Anbiya ke waqyaat Bachchon ke liye (Part-13l): Muhammad saw

Anbiya ke waqyaat Bachchon ke liye (Part-13l): Muhammad saw


अंबिया के वाक़िआत बच्चों के लिए (पार्ट-13l)

अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
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6. जंगे उहद

1. जाहिली स्वाभिमान और बदले की भावना

बद्र के दिन क़ुरैश के जो बड़े बड़े सरदार मारे गए थे उनका सख़्त सदमा उन्हें पहुंचा था, मक्का में कोई ऐसा व्यक्ति न था जिसके पिता, बेटे या भाई या अन्य जंग में क़त्ल न हुआ हो। लोगों ने अबु सुफ़ियान से बात चीत की और व्यापार का जो सामान क़ाफ़िले के साथ आया था उनके मालिकों से उसे मुसलमानों के ख़िलाफ़ जंग में इस्तेमाल करने की गुहार लगाई, इजाज़त मिलने पर क़ुरैश रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से जंग की तैयारी करने लगे, शायरों ने अपनी शायरी से उन्हें जंग के लिए उभारा और ग़ैरत व हमीयत (गौरव तथा आत्मसम्मान) दिलाया।

क़ुरैश तीन हिजरी शव्वाल के महीने में अपने लश्कर और अपने अधीन क़बीलों के साथ मक्का से निकले, क़ुरैशी सरदार अपनी पत्नियों के साथ चल पड़े यहांतक कि मदीना के बिल्कुल क़रीब पहुंच गए।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की राय थी कि मदीने में रहकर ही मुशरेकीन को लड़ाई की दावत दी जाय और जब वह शहर में प्रवेश कर जाएं तो वहां उनसे जंग की जाय। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस बार मदीने से बाहर निकलकर जंग करने के पक्ष में नहीं थे और अब्दुल्लाह बिन उबई की भी वही राय थी जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की राय थी लेकिन वह मुस्लिम नौजवान जो बद्र में शरीक नहीं हो सके थे उन्होंने कहा या रसूलुल्लाह आप हमारे साथ दुश्मनों की जानिब निकलें ताकि वह यह समझ लें कि हम उनसे डरे हुए या कमज़ोर नहीं हैं।

वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से ज़िद्द करते रहे यहांतक कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम घर गए और ज़िरह पहन ली। जब बाहर निकले तो वह लोग शर्मिंदा थे जिन्होंने मदीना से बाहर निकलकर लड़ने का सुझाव दिया था वह कहने लगे या रसूलुल्लाह हमने आपको तकलीफ़ पहुंचाई, हमें आपकी राय नापसंद नहीं करनी चाहिए थी, आपको जो पसंद हो वही कीजिए अगर आप चाहें तो मदीना में ही रहकर ही जंग कीजिए। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कोई नबी जब अपना हथियार पहन ले तो मुनासिब नहीं कि उसे उतार दे यहांतक कि अल्लाह उसके और दुश्मन के दरमियान फ़ैसला कर दे।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक हज़ार सहाबा के साथ मदीना से निकले जब वह मदीना और उहद के दरमियान शौत के स्थान पर पहुंचे तो अब्दुल्लाह बिन उबई एक तिहाई (लगभग तीन सौ) लोगों को लेकर यह कहते हुए अलग हो गया कि आपने मेरी राय पर अमल नहीं किया बल्कि दूसरों की बात मान ली।

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2. उहद के मैदान में

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीने से चले और उहद की घाटी में पहुंचे, उहद एक पहाड़ है जो मदीना से लगभग तीन किलोमीटर दूर है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी और अपनी लश्कर की पीठ उहद की तरफ़ कर ली और कहा तुममें से कोई भी जंग के लिए आगे न बढ़े जबतक हम उसे जंग का हुक्म न दें। उनके साथ सात सौ लोग थे और पचास तीर अंदाज़ चुनकर उनपर पर अब्दुल्लाह बिन जुबैर रज़ि अल्लाहु अन्हु को नियुक्त किया और उन्हें आदेश दिया कि हमसे दुश्मन के घुड़सवारों को रोके रखना कि कोई हमारे पीछे न आने पाए चाहे जंग हमारे हक़ में हो या हमारे ख़िलाफ़ हो तुम इस स्थान पर डटे रहना, इसे हरगिज़ न छोड़ना अगरचे परिंदे लश्कर की बोटियां नोच डालें। फिर ज़िरह पर दूसरी ज़िरह  पहनी और झंडा मुसअब बिन उमैर रज़ि अल्लाहु अन्हु के सुपुर्द किया

