Qurabni ke ahkam o masail : Mutafarriq ahkaam

Qurabni ke ahkam o masail : Mutafarriq ahkaam


क़ुर्बानी के अहकाम व मसाइल

5. मुतफ़र्रिक़ अहकाम

ज़ुल-हिज्जा से पहले बाल और नाखून काटना ज़रूरी नहीं, सिर्फ दस दिन (काटने से) रुकना है, जहाँ क़ुरबानी का अज्र पाएंगे, वहाँ इस सुन्नत के नूर, बरकत और अज्र से बहरा-मंद हो जाएंगे।

सैय्यदा उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

إِذَا دَخَلَتِ الْعَشْرُ، وَأَرَادَ أَحَدُكُمْ أَنْ يُضَحِّيَ، فَلَا يَمَسَّ مِنْ شَعَرِهِ وَبَشَرِهِ شَيْئًا 

"जब अशरा-ए-ज़ुल-हिज्जा दाख़िल हो जाए और आप क़ुरबानी करना चाहते हैं, तो अपने सर और जिस्म के बाल न मूंडें।" [सहीह मुस्लिम : 1977]

सुनन नसाई 4362 में है:

مَنْ أَرَادَ أَنْ يُضَحِّيَ فَلَا يَقْلِمْ مِنْ أَظْفَارِهِ، وَلَا يَحْلِقْ شَيْئًا مِنْ شَعْرِهِ فِي عَشْرِ الْأُوَلِ مِنْ ذِي الْحِجَّةِ 

"जो क़ुरबानी करना चाहता हो, वह ज़ुल-हिज्जा के पहले दस दिन न नाखून तराशे, न जिस्म से कोई बाल मूंडे।"

सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने (मदीना में) क़ुरबानी करने के बाद सर के बाल मुंडवाए, फ़रमाया: यह वाजिब नहीं। [मुवत्ता इमाम मालिक: 1928] और इसकी सनद सही है।

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने अयाम-ए-ज़ी-हिज्जा में एक औरत को अपने बच्चे के बाल काटते देख कर फ़रमाया:

"अगर क़ुरबानी वाले दिन तक मोअख़र (टाल) कर देती, तो बेहतर था।" [मुस्तदरक अलस-सहीहैन लिल-हाकिम: 7520] और इसकी सनद हसन है।

इमाम सईद बिन मुसैय्यब रहमतुल्लाहि अलैहि से पूछा गया कि क्या यह्या बिन यअ़मर रहमतुल्लाहि अलैहि खुरासान में फतवा देते थे कि जो कुर्बानी का इरादा रखता हो, वह अशरा-ए-ज़ुल-हिज्जा में अपने बाल और नाखून न काटे? तो सईद बिन मुसैय्यब रहमतुल्लाहि अलैहि ने फरमाया: उन्होंने सही फतवा दिया, सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम भी यही फतवा देते थे। [मुसनद इसहाक़ बिन राहविया: 1817] और इसकी सनद सही है।

सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं:एक सहाबी ने अर्ज़ किया: अल्लाह के रसूल! मेरे पास कुर्बानी के लिए सिर्फ बकरी है, वह भी किसी को दूध के लिए आरिया (उधार) दे रखी है क्या मैं उसकी कुर्बानी कर लूँ? फरमाया: नहीं, बल्कि आप (दस ज़ुल-हिज्जा को) अपने बाल काट लें, नाखून तराश लें, मूँछें मूंड लें और ज़ेरे-नाफ बाल साफ़ कर लें, तो अल्लाह तआला आपको मुकम्मल कुर्बानी का अज्र देगा। [मुसनद अहमद: 2/169, सुनन अबू दाऊद: 2789, सुनन नसाई: 4365] और इसकी सनद हसन है।

इस हदीस को इमाम इब्न हिब्बान: 5914, इमाम हाकिम: 4/223, और हाफ़िज़ ज़हबी ने सही कहा है।

