रकअतें तरावीह
तरावीह सुन्नत आठ रकअत ही है।
अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी देवबंदी साहब कहते हैं:
لا مَنَاصَ مِنْ تَسْلِيمٍ أَنَّ تَرَاوِيحَهُ كَانَتْ ثَمَانِيَةَ رَكْعَاتٍ، وَلَمْ يَثْبُتْ فِي رِوَايَةٍ مِّنِ الرِّوَايَاتِ أَنَّهُ صَلَّى التَّراوِيحَ وَالتَّهَجَّدَ عَلَى حِدَةٍ فِي رَمَضَانَ
इस बात को माने बिना कोई चारा नहीं कि नबी करीम ﷺ की तरावीह की नमाज़ आठ रकअत थी। और किसी भी रिवायत से यह साबित नहीं होता कि आपने रमज़ान में तहज्जुद और तरावीह अलग-अलग पढ़ी हों। (अल-उर्फ़ अश-शज़ी, 1/166)
अल्लामा खलील अहमद सहारनपुरी देवबंदी साहब लिखते हैं: इब्न हमाम (ने) आठ को सुन्नत और ज़ायद को मुस्तहब लिखा है, सो यह क़ौल तान के क़ाबिल नहीं। (बराहीने राहीन क़ातिआ : 18)
वे आगे लिखते हैं: दो सुन्नत मुअक्कदा होना तरावीह का आठ रकअत तो बाइत्तिफ़ाक़ है, अगर इख़्तिलाफ़ है, तो बारह में। (बराहीने क़ातिआ : 195)
अल्लामा अशरफ़ अली थानवी देवबंदी साहब कहते हैं: बीमारों को तो कह देता हूँ कि तरावीह आठ पढ़ो, मगर तंदरुस्तों को नहीं कहता। (अल-कलाम अल-हसन, हिस्सा दोयम, पृ. 89)
अल्लामा अब्दुश्शकूर फ़ारूक़ी लखनवी (देवबंदी) लिखते हैं: अगरचे नबी करीम ﷺ से आठ तरावीह मस्नून है और एक ज़ईफ़ रिवायत में इब्न अब्बास से बीस रकअत भी है। (इल्मुल फ़िक़्ह : 198)
यही बात अल्लामा इब्न हमाम हनफ़ी (फ़त्हुल क़दीर : 46/81), अल्लामा ऐनी हनफ़ी (उम्दतुल क़ारी : 17/171), इब्न नुजैम हनफ़ी (अल-बह्रुर-राइक़ : 6/62), इब्न आबिदीन शामी हनफ़ी (रद्दुल-मुहतार : 1/521), अबुल-हसन शरनबुलाली हनफ़ी (मराक़ी अल-फलाह : 442), तहतावी हनफ़ी (हाशिया तहतावी अला अद-दुर्र अल-मुख़्तार : 1/295) वग़ैरह ने बयान की है, जैसा कि हमने ज़िक्र किया है।
हमारे हनफ़ी बुज़ुर्गों के आठ रकअत मस्नून तरावीह के फ़ैसले के बाद, अब इंतिहाई इख़्तिसार के साथ दलाइल मुलाहिज़ा हों: अबू सलमा बिन अब्दुर्रहमान रज़ि० ने उम्मुल मोमिनीन सैय्यिदा आयशा सिद्दीक़ा रज़ि० से सवाल किया कि रसूलुल्लाह ﷺ की क़ियाम-ए-रमज़ान की कैफ़ियत क्या थी? उन्होंने फ़रमाया:
مَا كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَزِيدُ فِي رَمَضَانَ وَلَا فِي غَيْرِهِ عَلَى إِحْدَى عَشْرَةَ رَكْعَةً
रमज़ान हो या ग़ैर रमज़ान, रसूलुल्लाह ﷺ (अक्सर) ग्यारह रकअत से ज़्यादा नहीं पढ़ते थे। (सहीह अल-बुख़ारी : 1147, 2013; सहीह मुस्लिम : 738)
जुम्हूर उलमा उम्मुल मोमिनीन सैय्यिदा आयशा रज़ि० की हदीस से आठ रकअत तरावीह साबित करते हैं, जैसा कि अल्लामा अबुल अब्बास क़ुर्तुबी रहिमहुल्लाह (656 हि.) फ़रमाते हैं:
ثُمَّ اخْتُلِفَ فِي الْمُخْتَارِ مِنْ عَدَدِ الْقِيَامِ --- ، وَقَالَ كَثِيرٌ مِّنْ أَهْلِ الْعِلْمِ : إِحْدَى عَشْرَةَ رَكْعَةً ، أَخْذًا بِحَدِيثِ عَائِشَةَ الْمُتَقِدِّمِ
क़ियाम के मुख़्तार अदद में इख़्तिलाफ़ है। कसीर उलमा-ए-किराम ने सैय्यिदा आयशा रज़ि० वाली मज़कूरा हदीस से दलील लेते हुए कहा है कि यह ग्यारह रकअत हैं। (अल-मुफ़हिम : 2/389–390)
अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी देवबंदी साहब (1352 हि.) कहते हैं: सहीह अहादीस में नबी करीम ﷺ की तरावीह की नमाज़ आठ रकअत है। और सुननुल कुबरा वग़ैरह में बीस रकअत वाली रिवायत अबू शैबा की जानिब से ज़ईफ़ सनद के साथ आई है, क्योंकि वह इत्तिफ़ाक़न ज़ईफ़ रावी है। और जो आज बीस रकअत हैं, वह ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत है और हुक्मन मर्फ़ू के दर्जे में है, अगरचे हमें (नबी करीम ﷺ से) इसकी कोई क़वी सनद नहीं मिली। (अल-उर्फ़ अश-शज़ी : 1/101)
देखिए! शाह साहब आठ रकअत तरावीह नबी करीम ﷺ से सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम की हदीस से साबित कर रहे हैं और साथ ही फ़रमा रहे हैं कि हम बीस रकअत तरावीह नबी करीम ﷺ से क़वी सनद के साथ नहीं पा सके।
आप ख़ुद अंदाज़ा फ़रमाएँ कि एक मस्अला जो क़वी सनद के साथ साबित भी न हो, फिर बुख़ारी व मुस्लिम की मुत्तफ़क़ अलैह हदीस के ख़िलाफ़ भी हो, तो उसकी क्या हैसियत रह जाती है?
