इस्लाम में औरत का सजना-संवरना
अल्लाह रब्बुल अलामीन की बनाई इस ख़ूबसूरत दुनियां में औरत सबसे ख़ूबसूरत मख़लूक़ है, अल्लाह ने उसका हर रूप ख़ूबसूरत बनाया है। जब वो बेटी है तो रहमत, बहन है तो ताक़त, बीबी है तो शौहर के सुकून और नस्ल ए इंसानी को आगे बढ़ाने वाली...
और जब वो मां बनती है तो जन्नत उसके क़दमों तले होती है ,हर रिश्ते में ख़ुद को बख़ूबी ढाल लेना उसकी फ़ितरत में है। फिर अगर वो बाहया, पाकीज़ाऔर अपने इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करने वाली भी हो तो उसकी ख़ूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं और अल्लाह उस से राज़ी होता है।
इस्लाम मे सजने संवरने की मनाही नही हैं अलबत्ता उसके लिए कुछ हुदुद तय किए गए हैं औरत का सजना-संवरना फ़ितरत है, मगर हया और हदें उसका हुस्न हैं।
जो औरत अल्लाह की हदों में रहकर ज़ीनत करती है, वो दुनिया में भी प्यारी है और आख़िरत में भी कामयाब है।इस्लाम ने औरत को सजने-संवरने से नहीं रोका, बल्कि हदों के अंदर रहकर ज़ीनत (सजावट) की इजाज़त दी है।घर के अंदर, अपने शौहर के लिए सजना यह सवाब का काम है। क्योंकि इससे प्यार और मोहब्बत बढ़ती है, और निकाह की मज़बूती रहती है। लेकिन ग़ैर-महरम (ना-महरम) लोगों के सामने सजकर निकलना हराम (मना) है।
कुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है,
क्या इस्लाम में बेवावों (widows) के लिए ज़ेवर gold jewellery पहनने की मनाही है?
इस्लाम में बेवाओं (widows) के लिए ज़ेवर (gold jewellery) पहनने का हुक्म दो अलग-अलग हालातों पर निर्भर करता है 👇
1. इद्दत (ʿIddah) के दौरान
अगर औरत के शौहर का इंतिक़ाल (देहांत) हुआ है, तो उसे चार महीने और दस दिन (4 माह 10 दिन) की इद्दत पूरी करनी होती है। (क़ुरआन: सूरह अल-बक़रह, आयत 234)
इद्दत के दौरान मनाही है:
- ज़ेवर (सोना, चांदी आदि) पहनना
- ख़ुशबू लगाना
- रंगीन या सजे हुए कपड़े पहनना
- सिंगार-सज्जा (जैसे मेकअप, मेंहदी आदि)
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, "किसी औरत के लिए हलाल नहीं कि वह अपने शौहर के अलावा किसी के लिए तीन दिन से ज़्यादा शोक मनाए, मगर अपने शौहर के लिए चार महीने दस दिन तक शोक करे।" (सहीह बुखारी: 1280/सहीह मुस्लिम: 1486)
2. इद्दत ख़त्म होने के बाद
जब इद्दत की मियाद पूरी हो जाए, तो बेवा औरत पर अब ज़ेवर पहनने की कोई मनाही नहीं है। वह चाहे तो सोने-चांदी के ज़ेवर पहन सकती है, लेकिन शरअ के दायरे में रहकर यानी:
- नॉमेहरम को दिखाने के लिए न हो
- फ़िज़ूलखर्ची न हो
- और न ही दिखावे (riya) के लिए
हमारे मुआसरे में तरह तरह की बिद्दते और शिर्क की कई किस्में फैली हुई हैं औरतें बिना दीन को जाने बुझे ही अपने क़ायदे क़ानून दूसरे पर थोपने लगली हैं ये कह कर कि हमारे बाप दादा से यही चला आ रहा है जो कि सख़्त गुमराही है।
अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाते हैं, “और जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज़ की पैरवी करो जो अल्लाह ने उतारी है, तो वे कहते हैं ‘नहीं, हम तो उसी चीज़ की पैरवी करेंगे जिस पर हमने अपने बाप-दादाओं को पाया।’ क्या (वे ऐसा करेंगे) भले ही उनके बाप-दादा कुछ भी न समझते हों और न सही राह पर हों?” (सूरह अल-बक़रह 2:170)
यह आयत बताती है कि सिर्फ़ बाप-दादा की अंधी पैरवी करना ग़लत है, अगर वह हक़ और अल्लाह के हुक्म के ख़िलाफ़ हो।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से दुआ है हमें और उम्मते मुस्लिमा को गुमारही से बचाए, हर तरह के फ़ितना से हमें महफ़ूज़ रखे। आमीन
फ़िरोज़ा

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