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3.  कम उम्र बच्चों का मुक़ाबला

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उहद के दिन बच्चों की टोली को उनकी उम्र कम होने कर कारण लौटा दिया। समुरा बिन जुन्दुब और राफ़ेअ बिन ख़ुदैज को भी लौटा दिया यह दोनों पंद्रह वर्ष के नौजवान थे लेकिन अबु राफ़ेअ ने अपने बेटे की सिफ़ारिश की और कहा या रसूलुल्लाह  "मेरा बेटा वास्तव में एक बेहतरीन तीरअंदाज़ है" रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें अनुमति दे दी। यह देखकर समुरा दोबारा आए फिर जब उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें लौटाना चाहा तो उन्होंने कहा, अगर आप राफ़ेअ से मेरी कुश्ती करा दें तो मैं उसे पछाड़ दूंगा चुनांचे दोनों में कुश्ती हो गई और समुरा ने राफ़ेअ को पछाड़ दिया फिर क्या था उन्हें भी अनुमति मिल गई फिर वह लश्कर में शामिल हुए और उहद के दिन जंग की।

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4. जंग

दोनों फ़ौजें आमने-सामने हुई और उनमें प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के क़रीब हुआ हिंद बिन्ते उतबा ने औरतों की सफ़ों में खड़ी होकर दफ़ बजाना शुरू किया ताकि लोगों को जंग पर उभारे और जोश भर दे, लड़ाई शुरू हो गई और शिद्दत पकड़ती चली गई। अबु दुजानारज़ि अल्लाहु अन्हु जिन्होंने रसूलुल्लाह से तलवार यह वादा करते हुए लिया था कि वह उसका हक़ अदा करेंगे दुश्मन की सफ़ों में घुस गए उनके सामने जो भी आया उसे क़त्ल कर दिया।

हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब ने उस दिन बहुत सख़्त जंग की उन्होंने अत्यधिक पहलवानों को क़त्ल किया उनके सामने कोई ठहरता न था जबकि जुबैर बिन मुतइम का ग़ुलाम वहशी घात लगाए हुए बैठा था वह बरछी मारने में इतना माहिर था कि निशाना कभी चूकता न था उससे जुबैर ने वादा किया था कि अगर वह बद्र में उसके चाचा तूऐमा के क़ातिल हमज़ा को क़त्ल कर देगा तो उसे आज़ाद कर दिया जायेगा, इसके साथ ही अबु सुफ़ियान की पत्नी हिन्द बिन्ते उतबा ने भी उसे हमज़ा के क़त्ल पर उकसाया ताकि उसके दिल को सुकून मिल सके चुनांचे वहशी ने बरछी ताना और हमज़ा पर फेंक मारा जो उनके दोनों पैरों के दरमियान से पार होगई और वह शहीद हो गए।

मुसअब बिन उमैर रज़ि अल्लाहु अन्हु रसूलुल्लाह के सामने इतना लड़े कि वह शहीद हो गए उस दिन मुसलमान सख़्त आज़माइश में डाले गए।

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5. मुसलमानों की विजय

अल्लाह ने अपनी मदद भेजी और अपने वादे को सत्य कर दिखाया। मुशरेकीन मैदान छोड़कर पीछे हटने लगे और उनकी पराजय में कोई संदेह नहीं रहा। यह देखकर कुरैशी औरतें भी अपने ख़ेमों की जानिब सिर पर पैर रखकर भागीं।

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6.  मुसलमानों की विजय पराजय में बदल गई