इसके अलावा ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन से भी किसी झूटी और मनगढ़ंत रिवायत से बीस रकअत तरावीह पढ़ना साबित नहीं है, लिहाज़ा बीस रकअत तरावीह को ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत क़रार देना सरीह ख़ता है।
जनाब अनवर शाह कश्मीरी साहब के अलावा मुतअद्दिद हनफ़ी फ़ुक़हा ने भी हदीस-ए-आयशा रज़ि० को आठ रकअत तरावीह की दलील बनाया है और तस्लीम किया है कि तरावीह और तहज्जुद में कोई फ़र्क़ नहीं है, बल्कि यह एक ही नमाज़ के दो मुख़्तलिफ़ नाम हैं। (फ़ैज़ुल बारी : 2/420 वग़ैरह)
सैय्यदना सायब बिन यज़ीद रज़ि० बयान करते हैं:
أَمَرَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ أُبَيَّ بْنَ كَعْبٍ وَتَمِيمًا الدَّارِيَّ أَنْ يَقُومَا لِلنَّاسِ بِإِحْدَى عَشْرَةَ رَكْعَةً
सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ि० ने सैय्यदना उबै बिन काब और सैय्यदना तमीम दारी रज़ि० को ग्यारह रकअत तरावीह (मअ वित्र) पढ़ाने का हुक्म दिया। (अल-मुवत्ता लिल-इमाम मालिक : 1/115, शरह मआनी अल-आसार लिल-तहावी : 1/293, अस-सुनन अल-कुबरा लिल-बैहक़ी : 2/496, मिश्कातुल मसाबीह : 1/407, और इसकी सनद सहीह है)
सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ि० का यह हुक्म सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम वाली हदीस-ए-आयशा रज़ि० के मुताबिक़ है। सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ि० का यह हुक्म सुन्नत-ए-नबविय्या ﷺ के ऐन मुताबिक़ है।
इससे साबित हुआ कि सैय्यदना उमर रज़ि० ने अपने दौर-ए-ख़िलाफ़त में आठ रकअत तरावीह पढ़ाने का हुक्म दिया था। और इससे बीस रकअत तरावीह के क़ायल और आमिल लोगों का रद्द होता है, और उनका बीस रकअत को सुन्नत मुअक्कदा मानने का नज़रिया ख़ता क़रार पाता है।
मज़कूरा बाला दलाइल से साबित हुआ कि आठ रकअत तरावीह रसूल-ए-करीम ﷺ की सुन्नत है। और सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ि० ने सैय्यदना उबै बिन काब रज़ि० और सैय्यदना तमीम दारी रज़ि० को वित्र समेत ग्यारह रकअत तरावीह पढ़ाने का हुक्म दिया था। और उन्होंने उनके हुक्म की तामील व तकमील में ग्यारह रकअत तरावीह पढ़ाई, और सहाबा-ए-किराम ने पढ़ी।
बअज़ हज़रात कहते हैं कि हम बीस रकअत नमाज़-ए-तरावीह इसलिए पढ़ते हैं कि सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ि० ने बीस रकअत पढ़ी थीं। लेकिन सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ि० से बीस रकअत अदा करना साबित नहीं होता, बल्कि अहद-ए-फ़ारूक़ी में आठ रकअत तरावीह पर सहाबा-ए-किराम का इज्मा था।
सैय्यदना सायब बिन यज़ीद रज़ि० बयान करते हैं:
إِنَّ عُمَرَ جَمَعَ النَّاسَ عَلَى أُبَيٍّ وَتَمِيمٍ، فَكَانَا يُصَلِّيَانِ إِحْدَى عَشْرَةَ رَكْعَةً
सैय्यदना उमर रज़ि० ने लोगों को सैय्यदना उबै बिन काब रज़ि० और सैय्यदना तमीम दारी रज़ि० की इमामत पर जमा किया। वे दोनों ग्यारह रकअत तरावीह पढ़ाते थे। (मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा : 2/391, तारीख़ुल-मदीना लि-इब्न शुब्बा : 2/713, और इसकी सनद सहीह है)
सैय्यदना सायब बिन यज़ीद रज़ि० बयान करते हैं:
كُنَّا نَقُومُ فِي زَمَانِ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ بِإِحْدَى عَشْرَةَ رَكْعَةً
हम (सहाबा) सैय्यदना उमर बिन ख़त्ताब रज़ि० के ज़माने में ग्यारह रकअत (तरावीह) पढ़ते थे। (सुनन सईद बिन मंसूर, नक़्लन अल-हावी लिल-फ़तावा लि-सुयूती : 1/349, हाशिया आसारुस-सुनन लि-निमवी हनफ़ी : 250, और इसकी सनद सहीह है)
अल्लामा सुब्की रहिमहुल्लाह लिखते हैं:
إِسْنَادُهُ فِي غَايَةِ الصِّحَةِ
“इसकी सनद इंतिहा दर्जे की सहीह है।” (शरह अल-मिनहाज, नक़्लन अल-हावी लिल-फ़तावा : 1/350)
दुआ है कि अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमें भी अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन!!
By Team Islamic Theology
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