: 98-99]

अल्लामा इर्शादुल हक़ असरी हफ़िज़हुल्लाह ने जवाबन लिखा है कि यह झूठी कहानी है। जब इमाम अबू हनीफ़ा और उनके तलामिज़ा (शागिर्द), बल्कि तमाम अहनाफ़ का यह मसलक है कि क़ब्र पर दोबारा नमाज़-ए-जनाज़ा जाइज़ नहीं, तो "इमाम अबू हनीफ़ा के लिए जाइज़ क्यों?" [मौलाना सरफ़राज़ सफ़दर अपनी तसानीफ़ के आईने में, सफ़ा: 260]

शैख़ असरी हफ़िज़हुल्लाह के रद्द में सफ़दर साहब के फ़रज़ंद (बेटे) मुहम्मद अब्दुल क़ुद्दूस ख़ान क़ारन लिखते हैं: "और दूसरी बात करने में तो असरी साहब ने बेतुकी की हद कर दी, जब वह ज़रा होश में आएँ तो उनसे कोई पूछे कि क्या इमाम साहब के जनाज़े में सिर्फ़ अहनाफ़ शरीक थे? दीगर मज़हब मालकी, शाफ़ई और हम्बली वग़ैरह के लोग शरीक न थे? जब वह लोग शरीक थे और उनके नज़दीक क़ब्र पर नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ना दुरुस्त है तो इस पर एतराज़ की क्या हक़ीक़त बाक़ी रह जाती है?" [मशहूर ग़ैर-मुक़ल्लिद मौलाना  इर्शादुल हक़ असरी साहब का मज्ज़ूबाना वावैला, सफ़ा: 289]

क़ारिईन-ए-किराम ! इन्साफ़ कीजिए, जब इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाही अलैहि 150 हिजरी में फ़ौत हो रहे हैं और इमाम शाफ़ई रहमतुल्लाही अलैहि की विलादत-ए-बासाअदत (शुभ 150 हिजरी में हुई और इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाही अलैहि 164 हिजरी में पैदा हुए, तो उनकी विलादत से पहले उनके पैरोकार दुनिया में इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाही अलैहि की नमाज़-ए-जनाज़ा में कैसे शरीक हो गए?


Team Islamic Theology

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