इसी दौरान जब मुशरेकीन पराजित होकर पीछे हटे और भागते भागते अपनी औरतों के ख़ेमों के पास जा पहुंचे। जब तीर अंदाज़ों ने ऐसा देखा तो उन्होंने मोर्चे की जगह छोड़ दी उन्हें विजय का यक़ीन हो चुका था चुनांचे वह पुकार उठे ऐ क़ौम के लोगो! दोड़ो दौड़ो ग़नीमत ग़नीमत, तभी उनके अमीर ने उन्हें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आदेश याद दिलाया लेकिन उन्होंने एक न सुनी, उनका ख़्याल था कि मुशरेकीन अब नहीं लौटेंगे इसलिए उस दर्रा को ख़ाली छोड़ दिया जिसके कारण मुसलमानों के पीछे का हिस्सा घुड़सवारों के लिए ख़ाली हो गया। मुशरेकीन के तमाम अलमबरदार (झंडा उठाने वाले) एक एक करके मारे जा चुके थे यहांतक कि अब कोई झंडा बुलंद करने को आगे नहीं बढ़ रहा था फिर मुशरेकीन ने मुसलमानों के पीछे ख़ाली देखा तो उधर जाकर सख़्त हमला कर दिया और एक व्यक्ति ने आवाज़ लगा दी, सुनो लोगो! मुहम्मद मारे गए, यह सुनकर मुसलमान पीछे पलट आए और मुशरिकों ने बहुत सख़्त हमला किया और घेरा तंग कर दिया यह मुसलमानों पर इन्तेहाई सख़्ती और आज़माइश का दिन था, दुश्मनों ने अचानक रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अकेले में पा लिया और उनपर पत्थर फेंकने लगे, एक पत्थर उनके चेहरे पर पड़ा और उनके दांत टूट गए, गाल ज़ख़्मी हो गया, होंठ में चोट आई और ख़ून बहकर चेहरे तक फैलने लगा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसको पोछते थे और कहते थे, "वह क़ौम भला कैसे कामयाब हो सकती है जिसने अपने नबी के चेहरे को ख़ून से रंग दिया हो हालांकि वह नबी उनको उनके रब की तरफ़ बुला रहा है।" (सुनन इब्ने माजा 4027)

मुसलमानों को आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जगह का पता न था, अली बिन अबि तालिब ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हाथ पकड़ा और तल्हा बिन उबैदुल्लाह ने उन्हें उठाया यहांतक कि आप सीधे खड़े हो गए और "मालिक बिन सिनान ने चेहरे से ख़ून साफ़ किया और उसे निगल गए।"

(अल मुस्तदरक लिल हाकिम 6386/ अल मुअजम अल औसत तबरानी) 

नोट:- ख़ून पीने वाली रिवायत ज़ईफ़ है।  मुस्तदरक की रिवायत में मूसा बिन मुहम्मद बिन अली अल हजबी और तबरानी की रिवायत में मुसअब बिन अल अस्क़ाअ मजहूल रावी हैं)

यह मुसलमानों की पराजय न थी यह तो एक वक़्ती हालत थी फिर मुसलमानों ने दोबारा हमला किया। मुसलमानों की यह हालत उनकी कमज़ोरी या मेहनत की कमी की वजह से भीबनहीं हुई थी और न यह दिलों में किसी कमी का नतीजा था और न इस्लाम के लिए मुसलमानों की कोशिश में कोई कमी थी और न अल्लाह के रसूल और दीन की मदद करने वालों में शहादत के जज़्बे की कमी थी बल्कि ऐसा तो केवल तीर अंदाज़ों की ग़लती और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आदेश न मानने के कारण हुआ था, उन्होंने उस मोर्चे को छोड़ दिया था जहां रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनकी ड्यूटी लगाई थी और सख़्ती के साथ वहां से न हटने का आदेश दिया था। अल्लाह तआला का फ़रमान है,

 وَلَقَدۡ صَدَقَكُمُ ٱللَّهُ وَعۡدَهُۥٓ إِذۡ تَحُسُّونَهُم بِإِذۡنِهِۦۖ حَتَّىٰٓ إِذَا فَشِلۡتُمۡ وَتَنَٰزَعۡتُمۡ فِي ٱلۡأَمۡرِ وَعَصَيۡتُم مِّنۢ بَعۡدِ مَآ أَرَىٰكُم مَّا تُحِبُّونَۚ مِنكُم مَّن يُرِيدُ ٱلدُّنۡيَا وَمِنكُم مَّن يُرِيدُ ٱلۡأٓخِرَةَۚ ثُمَّ صَرَفَكُمۡ عَنۡهُمۡ لِيَبۡتَلِيَكُمۡۖ وَلَقَدۡ عَفَا عَنكُمۡۗ وَٱللَّهُ ذُو فَضۡلٍ عَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ 