ज़ुल-हिज्जा का चाँद देखने से पहले बाल काटना मुस्तहब है, ज़रूरी नहीं; जब मुसलमान कुर्बानी करने लगें, तो उस वक़्त बाल कटवाए जा सकते हैं।

अल्लामा-तुल-हिंद शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि अलैहि (1176 हिजरी) फरमाते हैं:

اسْتُحِبَّ تَرْكُ الْحَلْقِ لِمَنْ قَصَدَ التَّضْحِيَةَ

"जो क़ुरबानी का इरादा रखता है, उसके लिए बाल न काटना मुस्तहब है।" [हुज्जतुल्लाहि अल-बालिगा: 2/48]

क़ुरबानी की इस्तताअत न रखने वाला ज़ुल-हिज्जा का चाँद नज़र आने से पहले जिस्म के फ़ाज़िल बाल (ज़ेरे-नाफ़), सर के बाल और मूँछें काट ले, नाख़ून तराशे, फिर क़ुरबानी तक इससे परहेज़ करे, तो उसे क़ुरबानी का पूरा अज्र-ओ-सवाब मिलेगा। [मुसनद अहमद: 2/169, सुनन अबू दाऊद: 2789, सुनन नसाई: 4365] और इसकी सनद हसन है। इस हदीस को [इमाम इब्न हिब्बान: 5914, इमाम हाकिम:4/223] और हाफ़िज़ ज़हबी रहमतुल्लाहि अलैहि ने सही कहा है।

अल्लाह तआला का यह फ़ज़ल है कि वह अपने मुख़लिस और मोहसिन बंदों को नेक-नियती पर भी अज्र-ओ-सवाब से नवाज़ता है। अगर कोई शख़्स माली इस्तताअत नहीं रखता, मगर वह क़ुरबानी के जज़्बे से सरशार है, तो उसे भी इस अज्र से महरूम नहीं रखा गया, लिहाज़ा उसे चाहिए कि इन अयाम (दिनों) में बाल और नाख़ून काटने से रुका रहे और दस ज़ुल-हिज्जा को जब क़ुरबानी का वक़्त हो, वह नाख़ून और बाल काट ले, तो उसे मुकम्मल क़ुरबानी का अज्र मिल जाएगा, सुब्हान अल्लाह!

सैय्यदना अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:

إِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ فِي غَزَاةٍ، فَقَالَ : إِنَّ أَقْوَامًا بِالْمَدِينَةِ خَلْفَنَا، مَا سَلَكْنَا شِعْبًا وَلَا وَادِيًا إِلَّا وَهُمْ ووه مَعَنَا فِيهِ، حَبَسَهُمُ الْعُذْرُ

"नबी करीम ﷺ किसी ग़ज़वा में थे, फ़रमाया: हमारे पीछे मदीना में कुछ लोग हैं, जो हर वादी और घाटी में हमारे साथ ही हैं, उन्हें फ़क़त उज़्र (मजबूरी) ने रोक रखा है।" [सहीह बुखारी: 2839]

सैय्यदना जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं:

كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي غَزَاةٍ، فَقَالَ : إِنَّ بِالْمَدِينَةِ لَرِجَالًا مَا سِرْتُمْ مَسِيرًا، وَلَا قَطَعْتُمْ وَادِيًا، إِلَّا كَانُوا مَعَكُمْ ، حَبَسَهُمُ الْمَرَضُ 

"हम नबी करीम ﷺ के हमराह एक ग़ज़वा में थे, फ़रमाया: मदीना में कुछ लोग हैं, जो हर सफ़र में और हर वदी को उबूर (पार) करते वक़्त आपके साथ ही होते हैं, उन्हें फ़क़त बीमारी ने (आपके साथ ग़ज़वा में निकलने से) रोक रखा है।" [सहीह मुस्लिम: 1911] नबी करीम ﷺ ने एक उसूल बयान फ़रमाया कि जिसकी नियत अच्छी हो, जज़्बा-ए-सादिक़ा हो, मगर शरई उज़्र (मजबूरी) की वजह से वह नेकी न कर सके, तो उसे नेकी करने वालों के बराबर अज्र मिलता है।