"अल्लाह ने हिमायत और मदद का जो वादा तुमसे किया था वह तो उसने पूरा कर दिया। शुरू में उसके हुक्म से तुम ही उनको क़त्ल कर रहे थे, मगर जब तुमने कमज़ोरी दिखाई और अपने काम में आपस में इख़्तिलाफ़ किया, और जैसे ही वह चीज़ अल्लाह ने तुम्हें दिखाई जिसकी मुहब्बत में तुम गिरफ़्तार थे [यानी माले-ग़नीमत] तुम अपने लीडर के आदेश की अवहेलना कर बैठे। इसलिये कि तुममें से कुछ लोग दुनिया की ख़्वाहिश रखते थे और कुछ आख़िरत की इच्छा रखते थे। तब अल्लाह ने तुम्हें काफ़िरों के मुक़ाबले में शिकस्त दी ताकि तुम्हारी आज़माइश करे, और सच तो यह है कि अल्लाह ने फिर भी तुम्हें माफ़ ही कर दिया, क्योंकि ईमानवालों पर अल्लाह बड़े फ़ज़ल करता रहता है।"

(सूरह 03 आले इमरान आयत 152)

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7. मुहब्बत और क़ुर्बानी के दृश्य

अबु उबैदा बिन अल जर्राह ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चेहरे से एक कड़ी खींची तो उनके नीचे का एक दांत गिर गया फिर उन्होंने दूसरी कड़ी खींची तो उनका दुसरा निचला दांत भी गिर गया इस प्रकार उनके आगे के दो दांत टूट गए। अबु दुजाना ने ख़ुद को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए ढाल बना लिया वह उनपर झुके हुए थे और जो भी तीर आता उसे अपनी कमर पर रोकते थे। सअद बिन वक़्क़ास रज़ि अल्लाहु अन्हु रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने तीर चला रहे थे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन्हें तीर देते जाते थे और कहते जाते थे "सअद तीर चलाओ मेरे मां-बाप तुम पर कुर्बान हों"

क़तादह बिन नोमान अंसारी की आंख में ज़ख़्म लगा उनकी आंखें बाहर निकल कर गिर पड़ीं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसे अपने हाथों से उठाकर रख दिया और वह ठीक हो गई बल्कि पहले से बेहतर हो गई। (तारीख़ इब्ने हिशाम भाग 2 पृष्ठ 454 नईमिया इस्लामिक बुक स्टोर देवबंद दिसम्बर 2021)

मुशरेकीन का इरादा रसूलुल्लाह को क़त्ल करने का था लेकिन अल्लाह को यह मंज़ूर नहीं था इसलिए दस सहाबा रसूलुल्लाह को घेर कर खड़े हो गए और हिफ़ाज़त करते करते सभी शहीद हो गए। तल्हा बिन उबैदुल्लाह तो ढाल बन गए रसूलुल्लाह पर आने वाले हर वार को अपने हाथ से रोकते थे इसी में उनकी उंगलिया भी कट गईं और उनका हाथ शल हो गया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बुलंद चट्टान पर जाने का इरादा किया लेकिन ज़ख़्म की शिद्दत और कमज़ोरी के कारण नहीं जा सकते थे तल्हा ने उन्हें सहारा देकर ऊपर चढ़ाया, नमाज़ का समय हो रहा था आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वहां पर बैठकर नमाज़ पढ़ाई।

 जब लोग भाग रहे थे तो अनस बिन नज़र डटकर खड़े रहे यह ख़ादिम ए रसूल अनस बिन मालिक के चाचा थे। वह आगे बढ़े तो सअद बिन मुआज़ ने पूछा अबु उमर कहां चले? उन्होंने जवाब दिया मुझे जन्नत की खुशबू आ रही है और मैं इस उहद के मैदान में उसे महसूस कर रहा हूं।

फिर अनस बिन नज़र उन मुहाजिर और अंसार के पास पहुंचे जो लड़ाई छोड़ चुके थे, उनसे पूछा तुम यहाँ क्यों बैठ गए? उन्होंने जवाब दिया सुना नहीं! रसूलुल्लाह शहीद हो गए, अनस ने कहा फिर तुम ज़िंदा रहकर क्या करोगे लड़कर मरो उस के लिए जिसपर रसूलुल्लाह शहीद हो गए फिर वह आगे बढ़े और लड़ते लड़ते शहीद हो गए।

अनस बिन मालिक रज़ि अल्लाहु अन्हु का बयान है कि उनके शरीर पर सत्तर के क़रीब ज़ख़्म थे, उन्हें कोई पहचान नहीं सकता था उनकी बहन ने उन्हें उंगलियों से पहचाना।

ज़ियाद बिन सकन रज़ि अल्लाहु अन्हु पांच अंसारी सहाबा के साथ रसूलुल्लाह के सामने जंग करते रहे। पहले एक व्यक्ति लड़ता फिर दूसरा लड़ता, सबसे पहले लड़ने वाले ज़ियाद ही थे जब वह ज़ख़्मी होगए तो रसूलुल्लाह ने उन्हें अपने क़रीब लाने का आदेश दिया चुनांचे उन्हें पास लाया गया तो उन्होंने आप के क़दम को तकिया बना लिया और उसी पर शहीद हो गए।

अम्र बिन जमूह एक लंगड़े सहाबी थे उनके चार जवान बेटे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ लड़ाई में शरीक थे जब उन्होंने जंग ए उहद में जाने का इरादा किया तो उनके बच्चों ने कहा, बेशक अल्लाह तआला ने आपको रुख़्सत दी है आप घर पर रहिये हम आपकी तरफ़ से काफ़ी हैं अल्लाह तआला ने आपको जिहाद की ज़िम्मेदारी से अलग रखा है। 

लेकिन अम्र बिन जमूह नहीं माने, वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए और शिकायत की कि मेरे बच्चे मुझे आपके साथ जिहाद में जाने से रोकते हैं और अल्लाह से मुझे उम्मीद है कि मुझे शहादत नसीब होगी, मैं इन पैरों के साथ जन्नत में चलना चाहता हूं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे कहा कि आपको अल्लाह ने जिहाद से माफ़ रखा है (जब उनकी ज़िद्द बढ़ गई तो) उनके बेटों से कहा कि तुम इन्हें छोड़ दो शायेद कि अल्लाह ने शहादत को इनके नसीब में लिख दिया है फिर वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ जंग में गए और उहद के दिन शहीद हो गए।

ज़ैद बिन साबित का बयान है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे उहद के दिन सअद बिन रबीअ की तलाश में भेजा और कहा अगर तुम उन्हें देखो तो कहना कि रसूलुल्लाह ने सलाम भेजा है और पूछा है कि ख़ुद को कैसा महसूस कर रहे हो। मैं निकला तो उन्हें शहीदों के बीच पाया, मैं उनके पास गया वह आख़िरी सांस ले रहे थे उनके शरीर पर नेज़ों, तलवारों और तीरों के लगभग सत्तर ज़ख़्म थे। मैंने कहा ऐ साद: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आपको सलाम भेजा है और पूछा है कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं? उन्होंने जवाब दिया, रसूलुल्लाह को मेरा सलाम कहना और यह भी बताना कि ऐ अल्लाह के रसूल मुझे जन्नत की ख़ुशबू मिल रही है और मेरी क़ौम अंसार से कहना अगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तुम्हारी आंखों के सामने कोई नुक़सान पहुंच जाए तो तुम्हारा कोई बहाना काम नहीं आएगा और इसके साथ ही वह शहीद हो गए।