आप ﷺ ने मिसाल देकर समझाया कि बाज़ लोग ग़ज़वा में हमारे साथ निकलना चाहते थे, मगर बीमारी माने हुई और वह हमारे साथ न चल सके, मगर नियत खालिस थी, लिहाज़ा उन्हें इस नियत पर जेहाद का अज्र मिलता है, जिस तरह ब-नफ़्स-ए-नफ़़ीस (स्वयं) जेहाद में निकलने वाले का अज्र होता है, इसी तरह बीमारी या किसी शरई उज़्र की बिना पर ग़ज़वा में शरीक न होने वालों के लिए भी अज्र होता है। यह अल्लाह का फ़ज़ल है, वह अपने बंदों को नियत पर भी नवाज़ता है और उज़्र की बिना पर किसी को अज्र से महरूम नहीं करता।

सैय्यदना अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

إِذَا مَرِضَ الْعَبْدُ، أَوْ سَافَرَ ، كُتِبَ لَهُ مِثْلُ مَا كَانَ يَعْمَلُ مُقِيمًا صَحِيحًا 

"कोई हालत-ए-इक़ामत (घर पर रहने की स्थिति) या सेहत-याबी में नेक अमल करता है, उसे बीमारी या सफ़र "में भी वैसे ही अज्र मिलता है।" [सहीह बुखारी: 2996] मुसाफिर और मरीज़ जब इका़मत (अपने शहर में होना) और सेहत में थे, तो उन्होंने इस अमल को दवाम के साथ अंजाम देने का इरादा किया हुआ था, अब उज़्र (मजबूरी) की वजह से वह अपने अमल पर दवाम नहीं कर पा रहे, लिहाज़ा उन्हें अपने पुख्ता इरादे की बिना पर न करते हुए भी करने का अज्र मिलता है, यह अल्लाह तआला का फ़ज़्ल है,

जिसे वह चाहे अता कर दे।अलबत्ता जो शख्स दवाम के साथ अमल नहीं करता और न ही दवाम का कस्द (इरादा) और इरादा रखता है, तो उसे सफर और मर्ज की वजह से छोड़े हुए अमल का अज्र नहीं मिलता। ब-ऐनही (ठीक इसी तरह) एक शख्स कुर्बानी का इरादा रखता है लेकिन माली इस्तताअत न होने की वजह से कुर्बानी नहीं कर पाता, तो उसे इसी नियत और जज़्बे की वजह से मुकम्मल कुर्बानी का अज्र दिया जाता है। इसी तरह जो पहले इस्तताअत रखता था और कुर्बानी भी करता था, बाद में हालात की तंगी की वजह से कुर्बानी नहीं कर पाता, लेकिन उसकी नियत दुरुस्त है, तो उसे भी कुर्बानी का अज्र मिलता है। इसीलिए नबी करीम ﷺ ने ऐसा जज़्बा रखने वाले को भी इन अयाम (दिनों) में बाल और नाखून न काटने की रहनुमाई फरमाई और इस पर पूरी कुर्बानी के अज्र की नवेद (खुशखबरी) सुनाई है।

कुर्बानी के लिए निसाब-ए-ज़कात की शर्त बे-बुनियाद है, हर मुसलमान अल्लाह तआला से डरते हुए अपनी सूरत-ए-हाल को मद्देनज़र रखकर फैसला कर सकता है। नबी करीम ﷺ पूरी ज़िंदगी निसाब-ए-ज़कात को नहीं पहुँचे, इसके बावजूद कुर्बानी करते। उधार लेकर कुर्बानी करने वाला अज्र-ए-कसीर (बहुत बड़े सवाब) का मुस्तहिक होगा।


Team Islamic Theology

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