अब्दुल्लाह बिन जहश ने दुआ की ऐ  अल्लाह! मैं तुझे क़सम देता हूं कि मैं दुश्मन के क़ब्ज़े में आजाऊं वह मुझे शहीद कर दें, मेरा पेट चीरें और मेरी नाक और कान काट लें फिर तू मुझसे इसके बारे में पूछेगा तो मेरा जवाब होगा यह सब तो केवल तेरी ख़ुशी के लिए किया। 

शहादत है मतलूब व मक़सूद ए मोमिन 

न माले ग़नीमत न किशवर कुशाई

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8. मुसलमानों का अपने केंद्र की तरफ़ लौटना

जब मुसलमानों को रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में पता चला तो उनकी तरफ़ दौड़ते हुए आए फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सबको एक घाटी की तरफ़ ले गए। इसी बीच उबई बिन ख़लफ़ यह चिल्लाते हुए आया ऐ मुहम्मद! आज या तो तुम रहोगे या मैं रहूंगा। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लोगों से कहा इसका रास्ता छोड़ दो मेरे पास आने दो जब वह क़रीब पहुंचा तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने किसी सहाबी से जंगी हथियार लिया फिर उसका सामना किया और उसकी गर्दन पर एक नेज़ा मारा जिससे वह अपने घोड़े से कई बार लुढ़का।

अली बिन अबि तालिब रज़ि अल्लाहु अन्हु अपने मश्कीज़े में पानी लाए और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चेहरे से ख़ून साफ़ किया, रसूलुल्लाह की बेटी फ़ातिमा ज़ख़्म को धुलती जाती थीं और अली रज़ि अल्लाहु अन्हु उसपर पानी गिराते जाते थे, जब फ़ातिमा ने देखा कि पानी से ख़ून नहीं रुक पा रहा है तो उन्होंने चटाई का एक टुकड़ा लिया उसे जलाया और उसकी राख ज़ख़्म पर चिपका दी तब कहीं ख़ून बहना बंद हुआ।

आयेशा बिन्ते अबु बकर और उम्मे सुलैम अपनी कमर पर मश्कीज़ा भर कर लाती थीं और लोगों को पानी पिलाती थीं जब पानी ख़त्म हो जाता फिर जातीं और भरकर लातीं और ज़ख़्मियों को पानी पिलातीं थीं उम्मे सुलैत उन दोनों को मशकीज़ा भर भर कर देतीं थीं।

हिन्द बिन्ते उतबा और उसके साथ की दूसरी औरतें मुसलमानों के मक़तूलों का मुसला कर रही थीं, वह नाक, कान काट रही थीं, उसने हमज़ा का जिगर निकाला उसे चबाया लेकिन उसे निगल न सकी इसलिए बाहर फेंक दिया।

अबु सुफ़ियान ने लौटने का इरादा किया वह पहाड़ी पर चढ़ा और बुलंद आवाज़ से चिल्लाया निसंदेह जंग बराबर हो गई और हमने बद्र का बदला ले लिया हुबल की जय हो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा उमर खड़े हो और जवाब दो, अल्लाह ही बुलंद है और वही बुजुर्ग है कोई बराबरी नहीं है हमारे मक़तूल जन्नत में हैं और तुम्हारे जहन्नम में। अबु सुफ़ियान ने कहा हमारे लिए उज़्ज़ा है और तुम्हारे लिए उज़्ज़ा नहीं है नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा उमर जवाब दो कि हमारा मौला अल्लाह है और तुम्हारा कोई मौला नहीं है।

अबु सुफ़ियान जब लौटा तो मुसलमान भी लौटने लगे तो उसने पुकारा अब हमारा मुक़ाबला अगले वर्ष में बद्र के स्थान पर होगा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने किसी सहाबी से कहा, जवाब दो हां हमारे और तुम्हारे दरमियान यह मुक़ाबला तय होगया।

फिर लोग अपने मक़तूलों के दफ़न से फ़ारिग़ हुए, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमज़ा के शहीद होने से बड़े दुखी थे क्योंकि वह उनके चाचा भी थे, दूध शरीक भाई भी थे और उनके बड़े हिमायती थे।

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9. एक मोमिन औरत का सब्र

सफ़िया बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब अपने भाई हमज़ा (जो पिता और माता दोनों तरफ़ से भाई थे) को देखने के लिए आईं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके बेटे ज़ुबैर बिन अव्वाम से कहा उन्हें रोको और उन्हें लौटाओ कि वह नहीं देख सकेंगी। ज़ुबैर आए और कहा ऐ मां! रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आदेश दिया है कि आप लौट जाएं उन्होंने पूछा, लेकिन क्यों? मुझे सूचना मिल चुकी है कि मेरे भाई का मुसला किया गया है और यह अल्लाह के रास्ते में हुआ है इस हादसे पर मैं इंशाअल्लाह ज़रूर सब्र करूंगी। उन्होंने देखा, उनके लिए दुआ की और लौट गईं और उनके लिए मग़फ़िरत तलब की फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमज़ा रज़ि अल्लाहु अन्हु को दफ़न करने का हुक्म दिया।

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10. मुसअब बिन उमैर और उहद के शहीदों को कैसे दफ़न किया गया

रसूलुल्लाह के अलम्बरदार मुसअब बिन उमैर क़ुरैश के ऐसे नौजवान थे जो इस्लाम लाने से पहले बहुत ही लाड प्यार में रहते थे लेकिन जब उहद में शहीद हुए तो उनको केवल एक चादर में कफ़न दिया गया वह भी इतनी छोटी थी कि अगर उससे सिर ढाँकते तो पैर खुल जाता और पैर ढाँकते तो सिर खुल जाता था यह देखकर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ऐसा करो सिर ढक दो और पैर पर इज़ख़र घास डाल दो।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक-एक कपड़े में दो-दो लोगों को रखने का आदेश देते फिर पूछते इसमें से किसको क़ुरआन ज़्यादा याद है जब उसकी तरफ़ इशारा किया जाता तो उसे क़ब्र में आगे रखते और कहते क़यामत के दिन मैं इसपर गवाही दूंगा फिर उनको दफ़न करने का हुक्म देते उनपर न जनाज़ा पढ़ते और न उन्हें ग़ुस्ल दिया जाता।

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11.  रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए औरतों का ईसार

मुसलमान जब मदीना लौटे तो उनका गुज़र बनी दीनार की एक औरत के पास से हुआ जिसके पति, भाई और पिता उहद की लड़ाई में शहीद हो गए थे जब उसे उनकी सूचना दी गई तो उसने पूछा बताओ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कैसे हैं, लोगों ने कहा वह बेहतर है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी है उसने कहा कि मैं आंखों से देख लूं आप कहां हैं? रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ इशारा करके बता दिया गया उसने देखा तो कहा कि अब मेरे लिए तमाम मुसीबतें मामूली हैं।

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12.  रसूलुल्लाह और मुसलमानों के द्वारा कुफ़्फ़ार का पीछा किया जाना

मुशरिक एक दुसरे को मलामत करने लगे कि तुमने कुछ भी नहीं किया, तुमने उनकी ताक़त और क़ूवत तोड़कर ऐसे ही छोड़ दिया उन्हें कमज़ोर मत समझो इधर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुश्मन का पीछा करने का हुक्म दिया जबकि मुसलमान ज़ख्मों से चूर थे, दूसरे दिन रसूलुल्लाह की जानिब से ऐलान हुआ कि दुश्मन का पीछा करने के लिए निकलना है लेकिन हमारे साथ केवल वही लोग जाएंगे जो कल हमारे साथ थे। मुसलमान सख़्त ज़ख़्मी होने के बावजूद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ गए एक व्यक्ति भी पीछे नहीं रहा, वह हुमराउल असद के स्थान पर पहुंचे जो मदीना से लगभग आठ मील की दुरी पर है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और मुसलमान वहां सोमवार, मंगल और बुध तीन दिन ठहरे रहे फिर मदीना लौट आए।

उहद की लड़ाई में कुल सत्तर मुसलमान शहीद हुए ज़्यादा संख्या अंसार सहाबा की थी (अल्लाह उनसे राज़ी हुआ) और ,बारह मुशरिक मारे गए।

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किताब: कसास उन नबीयीन
मुसन्निफ़: सैयद अबुल हसन नदवी रहमतुल्लाहि अलैहि 
अनुवाद: आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही  

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